विमर्श

संसद सत्र के दौरान मीडिया पेश करता है जनविरोधी रिपोर्टिंग का बेहतरीन उदाहरण, लगता है विपक्षी सांसद बस हंगामा करने जाते हैं सदन में

Janjwar Desk
28 July 2022 4:32 PM GMT
संसद सत्र के दौरान मीडिया पेश करता है जनविरोधी रिपोर्टिंग का बेहतरीन उदाहरण, लगता है विपक्षी सांसद बस हंगामा करने जाते हैं सदन में
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Godi Media : मीडिया, विशेष तौर पर विजुअल मीडिया की ताकत ऐसी है कि बेरोजगार भी खड़ा होकर बताने लगता है कि देश में रोजगार की कमी नहीं है, और भूख से तड़पकर मरता व्यक्ति भी देश की समृद्धता के राग अलापता है....

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

Media coverage during Parliament Session is an example of anti-people reporting. हमारे देश के आका विकास का कितना भी डंका पीट लें, पर तथ्य यही है कि देश हरेक मसले पर विफल है – इस विफलता का श्रेय सत्ता से अधिक मीडिया को जाता है। मीडिया ने लगातार झूठ को सच बताया है, और जब आप झूठ को सच बताते हैं तब उसे अधिक रंगीन और अधिक चमकदार बनाते हैं, कुछ धार्मिक रंग देते हैं, कुछ आपसी वैमनस्व का तडका लगाते हैं, जिससे जनता उस झूठ की तरफ आकर्षित होती है और फिर इसे ही सच मान लेती है।

मीडिया, विशेष तौर पर विजुअल मीडिया की ताकत ऐसी है कि बेरोजगार भी खड़ा होकर बताने लगता है कि देश में रोजगार की कमी नहीं है, और भूख से तड़पकर मरता व्यक्ति भी देश की समृद्धता के राग अलापता है। हमारे देश के मीडिया के अनुसार सत्ता, सत्तारूढ़ दल के समर्थक, कट्टरवादी हिंसक धार्मिक संगठन और सत्ता चालीसा का जाप करने वाले लोग ही देश के नागरिक हैं, बाकी सबको पाकिस्तान चले जाना चाहिए।

हरेक दिन मीडिया का तमाशा नजर आता है, पर जब संसद का अधिवेशन होता है तब यह तमाशा चरम पर रहता है। यदि आप थोड़े भी जागरूक नागरिक हैं, तब संसद अधिवेशन के समय एक ट्रेंड पिछले कुछ वर्षों के दौरान आपने जरूर देखा होगा। संसद का अधिवेशन शुरू होने के ठीक पहले सत्ता कुछ ऐसा निर्णय लेती है, जो जनता के लिए घातक होता है। इस बार यह काम जनता के काम आने वाले हरेक वास्तु पर जीएसटी लगाकर किया गया। मीडिया उसे बेशर्मी से जनता के हित का बताता है। विपक्ष इन मुद्दों पर आवाज उठाता है, पर मीडिया या तो विपक्ष को गायब कर देता है, या फिर विपक्ष के बयानों को तोड़-मरोड़ कर जनता के विरुद्ध साबित करता है।

इसी बीच में सरकारी पालतू जांच एजेंसियां विपक्षी नेताओं पर अचानक जांच शुरू करती हैं, और पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को देशद्रोही बताकर जेल में डालती हैं। मीडिया फिर से इन सबमें बेशर्मी से सत्ता का साथ देता है। इसके बाद संसद का सत्र शुरू होता है, जिसमें सरकार के पास किसी भी विषय पर कोई आंकड़े नहीं होते हैं, किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होता, सत्ता पक्ष संसद में केवल अपने को महान साबित करने और विपक्ष पर अनर्गल आरोप लगाने का काम करता है। मीडिया फिर बेशर्मी से सत्ता का साथ देती है।

विपक्ष जनता से जुड़े मुद्दों पर सदन में बहस की मांग करता है, और सत्ता के इशारे पर सदन के सत्तालोलुप अध्यक्ष ऐसी बहसों को खारिज करते हैं। मीडिया फिर से सत्ता का साथ देती है। सत्ता लगातार एक भ्रम फैलाती है, हम किसी भी विषय पर बहस करने को तैयार है और यह वक्तव्य केवल मीडिया को ही सटीक और सार्थक नजर आता है। मीडिया अनेक बार सत्ता को उस बेचारे की तरह प्रस्तुत करती है, जो बहस के लिए तैयार है पर विपक्ष उसे मौका नहीं दे रहा है।

कुछ दिनों बाद विपक्ष के सदस्य अपनी मांगों के खारिज होने और किसी भी प्रश्न के उत्तर नहीं मिलने से उत्तेजित होते हैं, नारेबाजी करते हैं, हंगामा करते हैं। अध्यक्ष जी विपक्षी सदस्यों को निलंबित करते हैं। मीडिया फिर से बेशर्मी से खबरें दिखाता है। इन खबरों को ऐसा प्रस्तुत किया जाता है, मानो विपक्षी सांसद बस हंगामा करने ही संसद जाते हैं, या फिर सरकार को काम नहीं करने देना चाहते। मीडिया कभी यह नहीं बताता कि आखिर निलंबित विपक्षी सांसद क्या चाहते थे, या फिर किस विषय पर बहस चाहते थे। मीडिया यह कभी नहीं बताता कि प्रधानमंत्री जी कितने दिन और कुल कितने समय संसद में मौजूद रहे और किसी प्रश्न का जवाब भी दिया या बस विपक्ष पर फब्तियां कसते रहे।

पिछले कुछ वर्षों से संसद सत्र का एक और जगजाहिर ट्रेंड है – संसद के अधिवेशन के दौरान सत्ता और मीडिया लगातार बताते रहते हैं कि विपक्ष के कारण संसद का कितने घंटे या दिन का समय बर्बाद हुआ। मीडिया पूरी बर्बादी का आर्थिक आकलन भी प्रस्तुत कर देता है, और जनता को बताता है कि यह सब बर्बादी केवल विपक्ष के कारण है।

हरेक बार सत्र के अंतिम दो-तीन दिन सत्ता और मीडिया की नज़रों में बिलकुल अलग हो जाते हैं। अंतिम दो-तीन दिनों तक विपक्ष के अधिकतर सांसद निलंबित किये जा चुके होते हैं और शेष विपक्ष निलंबित सदस्यों के समर्थन में संसद सत्र का बहिष्कार कर चुके होते हैं। फिर, अचानक संसद में सत्ता की तरफ से बिलों की बौछार कर दी जाती है, और 2-3 मिनट में ही प्रत्येक बिल स्वीकृत कर लिया जाता है। अधिकतर बिल सत्ता के अधिकार बढाने और जनता को अधिकारों से वंचित करने वाले होते हैं। मीडिया कई घंटों तक इन बिलों की खूबियाँ बताता है, जनता को उसका उज्जवल भविष्य समझाता है।

फिर, संसद का सत्र ख़त्म हो जाता है। सत्र के अंतिम चरण तक सत्ता और मीडिया जिस समय की बर्बादी का राग अलापते हैं, वह आलाप पूरी तरह से गायब हो जाता है। सत्ता सत्र को अंत में स्वीकृत बिलों की संख्या के आधार पर इतिहास का सबसे अधिक सार्थक बताती है। मीडिया सत्ता की तारीफ़ के पुल बांधती है, सत्ता की कामयाबी पर गर्मागर्म टीवी डीबेट होते हैं, विपक्ष को कोसा जाता है। भूखी-प्यासी, बेरोजगार, गरीब जनता टकटकी लगाकर टीवी स्क्रीन से आ रहे प्रवचनों को ध्यान से सुनती है और अपने उज्जवल भविष्य की राह देखती है।

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