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भारत के खिलाफ़ ट्रंप के राष्ट्रवादी नस्लीय नज़रिये का इज़हार है वीज़ा प्रतिबन्ध

Janjwar Desk
3 July 2020 12:09 PM GMT
भारत के खिलाफ़ ट्रंप के राष्ट्रवादी नस्लीय नज़रिये का इज़हार है वीज़ा प्रतिबन्ध
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पिछले साल भारतीयों को 278,491 वीज़ा जारी किये गए थे, चीनियों को 50,408 और दूसरे देशों को 58,303 वीज़ा जारी किये गए थे , इसमें नए H-1B और पुराने की मियाद बढ़ाना भी शामिल है...

राफ़िया ज़कारिया का विश्लेषण

गर्मी का मौसम भारत के लिए बदमिज़ाज हो गया है। नेपालियों ने उन्हें बेचैन कर दिया है, चीनियों ने उनकी उस ज़मीन पर कब्जा कर लिया है जिसे वो अपनी मानते थे और अब डोनाल्ड ट्रंप ने लाखों भारतीयों को मृत्यु-तुल्य कष्ट दे डाला है। सोमवार 22 जून को राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रंप ने एक ऐसे सरकारी आदेश पर हस्ताक्षर किये जिसमें कहा गया था कि सभी H-1 B, J और L वीज़ा बनाने के काम को तुरंत रोका जाए।

लागू किया जा चुका यह आदेश साल के अंत में निरस्त होगा। यह आदेश मुख्य रूप से उन भारतीयों को प्रभावित करेगा जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र से जुड़े हैं और H-1B श्रेणी में आने वालों का 70 फीसद से भी ज़्यादा हिस्सा हैं। जिनके पास पहले से H-1 B वीज़ा है उनके आदेश से प्रभावित होने की संभावना नहीं है, हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि भविष्य में H-1B को बढ़ाया जाएगा या नहीं।

पिछले एक दशक में गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों ने इस क्षेत्र में लाखों इंजीनियर्स को नौकरी दी है। इसके अलावा सिलिकन वैली में अपनी मौजूदगी रखने वाली इन्फ़ोसिस और टाटा जैसी भारतीय कंपनियां भी इन वीज़ा का इस्तेमाल अत्यधिक कौशलपूर्ण भारतीय कामगारों को अमेरिका लाने में कर रही हैं। चूंकि हर साल लॉटरी के माध्यम से केवल 85000 H-1B वीज़ा जारी किये जाते हैं इसलिए अमेरिका स्थित भारतीय कंपनियां L वीज़ा का इस्तेमाल करने में सिद्धस्त हो गयी हैं। इसके तहत वे इंट्रा कंपनी ट्रांसफर के माध्यम से हजारों भारतीय कामगारों को अमेरिका ले आती हैं।

अब वो दिन बीत चुके हैं। ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों की शिकायत थी कि ये भारतीय कंपनियाँ तीसरी पार्टी और आउटसोर्सिंग कंपनीज़ का इस्तेमाल कर हजारों भारतीय कामगारों को अमेरिका ला रहीं हैं और उनसे अमेरिकी कामगारों को मिलने वाले पैसे की तुलना में कम पैसे दे कर काम करवा रही हैं जिसके चलते अमेरिकियों को भी कम मजदूरी में काम करना पड़ रहा है।

आंकड़ों का विश्लेषण वाकई दिखाता है कि इंफ़ोसिस और टाटा जैसी भारतीय कंपनियाँ हजारों की संख्या में वीज़ा की अर्जी लगा रही थीं(ऐप्पल और एमेजॉन जैसी कंपनियों से कहीं ज़्यादा) और भारतीय कामगारों को अमेरिकी कामगार को मिलने वाली पगार का औसतन 70 फीसदी ही दे रही थीं। चूंकि अमेरिकी श्रम बाजार में प्रवेश पाने के लिए ये कंपनियाँ भारतीय कर्मचारियों के लिए तुरुप का पत्ता थीं इसलिए भारतीय कर्मचारी इन कंपनियों के प्रति कृतज्ञ थे। यही कारण है कि अगर उन्हें तय राशि से कम पगार मिलती थी तो वे उसकी शिकायत नहीं कर पाते थे या U.S. Citizenship and Immigration Services को इस पर ध्यान नहीं दिला पाते थे।

भारतीय कंपनियां इन आरोपों को ख़ारिज करती रही हैं लेकिन आंकड़े ट्रंप प्रशासन की बात की पुष्टि करते हैं। पिछले साल भारतीयों को 278,491 वीज़ा जारी किये गए थे, चीनियों को 50,408 और दूसरे देशों को 58,303 वीज़ा जारी किये गए थे (इसमें नए H-1B और पुराने की मियाद बढ़ाना भी शामिल है), संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत ने इस श्रेणी में दबदबा हासिल कर लिया था जिसका इस्तेमाल उसने अत्यधिक निपुण कामगारों को अमेरिका लाने में किया।

उम्मीद के अनुसार ही ट्रंप के आदेश ने भारत में भय का माहौल पैदा कर दिया। भारतीय टेलिविज़न की बहसों में विश्लेषणकर्ता इस बात पर जोर देते रहे कि यह केवल एक अस्थाई कदम है और जल्दी ही सभी वीज़ा दोबारा उपलब्ध हो जायेंगे। एक विश्लेषक तो यही बताता रहा कि कैसे ट्रंप का आदेश मोदी की उस विदेश नीति की हार नहीं है जिसने भारत को अमेरिका के साथ जोड़ने की कोशिश की है (और देखने में असफल रही है)। एक दूसरे विश्लेषक ने ट्रंप के भारत दौरे और दोनों की साझा रैलियों का मखौल उड़ाते हुए कहा कि लगता है इनका कोई मतलब नहीं रहा। वहीं एक तीसरे ने सुझाव दिया कि भारत के H-1B अर्ज़ी दाताओं को अब यह उम्मीद रखनी चाहिए कि ट्रंप दोबारा नहीं जीत पाएंगे और वीज़ा प्रतिबन्ध की मियाद खुद-ब-खुद ख़त्म हो जाएगी।

इनमें से बहुत सारे वायदे झूठे हैं। विडम्बना यह है कि भारत में कोई भी वीज़ा प्रतिबन्ध के पीछे की सच्चाई स्वीकार करता नहीं दिखाई दे रहा है। अमेरिकियों के लिए नौकरी पैदा करना जैसी भाषा में लिपटी सच्चाई तो यह है कि एक गोरी चमड़ी वाला राष्ट्रवादी अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश में भूरी चमड़ी वाले भारतीयों का आयात नहीं चाहता है।

सभी भारतीयों के खुद को श्वेत अमेरिकियों की तर्ज़ पर अपने आप में अकेली आर्य नस्ल का मानने के बहुत बड़े मुग़ालते के बावजूद सफ़ेद चमड़ी वाले राष्ट्रवादी उन्हें ऐसी गन्दगी मानते हैं जो केवल गोरों के लिए अमेरिका की उनके द्वारा गढ़ी तस्वीर में समा नहीं पाते हैं। श्वेत शक्ति का उच्चारण कर रहे एक व्यक्ति के वीडियो को दोबारा ट्वीट करने (बाद में हटा देने) वाले ट्रंप की रूचि इसमें कतई नहीं है कि यह या वह इंजीनियर क्या कर सकता है। उसकी रूचि तो अपने गोरी चमड़ी वाले राष्ट्रवादी आधार को खुश रखने में है।

इन चाहतों को भारतीयों से अच्छा दूसरा कौन समझ सकेगा। ये भारत के लोग ही थे जिन्होंने कुछ महीने पहले एक भेदभावपूर्ण नागरिक क़ानून पास किया था जिसका मक़सद मुसलमानों और भेदभावपूर्ण बर्ताव के शिकार समूहों को नागरिकता प्रदान करने से वंचित रखना था। अगर भारत के लोग एक ऐसे हिन्दू राष्ट्रवादी राज्य की स्थापना का मक़सद रख सकते हैं जो अपनी अल्पसंख्यक आबादी पर ग़ैर-न्यायिक तरीके से भेदभावपूर्ण क़ानून थोपता हो तो ट्रंप भी देश में आने वाले भारतीयों को लाने की व्यवस्था पर रोक लगा सकता है।

अगर बाइडन प्रशासन सत्ता में आ भी जाता है तब भी इसके लिए नौकरी आधारित वीज़ा की पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू करना मुश्किल ही होगा और इसका वास्तविक कारण है आर्थिक। जब 45 मिलियन अमेरिकियों के पास नौकरी न हो तो लाखों भारतीयों को देश में आने देना राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय होगा। डेमोक्रेटिक पार्टी का ध्रुव वामपंथी धड़ा अप्रवासी क़ानूनों में ऐसे सुधार चाहता है जो अत्यधिक कुशल कामगारों की जगह गरीब आप्रवासियों पर ध्यान दें।कामगारों के आयात को ले कर श्रमिक संगठनों को भी समस्या है।

वैसे सब कुछ भयावह नहीं है। ज़्यादातर भारतीय और अमेरिकी टेक कंपनियाँ ने अपने मुलाजिमों को घर से काम करने की अनुमति देना शुरू कर दिया है। एक तरह से इस वस्तु स्थिति ने भी भारतीय कामगारों की व्यक्तिगत रूप से अमेरिका में उपस्थित रहने की ज़रुरत को कम कर दिया है। हाँ, ये ज़रूर है कि भारत में रह कर काम करते हुए उन्हें उस राशि से बहुत काम मिलेगी जो अमेरिका में रहते हुए मिलती। अब तक तो भारतीयों को अपने राष्ट्रवादी एजेंडे को ट्रंप प्रशासन से जोड़ कर आनंद आता रहा है लेकिन अब उसी राष्ट्रवादी एजेंडे ने भारतीयों पर बाहरी होने का ऐसा लेबल लगा दिया है कि अमेरिका में अब उनका आगमन स्वागत योग्य नहीं रहा है। ट्रंप और मोदी के चुने जाने के बाद से पहली बार ऐसा हुआ है कि भारतीयों को एक ऐसे राष्ट्रपति को समर्थन देने की कीमत को आंकना पड़ेगा जो सोचता है कि भारत वाले नस्लीय रूप से अमेरिका से अठ्ठारह पड़ते हैं और इसीलिये उन्हें उस अमेरिका से बाहर ही रखना चाहिए जो उसकी नज़र में केवल और केवल गोरे लोगों के लिए बना है।

(पाकिस्तानी लेखिका पेशे से वकील हैं और संवैधानिक क़ानून एवं राजनीतिक दर्शन विषय पढ़ाती हैं। उनका यह लेख साभार डॉन अखबार से लिया गया है।)

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