कोविड -19

9.39 लाख आशा वर्कर्स के पास नहीं कोई मेडिकल सुविधा, लेकिन कोरोना में सबसे बड़ी जिम्मेदार इन्हीं पर

Janjwar Desk
18 May 2021 3:30 PM GMT
9.39 लाख आशा वर्कर्स के पास नहीं कोई मेडिकल सुविधा, लेकिन कोरोना में सबसे बड़ी जिम्मेदार इन्हीं पर
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(अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करतीं आशा कार्यकर्ता)

कोरोना काल में किसी भी राज्यों के आशा कार्यकर्ताओं को कोई अतिरिक्त धनराशि नहीं दी जा रही है, इन्हें तनख्वाह व मानदेय देने के बजाय सरकार पारितोषिक या प्रोत्साहन धनराशि के रूप में चंद रुपए देती है...

जितेंद्र उपाध्याय की टिप्पणी

जनज्वार। कोरोना वायरस के रूप में हमलावर अदृश्य दुश्मनों से हमें बचाने के लिए अग्रिम पंक्ति में लाखों वॉरियर्स अपनी जान जोखिम में डालकर लड़ाई लड़ रहे हैं। इन वॉरियर्स में एक बड़ी संख्या है आशा कार्यकर्ताओं की, जिनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांव गांव जाकर संकट में बचाव करने का आह्वान किया है। पिछले 1 साल से ये अपने कार्य में डटी हुई हैं। ऐसे हाल में खास बात यह है कि युद्ध में ये आशा एक ऐसी योद्धा हैं, जिन्हें इस जंग से मुकाबले के लिए 'हथियार' ( न मास्क, न सैनेटाइजर और वेतन, न अतिरिक्त भत्ता) तक मुहैया नहीं कराये गये हैं।

देश की 9.39 लाख से अधिक आशा कार्यकर्ताओं की जान खतरे में है। सामाजिक व राजनीतिक संगठनों की तरफ वॉरियर्स की भी चिंता करो 'सरकार' की आवाज उठती रही है। इसके बाद भी आशा कार्यकर्ताओं के प्रति सरकार की उदासीनता और उपेक्षा बरकरार है।

बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संघ की राज्य अध्यक्ष शशि यादव कहती हैं, 'देश में संकट की इस घड़ी में आशाकर्मी जान की परवाह नहीं कर ड्यूटी कर रही हैं, लेकिन इन्हें सुरक्षा उपकरण और क्षेत्र में जाने के लिए सुरक्षा तक सरकार नहीं दे रही और किसी तरह का आर्थिक लाभ भी देने के पक्ष में नहीं है। यह घोर अमानवीय व कोरोना से जंग में आशा कार्यकर्ता का मनोबल गिराने वाला सरकार का रवैया है।

महासंघ (गोप गुट-ऐक्टू) से सम्बद्ध बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संघ के आह्वान पर राज्य की आशाओं ने हाल ही में राज्यव्यापी मांग दिवस मनाया था। आशा कार्यकर्ताओं ने अपने घरों से और पीएचसी पर कोरोना नियमों का पालन करते हुए पोस्टर्स के साथ अपनी मांगों को प्रदर्शित किया और कोविड ड्यूटी के लिये आशाओं को दैनिक 500 या मासिक 10 हजार पारिश्रमिक देने, 10 लाख रुपये का हेल्थ बीमा करने व मृतक आशाओं के परिवार को 50 लाख का मुआवजा देने की मांग प्रमुखता से उठाई।

आशा कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कोरोना काल के पिछले वर्ष के कार्य का प्रोत्साहन राशि का भुगतान अब तक सरकार ने नहीं किया है। बहुत कम धनराशि पर काम करने वाली आशा कर्मी व अपने परिवार का भुखमरी और बीमारी की स्थिति में इलाज तक नहीं करा पा रही हैं। कोरोना की दूसरी लहर में दर्ज़नों आशाओं की मौत हुई है, लेकिन सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने इनकी कोई सुध नहीं ली।

मूलभूत सुविधाओं के लिए देशभर की आशा कार्यकर्ता कर चुकी हैं प्रदर्शन

अपने घरवालों के बजाए आम लोगों की सुरक्षा के लिए हर पल आशा कार्यकर्ता तैनात हैं। मगर इस लड़ाई में गांव की गलियों से लेकर कस्बों तक दस्तक देती नजर आतीं कोरोना वॉरियर्स के रूप में लाखों की तादाद में खड़ी आशाओं के साथ हमारी सरकार खड़ी होने के बजाय लगातार नाइंसाफी कर रही है।

आम आदमी को बचाने के लिए संघर्षरत आशा कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफी इसलिए कही जा रही है कि इन्हें काम के बदले कोई वेतन या मानदेय नहीं मिलता। काम के रूप में इनके पास कई तरह की जिम्मेदारियां हैं, जिन्हें करने पर उन्हें पारितोषिक या प्रोत्साहन राशि के रूप में चंद रुपयों का भुगतान होता है।

कोरोना काल में पिछले वर्ष कार्य करने पर प्रत्येक दिन के हिसाब से इन्हें 100-100 रुपए देने की बिहार सरकार ने घोषणा की थी। बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संघ के मुताबिक वादे के मुताबिक भुगतान के बजाय तीन माह तक एक-एक हजार रुपए के रूप में भुगतान मिला। इस बार अब तक किसी भी तरह के भुगतान का सरकार ने आश्वासन नहीं दिया है।

अपने सवालों को लेकर देशभर की आशा कार्यकर्ताओं ने अगस्त माह में 2 दिन की हड़ताल भी की थी, लेकिन अधिकांश राज्यों ने उनकी मांगें अनसुनी कर दी। इनकी शिकायत है कि ड्यूटी के दौरान अधिकांश को मास्क व सैनिटाइजर तक नहीं मिला है, पीपीई किट तो दूर की बात है, जबकि इनसे लोगों को जागरूक करने, घर- घर सर्वे करने, आइसोलेट मरीजों के घर पोस्टर चस्पां करने, टीकाकरण सेंटर, कोविड वार्ड में ड्यूटी लगाई जा रही है। बिहार में इनकी संख्या एक लाख है। अप्रैल व मई माह में यहां डेढ़ दर्जन आशा के मौत की खबरें हैं। ड्यूटी के दौरान आशा कार्यकर्ता पर हमले की घटना रोहतास व दरभंगा जिले में हो चुकी है। इस बीच समस्तीपुर प्रशासन ने एक आदेश जारी कर कहा है कि एक पीएचसी के अंतर्गत 250 एंटीजन किट से जांच की प्रक्रिया पूरी न करने पर आशा व अन्य कर्मियों कार्रवाई होगी।

चंद पारितोषिक धनराशि आशा कार्यकर्ताओं का सहारा

कोरोना काल में किसी भी राज्यों के आशा कार्यकर्ताओं को कोई अतिरिक्त धनराशि नहीं दी जा रही है। इन्हें तनख्वाह व मानदेय देने के बजाय सरकार पारितोषिक या प्रोत्साहन धनराशि के रूप में चंद रुपए देती है। प्रोत्साहन राशि के रूप में बिहार में एक हजार रुपए, उत्तर प्रदेश में तीन हजार, कर्नाटक में तीन हजार 500 रुपए, राजस्थान में 2500 रुपए दिए जाते हैं। एक नवंबर 2017 के आदेश के मुताबिक केरल में 4000 रुपए, अगस्त 2018 के आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा जारी आदेश के मुताबिक 3000 रूपए, अप्रैल 2013 के पश्चिम बंगाल सरकार की आदेश की मुताबिक 4300 रुपए, 1 जनवरी 2018 हरियाणा सरकार के आदेश के मुताबिक 4000 रुपए व 1 अप्रैल 2018 उड़ीसा सरकार के आदेश के मुताबिक 2000 रुपए आशा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।

उत्तर प्रदेश में भी जान जोखिम में डालकर आशा कार्यकर्ता अपनी ड्यूटी कर रही हैं। आशा कर्मचारी यूनियन की प्रदेश प्रभारी वीना गुप्ता कहती हैं, सरकार काम के बदले एक सम्मानजनक मानदेय तक नहीं देती है। कोरोना काल में मौत की स्थिति में अन्य वॉरियर्स की तरह 50 लाख रुपए भुगतान का भी प्रावधान नहीं है। ड्यूटी के दौरान जान माल का खतरा भी बना रहता है।

इस मसले पर देवरिया जिले के माकपा जिला सचिव सतीश कुमार कहते हैं ,शुरू से ही आशा कार्यकर्ताओं के साथ राज्य से लेकर केंद्र की सरकार ने वादा खिलाफी की है। कोरोना काल में वॉरियर्स के रूप में आज ये अग्रिम कतार में खड़ी हैं। इसके बाद भी इस कार्य के लिए कोई अतिरिक्त धनराशि नहीं मिल रही है। प्रोत्साहन राशि के रूप में 3000 रुपए का भुगतान किया जाता है।

मूलभूत सुविधाओं और उचित मानदेय तो दूर की बात आशा वर्कर्स का नहीं है स्वास्थ्य बीमा तक

आशा कार्यकर्ता रीता सिंह अपनी तकलीफ साझा करते हुए कहती हैं, कोरोना महामारी को एक साल से अधिक समय हो गया है, अब वह दिन-रात लोगों को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए जागरूक करती रहती हैं। ऐसे ही एक लाख से अधिक आशा कार्यकर्ता हैं। भारत सरकार के स्वास्थ्य और ये फ्रंटलाइन आशा कार्यकर्ता कोरोना महामारी का आगे बढ़कर डटकर सामना कर रही हैं। आशा कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन गांव का सर्वे करना होता है। लोगों में कोविड-19 के लक्षणों की स्क्रीन करनी पड़ती है और उन्हें स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने में मदद भी करनी होती है। इसके अलावा अपने गांव में लौटने वाले प्रवासी मजदूरों पर भी नजर रखनी पड़ती है। आशा कार्यकर्ताओं को कोविड-19 टीकाकरण के लिए ग्रामीणों को शिक्षित और प्रेरित करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी है।

आशा कार्यकर्ता कहती हैं, 'पिछले साल मार्च और अप्रैल महीने के दौरान मास्क और सैनिटाइजर मिले थे, लेकिन इस बार कुछ नहीं मिला। मेरठ जिले में कोरोना की रफ्तार बढ़ती जा रही है। जिले में अपनी ड्यूटी पर आशा कार्यकर्ता डटी हुई हैं। सभी 479 गांव में तैनात आशाओं को इस कार्य में लगाया गया है, जो गांव में जाने के साथ प्रत्येक घर में बाहर से आने वालों के बारे में निर्धारित प्रारूप व रजिस्टर पर विस्तृत ब्योरा अंकित कर रही हैं।'

सीएमओ डॉ. अखिलेश मोहन कहते हैं, आशा को जिम्मेदारी दी गई है कि वे सबसे पहले गांव आने वालों की थर्मल स्कैनिंग करें और आने के बाद स्वास्थ्य संबंधी कोई दिक्कत है अथवा नहीं के बारे में जानकारी लें। कोई दिक्कत होने पर घर में अलग रहने के बारे में सलाह दें। आशा कार्यकर्ताओं को निर्देशित किया गया है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में नियमित भ्रमण करें और प्रतिदिन का रिपोर्ट स्वास्थ्य केंद्र के माध्यम से जिला कार्यालय को उपलब्ध कराएं।

उत्तराखंड के चंपावत जिले की आशा कार्यकर्ता संगठन की जिलाध्यक्ष सरोज पांडे कहती हैं, कोरोना की लड़ाई में पिछले साल मार्च से ही आशा कार्यकर्ता उम्मीद की किरण रही हैं। वह अपने नियमित काम के अलावा कोरोना की जंग में गांवों में लोगों के बीच जाकर जिम्मेदारी से काम कर रही हैं। जिले की 313 ग्राम पंचायतों के 656 गांवों में 359 आशा कार्यकर्ता सेवा दे रही हैं। कोरोना की दूसरी लहर में भी वे मोर्चे पर डटी हैं। सुविधाओं की कमी के बावजूद कोरोना की लड़ाई में शिरकत कर रही हैं। पिछले साल भी कोरोना काल में हम लोगों ने घर-घर जाकर एक्टिव सर्वे किया था। जिसमें 65 साल से अधिक उम्र, दस साल तक के बच्चे और गांव के लोगों की बुखार, खांसी आदि बीमारियों का सर्वे किया था। ये सब काम एक हजार रुपये मासिक की प्रोत्साहन राशि में कर रही हैं। काम करते-करते कई कार्यकर्ता कोरोना संक्रमित भी हो चुकी हैं।

यहां के सीएमओ डॉ. आरपी खंडूरी भी मानते हैं कि आशा कार्यकर्ता कोरोना की जंग में उपयोगी भूमिका निभा रही हैं। गर्भवती महिलाओं की देखभाल करने से लेकर रोजमर्रा के काम के साथ आशा कार्यकर्ता कोरोना काल में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। होम आइसोलेशन में रह रहे संक्रमितों को दवा देना, टीकाकरण से लेकर कोविड वार्ड में ड्यूटी दे रही हैं।

उत्तराखंड के आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्हें हर महीने 1,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि मिलती रही है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है, खासकर महामारी में जब कोई ड्यूटी करने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहा हो।

एक हजार रुपये में क्या होता है? इतने में घर क्या चलता है? इस साल मार्च में केवल एक बार मास्क मिला। लेकिन हमें हर दिन ग्राउंड में जाना पड़ता है। हम हर रोज एक ही मास्क नहीं पहन सकते हैं।

उधर राजस्थान के ज्यादातर क्षेत्रों में भी इस वर्ष अभी तक आशा कार्यकर्ताओं को मास्क और सैनिटाइजर नहीं दिए गए हैं। सरकारों को आशा कार्यकर्ताओं के लिए पारिश्रमिक तय करना चाहिए था। महामारी के कारण नियमित टीकाकरण और प्रसव सहित अन्य स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई है। आशाओं को भी नियमित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है।

ओडिशा के अनुगुल जिले की सुनीता का भी कुछ ऐसा ही दर्द है। उनका कहना है पिछले साल मास्क और सैनिटाइजर व फेस शील्ड मिला था।। इस साल कोरोना संक्रमण का खतरा ज्यादा है, फिर भी कुछ नहीं दिया गया। जबकि प्रतिदिन दर्जनों संक्रमित मरीजों के करीब जाना पड़ता है। जिनके संपर्क में आने से संक्रमित होने का खतरा हमेशा बना रहता है।

जन स्वास्थ्य अभियान की राष्ट्रीय सह-संयोजक सुलक्षणा नंदी का कहना है कि कोरोना महामारी में आशा कार्यकर्ता लगातार काम कर रही हैं। वे समुदाय के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी महसूस करती हैं। उन्होंने कहा, "केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों ने इन आशा कार्यकर्ता द्वारा किए गए प्रयासों को मान्यता नहीं दिया। सरकार उनका शोषण कर रही है।" 'जन स्वास्थ्य अभियान' राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य अधिकारों के मुद्दों पर काम करता है।

अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करती रही हैं बिहार की आशा कार्यकर्ता

ओडिशा की आशा कार्यकर्ता प्रमिला मोहंती बताती हैं, उन्हें राज्य सरकार से पिछले साल केवल सात महीने के लिए 1,000 रुपये का प्रोत्साहन मिला था। इस साल उन्हें कुछ नहीं मिला है।

छत्तीसगढ़ में आशा को कोविड ड्यूटी के लिए चौदह महीने में केवल दो महीने के लिए 1,000 रुपये मिले हैं।

उधर फरवरी माह में को जारी स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रेस बयान के अनुसार, "नवंबर, 2020 तक, 9,53,445 आशा और 36,716 आशा सहायकों को कोविड-19 प्रोत्साहन राशि का भुगतान कर दिया गया है।" हालांकि, बड़ी संख्या में आशाओं की शिकायत है कि उन्हें पिछले साल जून या जुलाई तक 1,000 रुपये प्रति माह प्रोत्साहन राशि मिली। इसके बाद उन्हें कुछ नहीं मिला, भले ही उन्होंने पिछले एक साल के दौरान कोरोना ड्यूटी जारी रखा हो। पिछले साल केवल दो महीने के लिए पैसा (1,000 रूपये प्रति माह) मिला था।

बीमा कवरेज से भी वंचित हैं आशा

पिछले साल केंद्र सरकार ने आशा कार्यकर्ता सहित सभी स्वास्थ्य वर्कर के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज बीमा योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत कोरोना वायरस के कारण मौत होने वाले हेल्थ वर्कर को 50 लाख रुपये का जीवन बीमा कवर दिया गया। यह योजना इस साल 24 मार्च को समाप्त हो गई। काफी आलोचना के बाद इस बीमा योजना को 20 अप्रैल को एक वर्ष की अवधि के लिए बढ़ा दिया गया। हालांकि, केंद्र सरकार आशा कार्यकर्ताओं के बीमा को लेकर कोई स्पष्ट पॉलिसी जारी नहीं की है। इस वर्ष 25 मार्च से 19 अप्रैल के बीच पांच आशाओं की मौत हुई है। उन्हें कोई बीमा कवरेज मिलेगा? इसका कोई ठोस जवाब देने वाला नहीं है। आशा कार्यकर्ताओं का हाल यह है कि आदमी जब जिंदा रहता है तब एक रूपया भी नहीं मिलता है, अब पता नहीं 50 लाख मरने के बाद भी मिलेगा या नहीं।

कोरोना में जान हथेली पर लेकर काम कर रहीं आशा वॉरियर्स को नहीं मिलती जरूरी मेडिकल सुविधायें

डबल मास्क लगाने पर विशेषज्ञ दे रहे जोर, मगर आशा वर्कर्स के पास नहीं सिंगल भी

कोरोना के समय आशा को जहां मास्क तक नहीं मिल रहा है, वहीं अब डबल मास्क लगाने पर जोर दिया जा रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के अनुसार डबल मास्क (सर्जिकल मास्क के ऊपर एक कपड़ा मास्क या दो कपड़े मास्क पहनना) पहनने से कोरोनो वायरस का खतरा लगभग 95 प्रतिशत तक कम कर देता है। यह चेहरे पर अच्छे तरह से फिट हो जाता है और बाहर के हवा को रोकने में मदद करता है, पर देश में आशा कार्यकर्ताओं के पास सरकार द्वारा दी जाने वाली एक सर्जिकल मास्क भी नहीं है। यह स्थिति तब है, जब देश कोरोना महामारी की दूसरी लहर से बुरी तरह से परेशान है।

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