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भारत में कैसे कर्ज के जाल में फंसाने वाले चीन में बने इंस्टेंट लोन ऐप के रैकेट में उछाल आया?

Janjwar Desk
13 Jan 2021 7:01 PM GMT
भारत में कैसे कर्ज के जाल में फंसाने वाले चीन में बने इंस्टेंट लोन ऐप के रैकेट में उछाल आया?
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एक ही साॅफ्टवेयर द्वारा बड़ी संख्या में अलग-अलग इंस्टेंट लोन ऐप का संचालन होता है, पर उनकी अलग-अलग ब्रांडिंग होती है। चीनी निवेशक इन ऐप्स को अलग-अलग छद्म डायरेक्टर के साथ भारत लाते हैं।

मिथुन एमके

हैदराबाद के रहने वाले भुमना प्रसाद ने एक ऐप माइ बैंक से नवंबर 2019 में 3500 रुपये का कर्ज लिया। एक सप्ताह के अंदर उन्होंने ब्याज सहित कर्ज चुका दिया। इसके बाद जल्द ही 4400 रुपये का एक और माइक्रो लोन ले लिया। हालांकि कुछ ही दिनों में भुमना को तब अजीब लगा जब उनके एसबीआइ खाते में 26 हजार रुपये विभिन्न स्रोतों से जमा हो गए। ये पैसे 14 विभिन्न कर्ज देने वाले ऐप के जरिए जमा हुए जिसे उन्होंने कभी डाउनलोड नहीं किया था और बहुत जल्द उन सभी ऐप ने उन्हें उसे चुकाने के लिए परेशान करना शुरू कर दिया जो अब कुल राशि 44, 000 रुपये बतायी गयी।

इन ऐप्स ने भुमना को कर्ज क्यों दिया? पुलिस इस बात को मान कर चल रही है कि माई बैंक ऐप ने उनके डिटेल को उसी कंपनी जिया लियांग टेक्नोलाॅजी द्वारा चलाये जाने वाले अन्य दूसरे ऐप को दे दिया। जैसा कि जांचकर्ताओं व विशेषज्ञों का कहना है कि यह कपट इंस्टेंट यानी त्वरित लोन ऐप द्वारा अपनाया गया काम करने का ढंग है। वे आपके निजी डेटा को इकट्ठा करते हैं, उसे वे आपको परेशान करने के लिए उपयोग करते हैं और अन्य आपसे उच्च ब्याज दर जो कभी-कभी 200 से 500 प्रतिशत तक होती है, को हासिल करने के लिए अन्य तरीकों का उपयोग करते हैं।

और यह ऐप्स अन्य दूसरी चीजों, जैसे - फोन, प्लास्टिक खिलौनों, कपड़ों की तरह चीन में निर्मित एक फिनटैक घोटाला है।

यह धोखाधड़ी कैसे होती है?

मार्च 2020 में शुरू हुए कोविड19 महामारी की वजह से बेरोजगारी और सैलरी में कटौती जैसी समस्याएं बढी हैं। इस वजह से लोगों की कर्ज की जरूरतें काफी बढ गयीं। यह समय त्वरित कर्ज देने वाली ऐप के लिए भारत में माकूल समय साबित हुआ जब वे अपना कारोबार बढाने के लिए ग्राहकों को हासिल कर सकें।

ये कंपनियां हर किसी को बहुत अधिक ब्थ्याज दर पर लोन देती हैं। ऐसे में भले ही कोई डिफाॅल्ट हो जाए, उससे कपंनी को बहुत नुकसान नहीं होता है।

इसकी लोकप्रियता का कारण यह भी है कि यह सभी को कर्ज देता है, उस व्यक्ति के कर्ज चुकाने की साख की परवाह किए बिना और बिना केवाइसी दस्तावेज व एक निश्चित कर्ज समझौते के भी।

डिजिटल लैंडर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष व सचिव एवं मनीटेप के सीओओ अनुज काकर कहते हैं, मनीटेप में हम 95 प्रतिशत लोगों को खारिज करते हैं और ये ऐप 95 प्रतिशत लोगों को स्वीकार करते हैं। कर्ज देने में आपको स्वीकृत करने से अधिक अस्वीकार करना चाहिए क्योंकि आप उन लोगों को पैसा नहीं देना चाहते हैं जिनके पास कर्ज चुकाने के लिए साधन, क्षमता व इरादा नहीं है।

लेकिन, एक बार जब भुमना जैसे लोग फंस जाते हैं तो रिकवरी एजेंट लोन रिकवरी, फोन कांट्रेक्टर, तसवीरें, लोकेशन आदि हासिल करने के लिए जबरदस्ती करते हैं। इन लोन डिफाॅल्टर के फोन के डेटा का इस्तेमाल उनको धमकी भरे काॅल करने के लिए किया जाता है, जो उनके द्वारा संचालित किए जा रहे काॅल सेंटरों से किया जाता है। ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब महिला लोन डिफाॅल्टर की तसवीर उनके फोन से ली गयी, उसमें छेड़छाड़ कर अश्लील सामग्री तैयार की गयी ओर उक्त डिफाॅल्टर के कांटेक्ट व वाट्सएप ग्रुप के जरिए शेयर किया गया।

चीन में बने ऐप

चीन में इंस्टेंट लोन के इन तरीके का उपयोग 2012 की शुरुआत से 2016 में तब तक किया गया जब कि इस लूट लेने वाले तरीके को लेकर चीन ने 100 बिलियन डाॅलर का कर्ज जारी किया। इस कदम ने इस सेक्टर को खत्म कर दिया।

चीन ने एक इंटरनेट फाइनेंशियल रिस्क स्पेशल रेक्टिफिकेशन वर्क लीडरशिप टीम आॅफिस की स्थापना की और इंस्टेंट लोन ऐप को दो साल का समय लोन चुकाने के लिए दिया और इस उद्योग से बाहर निकलने को कह दिया, इससे कई कर्जदाताओं ने भारत की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।

चीनी स्वामित्व वाले ऐप्स पर पुलिस की ओर से अबतक की गयी कार्रवाई के परिणामस्वरूप दक्षिण भारत में तीन पुलिस टीमों ने सात चीनी नागरिकों और 35 से अधिक भारतीयों को गिरफ्तार किया। पुलिस का कहना है कि वे अब भी कंपनियों की वेबसाइट की जांच कर रहे हैं और प्रवर्तन निदेशालय ने भी इसकी जांच शुरू की है।

भारत में आयात


चेन्नई के किमिनोलाॅजी के एक छात्र बालाजी विजयराघवन ने अक्टूबर 2020 में स्नेपिट नाम का ऐप इंस्टाल किया था, जिसे बाद में गूगल ने हटा दिया। इसमें उन्होंने देखा कि उनके बैंक खाते में ऐसे ट्रांजेक्शन किए जा रहे हैं जो उनसे लिंक्ड नहीं हैं। बालाजी कहते हैं कि जब उनके परिवार में एक शख्स की मौत हो गयी तो उन्हें कुछ और पैसों की जरूरत हुई तो उन्होंने ऐसे जगहों को चिह्नित करना शुरू किया जहां से लोन मिल सके। उन्होंने पाया कि उनके बैंक खाते में 90 हजार रुपये जमा हुए लेकिन 8.49 लाख रुपये का ट्रंाजेक्शन हुआ। बालाजी अब ऐप के जरिए धोखाधड़ी के ऐसे मामले की जांच को लेकर तेलंगाना और महाराष्ट्र पुलिस के साथ सहयोग कर रहे हैं।

बालाजी सेव इंडिया फाउंडेशन के सदस्य हैं जो भारत में एक साइबर सिक्यूरिटी प्रोफेशनल की इंस्टेंट लोन की जांच करने वाली एक टीम है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर में सालाना फिनटेक एक्सपो के आयोजन के जरिए ये भारत में प्रवेश कर गए।

बालाजी कहते हैं, जब यह आयोजन एक सकारात्मक भावना से आयोजित किया जाता है, तब प्रदर्शनी में शामिल चीन के कुछ लोग वहां त्वरित ऋण ऐप प्रदर्शित करते हैं और कुछ भारतीय कारोबारी उनके व्यवसाय माॅडल से आकर्षित होते हैं। बालाजी कहते हैं कि साॅफ्टवेयर डेवलपमेंट किट या तो नाम मात्र की कीमत पर या भारतीय फर्म में निवेश करने वाले चीनी के लिए इक्विटी के रूप में बेची जाती है।

कैसलेस कंज्यूमर के श्रीकांत एल कहते हैं, इनमें 85 प्रतिशत ऐप को एक जैसे साॅफ्टवेयर किट का उपयोग कर जारी किया गया, इसलिए यह ऐसी कंपनी है जो व्हाइट लेवल ऐप बनाती है जबकि कंपनी विशेष उस पर अपना ब्रांड नाम लगाती हैं। हमने तीन से चार व्हाइट लेबल कंपनियों को देखा कि जो इन ऐप पर आधारित हैं। कैसलेस कंज्यूमर डिजिटल भुगतान के बार में जागरूकता बढाने के लिए काम करती है। इसने 1050 इंस्टेंट लोन ऐप के कामकाज में कई अनियमितताएं पायीं। इनमें से लगभग 750 ऐप अभी भी गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध हैं। इनमें से मात्र 300 के पास वेबसाइट्स हैं जिनमें बहुम कम सूचनाएं हैं और सिर्फ 90 के पास एक तय पता है।

कहा जाता है कि चीनी नागरिक जो इन इंस्टेंट लोन ऐप कंपनी को स्थापित करना चाहते हैं वे प्राॅक्सी के रूप में डायरेक्टर का इस्तेमाल करते हैं और फिर कंपनी स्थापित करने के लिए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की मदद ली जाती है।

यह एक एक डेटा युद्ध है?

कैशलेस कंप्यूमर का कहना है कि 2020 में भारत में इंस्टेंट लोन ऐप्स के रजिस्ट्रेशन में एक बड़ा उछाल देखा गया। सभी ऐप यूजर्स के डेटा और निजी सूचनाएं स्टोर करने के लिए चीनी सर्वर का उपयोग करते पाए गए। इंस्टेंट लोन ऐप्स की सही संख्या अभी तक पूरी तरह ज्ञात नहीं है।

कैशलेस कंज्यूमर के श्रीकांत एल कहते हैं कि एक माॅडल में देखा गया कि कुछ व्यक्ति आए और भारतीयों की मदद से एक कंपनी बनायी और उसे स्थापित किया। इसने माइक्रो फाइनेंस कंपनी के रूप में दो हजार रुपये तक के कम लोन की राशि के लिए इसे स्थापित किया और सारा लेन-देन डिजिटल भुगतान गेटवे जैसे गूगल पे, पेटीएम और माध्यमों से किया जाएगा।

श्रीकांत ने एक वेबिनार में बोलते हुए कहा इन किलर ऐप्स में विेश्लेषण किए गए 1050 में में करीब 600 को कर्ज को लेकर सत्यता की पुष्टि के लिए सेल्फी के रूप में यूजर को प्रमाणित करने जैसी प्रक्रियाएं की।

शोधकर्ता कहते हैं, कैशलेस कंज्यूमर ने पाया कि इन ऐप्स में ली गयी सेल्फी आर्टिफिशियलइंटेलीजेंस साॅफ्टवेयर के जरिए चीन के सर्वर से संचालित होती है। यह गैर मामूली लग सकता है, लेकिन एक राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता का विषय है।

यह व्यक्ति की निजी जानकारी के साथ उसके चेहरे की पहचान योग्य तसीवरों को एकत्र करता है। इसलिए यदि व्यक्ति ने कर्ज के लिए आवेदन करते समय आधार का ब्ब्यौरा भी प्रदान किया है तो इसमें व्यावहारिक रूप सेें आधार डेटाबेस को प्रतिरूपित करने की क्षमता है। यह एक समानांतर आधार प्रणाली का निर्माण कर सकता है। वे कहते हैं कि इसमें गहराई से अध्ययन करने की जरूरत है कि वे किस तरह के डेटा का संग्रहण और प्रोसेसिंग कर रहे हैं।

भारत इस धोखाधड़ी के लिए क्यों है माकूल?

अनुज काकर कहते हैं कि दिन भर में कर्ज का भुगतान एक अत्यंत लाभदायक कारोबार है और इसलिए यह कई लोगों को तुरंत आकर्षित करता है। जबकि इन सालों में यह दिखा है कि यह लाभकारी धंधा है और यह सभी प्रकार के कर्ज के जाल में फंसाने वाला है इसलिए इसे दुनियाभर के कई देशों में बैन किया गया है। ऐसा ब्रिटेन में, कई अफ्रीकी देशों, चीन और इंडोनेशिया में हुआ है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत इस कारोबार के लिए परिपक्व था क्योंकि हम उच्च ब्याज दर पर असंगठित कर्ज के लिए नहीं नहीं थे, यह स्थानीय असंगठित साहूकारों के बीच पहले से मौजूद है। अनुज के अनुसार, अब हुआ यह है कि फिजिकल मार्केटप्लेस की जगह इसे करने के लिए लोगों ने ऐप्स बनाए हैं।

वह कहते हैं कि भारत में नियामक के अधिकतर देशों की तुलना में सख्त होने के बावजूद जल्दी पैसा बनाने की चाह रखने वालों के लिए यह जोखिम उठाने लायक है।

अनुज कहते हैं, वे बहुत अवसरवादी हैं और लंबी अवधि के लिए यहां नहीं हैं। वे तब तक यहां हैं जबतक की कुछ पैसेे कमा सकते हैं और आगे बढ सकते हैं।

आरबीआइ की अबतक की कार्रवाई और आगे क्या किया जा सकता है?

रिजर्व बैंक ने दिसंबर में इन त्वरित कर्ज दाता कंपनियों की कार्यप्रणाली का नोटिस लिया और एक चेतावनी दी और जनता को अनधिकृत डिजिटल लोन अप्लीकेशन से दूर रहने को कहा।

आरबीआइ ने अज्ञात व्यक्तियों, असत्यापित-अनधिकृत ऐप के साथ केवाइसी दस्तावेज साझा नहीं करने का लोगों से आग्रह किया और लोगों से ऐसी धोखाधड़ी गतिविधियों की सूचना संबंधित सरकारी एजेंसियों को देने व आरबीआइ के सचेत पोर्टल पर देने को कहा।

आरबीआइ ने बैंकों और एनबीएफसी के हवाले से उपयोग किए जाने वाले डिजिटल लेंडिंग प्लेटफाॅर्म को ग्राहकों के लिए बैंक या एनबीएफसी के नाम को प्रकट करने का आदेश दिया है।

वहीं, ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि आरबीआइ इन कर्ज देने वाले ऐप्स के धन के स्रोत को देख रहा है, हालांकि कोई अग्रिम कार्रवाई नहीं की गयी है।

डिजिटल लैंडर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का सुझाव है कि 60 दिनों से कम की अवधि के लिए कर्ज की अनुमति नहीं देने के लिए एक कानून होना चाहिए और लोन को प्रोसेस करने से पहले ब्याज दरों को ग्राहकों के सामने स्पष्ट किया जाना चाहिए।

जैसे ही आप न्यूनतम 60, 90 या 120 दिन की अवधि तय करना शुरू करते हैं तो पैसों का रोटेशन आसान नहीं होता है और कंपनियों को बहुत अधिक पूंजी जुटाने की जरूरत होती है और उचित वसूली आदि की जरूरत भी होती है। अनुज कहते हैं तब आप बहुत अधिक ब्याज दर नहीं मांग सकते हैं जो कारोबार को कम लाभदायक बनाता है और मार्जिन को भी कम करता है।

(हरिप्रिया सुरेश के इनपुट्स के साथ।)

(द न्यूज मिनट्स से साभार अनूदित।)

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