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आर्थिक

Write off loan : मोदी राज में बैंकों ने बट्टे खाते में डाले 9.92 लाख करोड़, गीतांजलि जेम्स ने लगाया सबसे ज्यादा चूना

Janjwar Desk
6 Aug 2022 8:55 AM GMT
Write off loan : मोदी राज में बैंकों ने बट्टे खाते में डाले 9.92 लाख करोड़, गीतांजलि जेम्स ने लगाया सबसे ज्यादा चूना
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Write off loan : मोदी राज में बैंकों ने बट्टे खाते में डाले 9.92 लाख करोड़, गीतांजलि जेम्स ने लगाया सबसे ज्यादा चूना

Write off loan : विगत 5 सालों में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों ने 9,91,640 करोड़ रुपए का लोन बट्टे खाते में डाले हैं। बैंक ऐसा अपनी बैलेंस शीट को दुरुस्त करने के लिए करते हैं लेकिन इसका नुकसान सभी को उठाना पड़ता है।

Write off loan : एक तरफ मोदी सरकार सब्सिडी समाप्त कर और गरीब जनता पर टैक्स का बोझ डाल खून चूसने में लगी है तो दूसरी तरफ पिछले पांच सालों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ( SCB ) ने लगभग 10 लाख करोड़ रुपए बट्टे खाते ( NPA ) में डालकर उद्योगपतियों ( Industrialist and Traders ) को वारे-न्यारे करने का मौका दिया है। वित्त राज्यमंत्री भागवत के कराड ने संसद ( Parliament ) को खुद इस बात की जानकारी दी। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि बैंकों ( SCB Banks ) ने सूचना अधिकार के तहत बड़े डिफॉल्टरों के नाम और उनके शेयरधारकों के साथ, वित्त मंत्रालय, गीतांजलि जेम्स लिमिटेड द्वारा एक डिफॉल्ट के साथ साझा की गई सूची साझा करने से इनकार कर दिया था।

एक प्रश्न के लिखित जवाब में वित्त राज्य मंत्री ने बताया कि वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान बट्टे खाते में डाली जाने वाली राशि इससे पिछले वित्त वर्ष के 2,02,781 करोड़ रुपए की तुलना में घटकर 1,57,096 करोड़ रुपए रह गई हैं। वर्ष 2019-20 में बट्टे खाते में डाली गई राशि 2,34,170 करोड़ रुपए थी, जो वर्ष 2018-19 में 2,36,265 करोड़ रुपए के पांच साल के रिकॉर्ड स्तर से कम था। वर्ष 2017-18 के दौरान बैंकों ने बट्टे खाते में 1,61,328 करोड़ रुपए डाली थी। मंत्री ने कहा कि कुल मिलाकर पिछले पांच वित्त वर्ष 2017-18 से 2021-22 में 9,91,640 करोड़ रुपए का बैंक ऋण बट्टे खाते में डाला गया है।

चौंकाने वाली बात यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ( SCB ) ने नागरिकों के साथ सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत बड़े डिफॉल्टरों के नाम और उनके शेयरधारकों के साथ, वित्त मंत्रालय, गीतांजलि जेम्स लिमिटेड द्वारा एक डिफॉल्ट के साथ साझा की गई सूची साझा करने से इनकार कर दिया था। यहां पर इस बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि 7,110 करोड़ रुपए के साथ गीतांजलि जेम्स देश में सबसे बड़ा विलफुल डिफॉल्टर है।

25 कर्जदारों ने 58,958 करोड़ के ऋण को किया डिफॉल्ट

वित्त राज्य मंत्री डॉ भागवत कराड ने बताया कि टॉप 25 बड़े कर्जदारों ने 58,958 करोड़ रुपए के ऋण को डिफॉल्ट किया है। गीतांजलि जेम्स के अलावा अन्य शीर्ष 10 बड़े डिफॉल्टर हैं। एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग लिमिटेड 5, 879 करोड़ रुपए, कॉनकास्ट स्टील एंड पावर लिमिटेड 4,107 करोड़ रुपए, आरईआई एग्रो लिमिटेड 3,984 करोड़ रुपए, एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड 3,708 करोड़ रुपए, फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड 3,108 करोड़ रुपए, विनसम डायमंड्स एंड ज्वैलरी लिमिटेड 2,671 करोड़ रुपए, रोटोमैक ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड 2,481 करोड़ रुपए, कोस्टल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड 2,311 करोड़ रुपए और यश केमी लिमिटेड 2,082 करोड़ रुपए।

डॉ कराड ने बताया है कि एससीबी और सभी भारतीय वित्तीय संस्थान बड़े क्रेडिट सीआरआईएलसी डेटाबेस पर सूचना के केंद्रीय भंडार के तहत भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई को 5 करोड़ रुपए और उससे अधिक के कुल क्रेडिट एक्सपोजर वाले सभी उधारकर्ताओं की कुछ क्रेडिट जानकारी की रिपोर्ट करते हैं। आरबीआई के मुताबिक विलफुल डिफॉल्टर्स के संबंध में सीआरआईएलसी डेटा वित्त वर्ष 2019 से बनाए रखा जाता है। पिछले चार वित्तीय वर्षों के अंत में एससीबी में विलफुल डिफॉल्टरों की कुल संख्या 10,306 है।

मंत्री द्वारा साझा की गई जानकारी से पता चलता है कि वित्त वर्ष 17.18 से वित्त वर्ष 21.22 तकए 12 पीएसबी ने 7,27,320 करोड़ रुपए के बुरे ऋणों को बट्टे खाते में डाल दिया। अकेले भारतीय स्टेट बैंक ने इन पांच वित्तीय वर्षों में 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का बट्टे खाते में डाला। वित्त वर्ष 2017-18 तक आईडीबीआई राज्य द्वारा संचालित ऋणदाता था और उस वित्तीय वर्ष के दौरान 12,515 करोड़ रुपए बट्टे खाते में डाले थे।

गीतांजलि जेम्स लिमिटेड पर सबसे ज्यादा बकाया

जानबूझकर चूक करने वालों की सबसे अधिक संख्या वर्ष 2020-21 में थी। उस दौरान 2,840 ने ऋण लौटाने में चूक की थी। उसके अगले वर्ष यह संख्या 2,700 थी। मार्च 2019 के अंत में ऐसे चूककर्ताओं की संख्या 2,207 थी जो वर्ष 2019-20 में बढ़कर 2,469 हो गई। मार्च 2022 तक शीर्ष 25 चूककर्ताओं का विवरण साझा करते हुए कराड ने कहा कि गीतांजलि जेम्स लिमिटेड इस सूची में सबसे ऊपर है। इसके बाद एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग, कॉनकास्ट स्टील एंड पावर, आरईआई एग्रो लिमिटेड और एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड का स्थान है।

दरअसल, बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ कर लाभ का लाभ उठाने और पूंजी को अनुकूलित करने के लिए अपने बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति के मुताबिक राइट ऑफ के प्रभाव का मूल्यांकन और विचार करते हैं। चूंकि बट्टे खाते में डाले गए ऋणों के उधारकर्ता चुकौती के लिए उत्तरदायी बने रहते हैं और बट्टे खाते में डाले गए ऋण खातों में उधारकर्ता से देय राशि की वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है।

संसद में जवाब देने के मजबूर हुई सरकार

कांग्रेस नेता और सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने पिछले पांच वित्तीय वर्षों के दौरान बट्टे खाते में डाले गए कर्ज, विलफुल बैंक डिफॉल्टरों की कुल संख्या, शीर्ष 25 डिफॉल्टरों की सूची और प्रत्येक मामले में शामिल राशि की जानकारी मांगी थी।

Write off loan : राइट ऑफ लोन क्या होता है

बैंक जब अपने ग्राहकों से कर्ज की वसूली नहीं कर पाते तो वह राशि नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स यानी एनपीए में चली जाती है। जब बैंकों का एनपीए काफी अधिक हो जाता है तो वे एनपीए की इस राशि को बट्टे खाते में डाल देते हैं यानी अर्थात राइट ऑफ कर देते हैं। बैंक चार साल पुराने फंसे हुए कर्ज को बैलेंस सीट से हटा देते हैं। इसका मकसद अपनी बैलेंस शीट को दुरुस्त करना होता है। इसे ही राइट ऑफ या बट्टे खाते में डाले जाने का नाम दिया जाता है। बट्टे खाते में डाले जाने के बाद भी कर्ज की वसूली की जाती है।

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