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भारत में कोरोना नरसंहार के लिए गोदी मीडिया जिम्मेदार, मोदी सरकार के साथ मिलकर घर-घर बांटी मौतें

Janjwar Desk
12 May 2021 6:01 AM GMT
भारत में कोरोना नरसंहार के लिए गोदी मीडिया जिम्मेदार, मोदी सरकार के साथ मिलकर घर-घर बांटी मौतें
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प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने कहा है, यदि मीडिया ने सरकार से तीखे प्रश्न पूछना और सरकारी दावों की तहकीकात कर जनता तक पहुंचाता, तो निश्चित तौर पर आज इस नरसंहार के दौर को नहीं देखना पड़ता...

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। अपने देश में फ़िल्मी और गैर-फ़िल्मी संगीत को बढ़ाने में, लोगों तक पहुंचाने में एचएमवी, यानी "हिज मास्टर्स वौइस्" की भूमिका अग्रणी रही है। यह कंपनी तो बंद हो गयी, पर लगता है आज के दौर के भारतीय पत्रकारों का मूलमंत्र ही एचएमवी बन गया है, क्योंकि अब वे पत्रकारिता नहीं करते, बल्कि केवल अपने मास्टर यानी आका की बात का प्रसार करते हैं।

हाल में ही प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम में एक लेख प्रकाशित हुआ है, "It isn't Just Modi – India's Compliant Media Must also Take Responsibility for the Covid 19 Crisis"। 3 मई को प्रकाशित इस लेख के शीर्षक से ही समझा जा सकता है कि इसमें एचएमवी मीडिया के बारे में क्या लिखा गया होगा। इस लेख में जगह-जगह "गोदी मीडिया" लिखा गया है।

इस लेख के अनुसार, देश में कोविड 19 की वर्तमान स्थिति के लिए केवल सरकार ही नहीं, बल्कि मीडिया भी उतना ही जिम्मेदार है। हालांकि अब स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि न चाहते हुए भी मीडिया को अब वो खबरें दिखानी पड़ रही हैं, जो सरकारी दावों की पोल खोल रही हैं और इस सरकार प्रायोजित नरसंहार को लोगों तक पहुंचा रही हैं।

पर अब बहुत देर हो चुकी है और मीडिया के लगातार लापरवाही की कीमत जनता चुका रही है। वर्ष 2014 के बाद से देश के मीडिया घरानों में प्रभावी बदलाव किये गए, जाहिर है यह सब सरकार के इशारे पर किया जा रहा था। लगभग हरेक मीडिया घराने से, विशेष तौर पर न्यूज़ चैनेल से हरेक वो पत्रकार जो निष्पक्ष था या फिर बीजेपी की नीतियों का खुले आम समर्थक नहीं था, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके बाद सभी मीडिया घरानों में ऐसे पत्रकारों का बोलबाला हो गया, जिनकी विशेषता पत्रकारिता नहीं बल्कि सरकारी चाटुकारिता थी।

इन पत्रकारों का काम महज सरकार के कामों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, नाकामियों पर पर्दा डालना और हरेक समस्या के लिए विपक्ष, निष्पक्ष विचारधारा, मुस्लिम्, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वामपंथियों, आंदोलनकारियों, गैर-सरकारी संगठनों को जिम्मेदार ठहराना रह गया। जाहिर है वर्ष 2014 के बाद से कभी मीडिया ने जनता के मुद्दों पर ध्यान ही नहीं दिया।

भारत को छोड़कर पूरी दुनिया में मीडिया के पास सरकार जाती है, पर हमारे देश में तो पूरा मीडिया ही पीएमओ से चलता है। यदि आज मेनस्ट्रीम मीडिया को जनता के बीच से हटा दिया जाए, तो देश की हालत बेहतर हो जायेगी। इस दौर में मुख्यधारा की मीडिया किसी समाचार के लिए नहीं है, बल्कि केवल मुनाफे के लिए काम करती है। सरकार के पास विज्ञापनों का एक बहुत बड़ा बजट है, पिछले वित्तीय वर्ष में हरेक दिन सरकार ने मीडिया घरानों को लगभग 2 करोड़ रुपयों का विज्ञापन दिया। सरकार इस बजट को हथियार के तौर पर उपयोग में लाती है, और केवल अपने समर्थक मीडिया घरानों को विज्ञापन मिलते हैं। पूंजीवादी मीडिया घराने, जाहिर है कुत्तों की तरह जंजीर से बंधे अपने आका के इशारे पर ही भौकेंगें, और आज देश में यही हो रहा है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत का स्थान 180 देशों में 142वें स्थान पर है, जबकि निर्वाचित सरकार के तख्तापलट करने वाले सैनिक शासन से घिरे म्यांमार के स्थान 140वां है। कोविड 19 के शुरुआती दौर से ही मुख्यधारा का मीडिया लगातार सरकारी तंत्र बनकर रह गया था, मीडिया के लिए यह वैश्विक महामारी नहीं थी बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धियों का आयोजन था। यह सरकारी तमाशे में चीयरलीडर्स की भूमिका निभाता रहा, सरकारी इशारे पर इसे धार्मिक रंग देता रहा, और सरकार के साथ ही तमाम फेक न्यूज़ फैलाता रहा।

कोविड 19 के दौर में नमस्ते ट्रम्प को एक महान आयोजन बताने वाले मीडिया ने कभी कोई प्रश्न नहीं किया। देश के सबसे नकारा स्वास्थ्य मंत्री ने 5 मार्च 2020 को ट्वीट किया था कि भारत को कोविड 19 से कोई डर नहीं है, क्योंकि यहां की स्वास्थ्य सेवायें विश्वस्तरीय हैं, और पूरी दुनिया इसकी प्रशंसा करती है। मीडिया ने इसे भी बड़े तामझाम से प्रचारित किया, पर कभी स्वास्थ्य व्यवस्था की पड़ताल करने का प्रयास भी नहीं किया।

इसके बाद अचानक लगे लॉकडाउन को मीडिया ने कोविड 19 के खिलाफ एक मास्टरस्ट्रोक की तरह प्रचारित किया। मोदी जी इसके बाद थालियां और तालिया बजवा रहे थे, मोमबत्तियां जलवा रहे थे और अस्पतालों में बैंड बजाकर पुष्पवृष्टि करवा रहे थे। अति उत्साहित मीडिया इसका प्रचार मोदी जी की लोकप्रियता बताने के लिए कर रहा था। मुख्यधारा का मीडिया कोविड 19 की पहली लहर के दौर में सरकारी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए पहले तबलीगी जमात और फिर सुशांत सिंह राजपूत के मुद्दे महीनों तक गढ़ता रहा।

मोदी जी ने काढ़ा से कोविड 19 का इलाज किया, तब हरेक समाचार में दिनभर काढ़ा को रामबाण बताया जाने लगा, जब उन्होंने क्लोरोक्वीन का नाम लिया तो मीडिया ने दिनभर इसके फायदे गिनाये। मीडिया एक पालतू कुत्ते की तरह वही करता रहा, जैसा आका ने कहा। फिर जब कोविड 19 के मामले कम होने लगे तो मीडिया ने कोविड 19 से युद्ध में मोदी जी को सबसे प्रभावी नेता के तौर पर प्रचारित किया, आश्चर्य यह है कि इस दौर में जब पूरी दुनिया अपने देश का तमाशा देख रही है, मीडिया का रवैया बिलकुल नहीं बदला है।

पूरी दुनिया जानती थी कि सीरम इंस्टीट्यूट केवल लाइसेंस के तहत कोविशील्ड का उत्पादन कर रहा है, पर मोदी जी देश को बताया की यह पूर्णतः स्वदेशी है, और मीडिया ने भी इसे रटना शुरू कर दिया, मोदी जी कहा हम पूरी दुनिया को टीका बाँट रहे हैं और मीडिया इसे नमक-मिर्च लगाकर पेश करता रहा।

टाइम के लेख के अनुसार यदि मीडिया ने सरकार से तीखे प्रश्न पूछना और सरकारी दावों की तहकीकात कर जनता तक पहुंचाता, तो निश्चित तौर पर आज इस नरसंहार के दौर को नहीं देखना पड़ता। एक एचएमवी ने तो भारतीय संगीत को घर घर पहुंचाया, पर एचएमवी मीडिया अब घर घर मौत पहुंचा रही है।

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