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जनज्वार विशेष

समाज, बाज़ार और सरकार के बीच फिर से संतुलन बनाना ही इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती

Janjwar Desk
10 May 2021 3:56 AM GMT
समाज, बाज़ार और सरकार के बीच फिर से संतुलन बनाना ही इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती
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photo :  village square

प्रेम जी अभी दो दशकों तक और अपने चहेते काम को खूब आगे बढ़ा रहे होते, उनके चहेते काम थे - मनुष्य द्वारा पैदा की गई बाढ़ और मुसहर समुदाय के खिलाफ किये जा रहे अन्याय के विरोध में अभियान चलाते रहना, लेकिन नियति को ये मंज़ूर नहीं था....

सामाजिक कार्यकर्ता और अर्घ्यम की संस्थापक अध्यक्ष रोहिणी निलेकणी का विशेष लेख

जनज्वार। 24 अप्रैल के दिन एक और ज़िंदगी समय से पहले ही काल के गाल में समा गई। नागरिक समाज ने एक और नेता खो दिया। मात्र 65 साल की उम्र में प्रेम कुमार वर्मा की दिल्ली में मृत्यु हो गई। वो बिहार के खगड़िया ज़िले में सक्रिय ग़ैर-सरकारी संगठन 'समता' के संस्थापक और सचिव थे। हर कोई उन्हें प्यार से केवल प्रेम जी कहता था।

प्रेम जी अभी दो दशकों तक और अपने चहेते काम को खूब आगे बढ़ा रहे होते। उनके चहेते काम थे - मनुष्य द्वारा पैदा की गई बाढ़ और मुसहर समुदाय के खिलाफ किये जा रहे अन्याय के विरोध में अभियान चलाते रहना, लेकिन नियति को ये मंज़ूर नहीं था।

दूसरे बहुत से लोगों की तरह प्रेम जी ने भी नागरिक सरोकारों से जुड़ा अपना काम एक ऐसे समाजवादी छात्र नेता के रूप में शुरू किया था जिस पर राम मनोहर लोहिया के विचारों का खासा प्रभाव था। बाद में 1970 के दशक में वो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसों के साथ गांधीवादी समाजवादी जय प्रकाश नारायण के चेले बन गए। इनका लक्ष्य "सम्पूर्ण क्रांति" के माध्यम से सामाजिक बदलाव लाना था, लेकिन इनमें से बहुतों को अपनी कोशिश के लिए जेल जाना पड़ा।

वो काल भारत के नागरिक समाज के लिए बहुत मुश्किल भरा था, क्योंकि 1975 में आपातकाल लगाए जाने से पहले अधिनायकवाद के काले बादल भारतीय लोकतंत्र के आसमान पर मंडराने लगे थे। लोकतंत्र, संवैधानिक शासन और न्याय को बचाये रखने के लिए बहुत सारे समूह एकजुट हो सके। यह बहुत मुश्किल और खतरनाक काम था, लेकिन इसने उस नींव का काम किया जिस पर सवार हो देश में नागरिक समाज के आन्दोलनों को ऐसे आदर्शवादी नेताओं के नेतृत्व में विस्तार मिला, जिनका नज़रिया समावेशी था और उद्देश्य समता एवं न्याय की स्थापना करना।

प्रेम जी ने समता नामक संस्था की स्थापना की। उद्देश्य था एक समानाधिकारवादी समाज की रचना करना। उन्होंने अपना ध्यान सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिये पर डाल दिए गए बिहार के मुसहर समाज पर केंद्रित किया और मानवाधिकार, बाढ़ राहत एवं पुनर्वास, पीने का साफ़ पानी, साफ़-सफ़ाई और रोज़ी-रोटी जैसे मुद्दों पर काम करना शुरू किया। समता मेघ पाइन अभियान नामक जल संरक्षण सहयोग में शामिल हो गई। मेरे फाउंडेशन अर्घ्यम को इस अभियान को समर्थन देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। अनेक नाकामयाबियों के बावजूद वो सामाजिक परिवर्तन और न्याय का अभियान लगभग पचास सालों तक बरकरार रख पाए।

सन 2007 में एक यादगार यात्रा के दौरान जब हम बिहार में एक साथ फील्ड विज़िट पर गए तो प्रेम जी ने मुझे अपना वो सिद्धांत समझाया जो यह बताता था कि दुनिया में चीज़ें इतनी इकतरफा क्यों होती है।

उन्होंने मुझसे कहा, "पहले जब राजा-महाराजा हुआ करते थे तो लोगों की ज़िंदगियाँ अपने समाज के इर्द-गिर्द घूमा करती थीं। लेकिन विडम्बना है कि राजशाही ख़त्म होने के बाद दुनियाभर में सरकारें बहुत शक्तिशाली होती चली गईं और लोक-कल्याण के शासनादेश का दावा करने लगीं।फिर समाज के नाम पर शासन चलाने लगीं और फिर बाद में बाज़ार की खिलाड़ी कम्पनियाँ वैश्विक होती चली गईं और इस प्रक्रिया में सरकारों से भी ज़्यादा ताक़त हासिल करती चली गईं। इसलिए सबसे ऊंची पायदान पर रहने वाले समाज की जगह पहले राज्य की ताक़त, और फिर बाजार की ताक़त स्थापित होती चली गई।"

उनके शब्दों का मुझ पर गहरा असर हुआ। मैं उस विचार पर ज़्यादा मनन करने लगी और मैंने ज़्यादा से ज़्यादा इतिहास की पुस्तकों को पढ़ना शुरू कर दिया, ताकि मैं इस सिद्धांत को आगे विकसित कर सकूं। अब मैं पूरी तरह आश्वस्त हो चुकी थी कि इस सदी का काम समाज, बाजार और सरकार के बीच के संतुलन को एक बार फिर स्थापित करना है। मैंने परोपकार के अपने कार्यों के केंद्र में समाज और सक्रिय नागरिकों को रखा ताकि बाज़ार और सरकारें व्यापक जनहित के प्रति ज़्यादा उत्तरदायी बनें।

मुझे इस राह पर चलाने के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया प्रेम जी!

देश में बहुत से प्रेम जी जैसे लोग हैं जो समाज में संवैधानिक मूल्यों को एकजुट करने के संघर्ष में डूबे हुए हैं। समाज में आमूल-चूल बदलाव लाने के लक्ष्य का पीछा करते-करते ये कभी-कभी अपने जीवन को भी दाँव पर लगा देते हैं।

ऐसे नेताओं का चला जाना कितनी बड़ी सामाजिक त्रासदी है, इसे आने वाले कुछ समय तक शायद समझा भी ना जा सके। क्योंकि दबाव बनाने वाली सरकारी नीतियों सहित बहुत से ऐसे तत्व हैं जो बहुत सारे छोटे संगठनों को अपना काम बंद कर देने पर मजबूर कर देते हैं, इसलिए समाज कुछ समय बाद ही इसके असर को समझ पायेगा।

यहाँ तक कि छोटे से छोटा ग़ैर-सरकारी संगठन भी वहां जाकर काम करता है जहां सरकार और बाज़ार नहीं पहुँच पाती या नहीं पहुंचना चाहती है। ये संगठन लोगों की आवाज़ बनते हैं। ये ऐसे मुद्दों पर रोशनी डालते हैं जिन्हें उठा कर भावी सुनामी को रोका जा सकता है। ये एक अच्छे समाज के निर्माण की सम्भावना को ठोस धरातल मुहैया करते दिखते हैं।

सामाजिक क्षेत्र के ऐसे पेशेवरों और स्वयंसेवकों की याद में, एक लचीले समाज को बनाये रखने और उसे समर्थन देने के लिए हमें एक बार फिर खुद को समर्पित करना होगा।

इसके लिए वर्तमान क्षण से बेहतर समय और क्या होगा?

(रोहिणी नीलेकणी जल के स्थायित्व और स्वच्छता के मुद्दों पर सक्रिय अर्घ्यम फाउंडेशन की फाउंडर अध्यक्ष हैं, उनका यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में पहले हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित।)

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