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Janjwar Exclusive: इस JDU नेता ने बाहुबली शहाबुद्दीन की हत्या करने को कहा था, रिटायर IPS ने खोला यह राज

Janjwar Desk
8 Jan 2022 5:08 AM GMT
Janjwar Exclusive: इस जदयू नेता ने बाहुबली शहाबुददीन की हत्या करने को कहा था, रिटायर IPS ने खोला यह राज
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Janjwar Exclusive: इस जदयू नेता ने बाहुबली शहाबुददीन की हत्या करने को कहा था, रिटायर IPS ने खोला यह राज

JDU leader wanted to killed Bahubali Shahabuddin: बिहार की राजनीति में दो दशक तक दबंग सांसद के रूप में मो.शहाबुददीन की पहचान रही। कभी जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर की हत्या में तो कभी पत्रकार राजदेव रंजन के कत्ल में शहाबुददीन का नाम साजिशकर्ता के रूप में आने पर देशभर में आंदोलन हुए।

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

JDU leader wanted to killed Bahubali Shahabuddin: बिहार की राजनीति में दो दशक तक दबंग सांसद के रूप में मो.शहाबुददीन की पहचान रही। कभी जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर की हत्या में तो कभी पत्रकार राजदेव रंजन के कत्ल में शहाबुददीन का नाम साजिशकर्ता के रूप में आने पर देशभर में आंदोलन हुए। कहा जाता है कि शहाबुददीन के राज में सीवान में उनका ही कानून चलता था। उस मो.शहाबुददीन को खत्म करने का तत्कालीन नीतीश सरकार के पार्टी के ही बाहुबली सांसद ने कहा था। इसका खुलासा एक रिटार्यड आईपीएस ने की है। ये आईपीएस उस समय सीवान जिले में एसडीपीओ के पद पर तैनात थे।

मैं यहां बात कर रहा हूं आईपीएस सुधीर कुमार सिंह की। डीआईजी के पद से सेवानिवृत होने के बाद राजनीति में अब श्री सिंह कदम रख चुके हैं।बिहार विधान सभा के पिछले चुनाव में सुधीर ने भाग्य भी आजमाया था,पर करारी हार का सामना करना पड़ा था। श्री सिंह सोशल मीडिया में हमेशा सक्रिय रहनेवाले आईपीएस इस बार अपने ही एक पोस्ट को लेकर चर्चा में हैं। जिसे उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है। इनके पोस्ट की एक एक लाईनें बहस तेज करने के लिए काफी है। बाहुबली सांसद के राज में जब सीवान शहर में चुनाव के दौरान गैर दलों का झंडा लगाने की किसी को हिम्मत नहीं थी,तब सुधाीर कुमार सिंह ने पहली बार सीवान का एसडीपीओ रहते हुए मो़.शहाबुददीन को चेतावनी दी थी।

सुधीर सिंह अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं, सिवान जिले में दबंग एसडीपीओ के रूप में रहा 2005 के नवम्बर से अप्रैल ,2009 तक। मेरी गाड़ी जब सड़कों पर निकलती थी ,तब अपराधियों की चीत्कार की आवाज बिहार के विभिन्न जिलों के पुलिस लॉगर पर गूंजने लगती थी ।मेरा सबसे महत्त्वपूर्ण टार्जेट मोहम्मद शहाबुद्दीन था और सरकार उसके विरुद्ध थी।मैं चाहता तो उसकी हत्या करवा सकता था और कहीं से चूँ की आवाज भी नहीं होती ।छपरा के एक दबंग सांसद जो संभवतः आज जेल में हैं ,ने मुझसे काफी अनुरोध कर कहा था कि शहाबुद्दीन को खत्म कर दीजिए ।मैं सिर्फ हँसता रह गया था ,क्योंकि मुझे अहसास था कि मेरा अन्तः मन कभी भी हत्या का आदेश नहीं दे सकता है। यह तो सही है कि राजद के भूमिहार -विरोधी रवैये के कारण मुझे उससे नफरत सी थी और मुझमें एक प्रतिशोध का भाव था ,पर मैंने कभी भी उसे सीमा का अतिक्रमण करने नहीं दिया ।

रामनगर में शहाबुद्दीन के ही चेले फखरुद्दीन ने मेरे रामनगर थाना -प्रभारी के सामने कुछ गर्मी दिखाने का प्रयास किया ।पूर्व एसडीपीओ श्री अशोक जी के साथ बदतमीजी करने की अफवाह फैली थी । अपहरण की दो घटनाओं में उसकी संलिप्तता की आशंका थी और फिर उसने मेरे शेष कार्यकाल भर रामनगर में कदम नहीं रखा और उसने मैजिस्ट्रेट के यहाँ आवेदन दिया कि एसडीपीओ उसकी जान लेना चाहते हैं ।पर ईश्वर गवाह है कि किसी की जान लेने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता था ।अपराधी भयभीत होकर अपराध से विराम ले ले -बस ,इसे ही मैं वर्दी के कर्त्तव्य की सिद्धि मानता था ।पुलिस का चतमेमदबम अंसनम होना चाहिए ।हत्या -रक्तपात से अपराध नियंत्रण नहीं होता है ।

मुझे गर्व है कि मैंने कहीं भी, कभी भी अपने सेवा -क्षेत्र में गोली नहीं चलवाई ,पर मुझे खुद आश्चर्य होता था यह देखकर कि अपराधी मेरी छाया से भी डरते थे ,जबकि आमलोग मुझसे खुलकर मिलते और बात करते थे। सिवान में मेरी घोषणा थी कि यदि मेरे किसी सिपाही को भी कोई अपराधी एक चाँटा मार देगा ,तो मैं नौकरी से रिजाइन कर दूँगा । जिस सिवान में दरोगा और इंस्पेक्टर की हत्या होती रही थी ,जहाँ पान की दुकान पर किसी सरकारी कर्मी से पहले शहाबुद्दीन के गुर्गों को पान परोसा जाता था ,वहाँ मेरे चौकीदार भी शान से घूमते थे।

मैंने कई नक्सलियों को गिरफ्तार किया था ,पर सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब 72 लाख के इनामी नक्सलियों को पकड़ा। कुल सात नक्सली एक साथ पकड़े गये थे जिनमें तीन पॉलित ब्यूरो के सदस्य थे ।इनपर आंध्र ,छत्तीसगढ़ ,झारखंड और बिहार सरकार द्वारा कुल 72 लाख के पुरस्कार घोषित थे ।यदि भारत सरकार द्वारा दिये जाने वाले तमगे यानी गैलेंट्री के प्रति आसक्ति होती तो ,तो हथियार की झूठी बरामदगी और झूठा एनकाउंटर दिखाकर कहानी बुन सकता था ।मैं तो भूमिहार था और नक्सलियों के प्रति मुझमें जातीय आक्रोश भी था ,पर ईश्वर साक्षी है कि एक बार भी मेरे दिमाग में यह नहीं आया कि इनकी हत्या कर अपनी बहादुरी के गीत रचूं । परिणामतः गैलेंट्री तो नहीं ही मिल सकी ,पुरस्कार के पैसे भी पता नहीं किस गुप्त खाते में चले गए ।काश ! मेरे सर पर भी किसी बड़े ओहदे का वरदहस्त होता ।

लालू जी के शासनकाल में भूमिहार अफसरों के विरुद्ध कोल्ड स्टोरेज नीति चलायी गयी थी ।अतः मेरी फील्ड पोस्टिंग तो जदयु सरकार बनने के ही बाद ही हो सकी थी और इसके बाद ही मुझे अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला था ।मेरे अन्दर एक तरह का अव्यक्त आक्रोश था राजद के नेताओं के प्रति ।लेकिन कहीं भी यह आक्रोश गम्भीरतम से गम्भीरतम परिस्थितियों में भी हत्या -रक्तपात में नहीं बदल सका । रात के अँधेरे में दो दो घंटे तक रोड़े बरसाए जाते रहे थे ,मेरे सहयोगी मेरे विरुद्ध तरह तरह की फब्तियाँ कसने लगते थे ,पत्रकारों की टीम खौफजदा हो जाती थी ,पर मैं शांतिपूर्वक बैठा रहता था ,ताकि हुल्लड़बाज थक जायें और फिर मेरे सुरक्षाकर्मी सिर्फ लाठी भांजकर उन्हें नियंत्रित करने में सफल हो जायें ।छपरा ,जमुई ,मोतिहारी में एसपी गिरी के दरम्यान कई बार दंगे शुरू हुए ,पर मुझे घटनास्थल पर पहुँचने में आधे घंटे से ज्यादा समय नहीं लगा और वगैर गोली -बारी दूध के उफान की तरह दंगे शांत हो गए ।

मुझे विश्वास हो चला है कि सहरसा में पप्पू देव की हत्या हुई है। यह सही है उसका आपराधिक इतिहास था।लेकिन भारतीय संस्कृति ने तो डकैत रत्नाकर को भी वाल्मीकि बनते देखा है और भारतीय दण्ड विधान तो वेश्या के साथ भी किये गए अतिचार को बलात्कार और दण्डनीय मानता है। सुनते हैं पप्पू देव एक अच्छे इंसान के रूप में जीना चाह रहा था ,हालाँकि यह भी अफवाह है कि वह ए के 47 जैसे आग्नेयास्त्र इकट्ठा कर रहा था। लेकिन अफवाह तो अफवाह होती है। बरामदगी या अन्य साक्ष्यों के बिना इसे सच कैसे माना जा सकता है ? फिर भी हत्या को औचित्यपूर्ण कैसे माना जा सकता है ? यदि अपराधी की ओर से चली गोलियों से कोई पुलिसकर्मी घायल हो गया होता ,तो फिर मुठभेड़ की कहानी खींच -खाँच कर सही मानी जा सकती थी।

खैर ,मैं तो नीतीश जी से यही उम्मीद करता हूँ कि वे सारी जानकारियां इकट्ठी कर बयान दें और बताएँ कि पुलिस उनकी निगाह में दोषी या निर्दोष है ताकि विरोधियों का मुँह बन्द हो सके और समर्थक सर उठाकर कह सकें कि यह सुशासन की सरकार है ,अन्यथा तो जनता का आक्रोश बढ़ेगा ही और भूमिहार इसमें अग्रणी भूमिका निभायेंगे। नीतीश जी , आप की लवकुश पार्टी के समानांतर राजद भी है ।कहीं ऐसा न हो कि भूमिहार राजद की तरफ मुड़ जायें ।

आईपीएस के बयान पर राजनीति गरमाने के आसार

मो.शहाबुददीन की हत्या करने की बात कहनेवाले जिस सांसद की बात आईपीएस सुधीर सिहं कह रहे हैं,उसमें इनका इशारा शायद एक बाबहुबली सांसद पर है। वे उस समय महराजगंज से जदयू के सांसद थे। लेकिन फेसबुक पोस्ट से एक बात सामने आती है कि वर्दीवाले सुधीर सिंह जैसा बहुत सारे लोग हैं,जो एक जाति के घरौंदे से बाहर नहीं निकल पाते हैं। सुधीर सिंह बार बार अपने को भूमिहार जाति से जोडकर तमाम बाते करते हैं।जिस पूर्व सांसद की बात की जा रही है, वे कभी नीतीश कुमार के तो कभी लालू प्रसाद के काफी करीबी रहे। इस समय उनके लड़के भी राजद में हैं।

अब इस दुनिया में मो.शहाबुददीन नहीं है। उनका कोरोना के दूसरे लहर में मौत हो गई। लंेकिन आज भी उनको याद करनेवालों की संख्या कम नहीं है।सुधीर सिंह का शहाबुददीन को लेकर दिया गया बयान अगर सही है तो राजद में भूचाल आना स्वाभाविक है। क्योंकि पूर्व सांसद भी अब राजद में हैं। साथ ही शहाबुददीन का परिवार भी राजद में है। ऐसे में मो.शहाबुददीन को चाहनेवाले सुधीर सिंह के बयान को लेकर आहत हैंं। दो बाहुबली सांसदों के बीच जुड़ा मामला शायद आगे और गरमा सकता है।

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