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UAPA Act Misuse Story: 14 साल 19 दिन झेला राजद्रोह का दंश, UAPA के आरोपों से कोर्ट ने हमें बाइज्जत बरी कर दिया

Janjwar Desk
12 Jan 2022 3:21 PM GMT
UAPA Act Misuse Story: 14 साल 19 दिन झेला राजद्रोह का दंश, UAPA के आरोपों से कोर्ट ने हमें बाइज्जत बरी कर दिया
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चंद्रकला : राज्य, पुलिस और मीडिया ने मिल कर हमारी जो नकारात्मक छवि बना दी थी, उसका असर हमारे सामाजिक रिश्तों पर भी पड़ा

UAPA Act Misuse Story: राज्य, पुलिस और मीडिया ने मिल कर हमारी जो नकारात्मक छवि बना दी थी, उसका असर हमारे सामाजिक रिश्तों पर भी पड़ा, लोग इतना खौफ़ में आ गए कि हमें देखकर किनारा करने लगे थे, मेरे घर पर हल्द्वानी में दो-दो बार छापा डाला, जहां सिर्फ़ मेरे बूढ़े मां-बाप रहते थे...

देशद्रोह, राजद्रोह और UAPA के आरोपों से बरी होने के बाद राजनीतिक बंदी के बतौर 18 महीने जेल में रह चुकी चंद्रकला की टिप्पणी

UAPA Act Misuse Story: हाल में ही 7 जनवरी 2022 को उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रेम सिंह खिमाल की अदालत ने मेरे पति प्रशांत राही, मुझे (चन्द्रकला) के साथ ही दो अन्य अभियुक्तों को देशद्रोह, राजद्रोह और उन पर लगाये गये यूएपीए के आरोपों से बरी कर दिया। 14 साल 19 दिन चले उत्तराखंड के इस चर्चित मुकदमे के कई आयाम हैं।

बात 17 दिसम्बर 2007 की है जब प्रशान्त देहरादून के आराघर के पास पैदल चल रहे थे, तब कुछ नकाबपोश लोग एक वैन से उतरे और प्रशांत का अपहरण करके ले गये। 5 दिन तक अवैध हिरासत में रख कर प्रशांत राही को यातनाएं दी गयीं। 22 दिसम्बर को उन्हें अदालत में माओवादी बता कर पेश किया गया। उनके खिलाफ मनगढ़ंत सबूत बनाकर पेश किए गए। ज़ाहिर है मामला सनसनीखेज बनाकर पेश किया गया। पुलिस ने इस सनसनीखेज झूठे मुकदमे पर खूब वाहवाही बटोरी।

मीडिया तो गिद्ध दृष्टि लगाये ऐसी ख़बरों की तलाश में बैठा रहता है। समाचारपत्रों के पन्ने प्रशांत की गिरफ़्तारी की ख़बरों से रंग गए। प्रशांत को विलेन बना कर पेश किया गया। माओवादी गतिविधियों की कोई भी खबर कहीं से आती तोमीडिया वाले हमेशा उससे जोड़ कर प्रशांत की नकारात्मक छवि पेश करते।

इसके बाद 4 फरवरी 2009 को मुझे यानी चंद्रकला को भी गिरफ़्तार कर लिया। लगभग डेढ़ साल जेल में रहने के बाद मैं ज़मानत पर रिहा हुई। इसके बाद शुरू हुई हमारी कोर्ट कचहरी की कवायद, लेकिन आज जब प्रशांत राही और उनके सभी सह अभियुक्त सभी आरोपों से बरी कर दिये गये हैं तो एक-दो अखबारों को छोड़कर अधिकांश मीडिया ने इतनी बड़ी खबर को सिरे से गायब कर दिया। हालांकि फैसला होने के दिन अदालत तरह-तरह के पत्रकारों से खचाखच भरी हुई थी, लेकिन जब फैसला उनकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं आया तो सबके चेहरे लटक गए। आज अधिकांश मीडिया को पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों से रत्ती भर भी वास्ता नहीं है।

राज्य, पुलिस और मीडिया ने मिल कर हमारी जो नकारात्मक छवि बना दी थी, उसका असर हमारे सामाजिक रिश्तों पर भी पड़ा। लोग इतना खौफ़ में आ गए कि हमें देखकर किनारा करने लगे थे। मेरे घर पर हल्द्वानी में दो-दो बार छापा डाला, जहां सिर्फ़ मेरे बूढ़े मां-बाप रहते थे। मुझे लगता है कि राजद्रोह या राष्ट्रद्रोह के मुकदमों पर आज नए सिरे से बहस करने की ज़रूरत है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर 14 वर्षों की इस यात्रा को देखती हूं तो मन की कोफ़्त वर्तमान पर हावी हुए बिना नहीं रहती है। इन वर्षों में पुलिस और मीडिया के फैलाये झूठ के कारण प्रशांत और हमारे जैसे तमाम उन लोगों के चेहरे मेरे आँखों के सामने आ जाते हैं, जिन्होंने सामाजिक तौर पर भयानक उपेक्षा झेली। जिस मानसिक यंत्रणा से हम व हमारे परिवार के लोग और दोस्त मित्र गुजरे, बेमतलब के जो लाखों रुपये खर्च हुए, उन सबकी भरपाई करने वाला आज कोई नहीं है। सबसे बड़ी बात कि हमने जेल में जो जीवन बिताया उसका जवाबदेह कौन होगा?

इस सवाल के जवाब में मुझे शून्य दिखाई देता है। आज भी मैं तमाम उन अभियुक्तों के साथ खुद को खड़ा पाती हूं जो कि सालों साल जेलों में बिना सुनवाई, बिना आरोप तय हुए फर्जी मुकदमे बनाकर इसलिए कैद कर दिये जाते हैं क्योंकि वे सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ जनता की आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिलाने की हिमाकत कर रहे होते हैं। कितने जेल में ही दम तोड़ देते हैं, जवान बूढे़ हो जाते हैं और...यह सिलसिला चलता रहता है। आइये आज बात करते हैं प्रशांत राही की।

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महाराष्ट्र में जन्मे प्रशान्त राही का जीवन बहुत उतार-चढ़ावों भरा रहा है। मेरे हमसफ़र प्रशान्त राही ने बनारस विश्वविद्यालय आईआईटी से एमटेक किया। एक पत्रकार के रूप में पहले उन्होंने देहरादून में 'हिमांचल टाईम्स' में काम किया। उसके बाद दिल्ली से निकलने वाले अंग्रेजी अखबार 'द स्टेटमैन' में उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त पत्रकार के रूप में नौकरी की। अपनी नौकरी के सुनहरे दौर में उन्होंनेकाम छोड़कर मानवाधिकारों के लिए अपना समय देना तय किया। वह लगातार जन मुददों पर एक स्वतन्त्र पत्रकार के रूप में लिखते रहे हैं। वे एक अच्छे अनुवादक भी हैं। उन्होंने अनेकों लेखों के साथ 'लोकमान्य तिलक की जीवनी', 'बच्चों के लिए अर्थशास्त्र', 'चिकित्सा की अनकही दास्तान' का हिन्दी अनुवाद किया है।

बनारस विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंगकी पढ़ाई के दौरान ही प्रशान्त छात्र आन्दोलन के सम्पर्क में आये और उनके सामाजिक राजनीतिक जीवन की शुरूआत हो गयी। बाद में वह उत्तराखण्ड में90 के दशक में चले पृथक उत्तराखण्ड राज्य के आन्दोलन का हिस्सा रहे। स्टैट्समैनके राष्ट्रीय संवाददाता के रूप में काम करते हुए उन्होंनेउत्तराखण्ड के बुनियादी मुददों और अलग उत्तराखंड राज्य की आवश्यकता को अपनी लेखनी के माध्यम से देश के स्तर पर उठाया।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद प्रशान्त ने स्टेट्समैन के राष्ट्रीय संवाददाता के पद को छोड़ने का फैसला कर लिया।एक जनपक्षधर कार्यकर्ता और उत्तराखण्ड की समस्याओं को लेकर संवेदनशील होने के कारण उनके लिए यह नौकरी कर पाना सम्भव नहीं हो पा रहा था।

इसके पश्चात उन्होंने उत्तराखण्ड के प्राकृतिक संसाधनों के माफिया व दलालों द्वारा गलत तरीके से दोहन के खिलाफ उठने वाली आवाज़़ों को संगठित करना शुरू किया। उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैण व अन्य मांगों को लेकर बनी उत्तराखण्ड संयुक्त संघर्ष समिति में भी प्रशांत ने एक सदस्य के बतौर अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। उत्तराखण्ड के ग्रामीण क्षेत्र विशेषकर टिहरी में एशिया के सबसे ऊंचे टिहरी बांध केख़िलाफ़चल रहेजनआन्दोलन में प्रशांतशामिल हो गये। वे लगातार उत्तराखण्ड के जनमुद्दों के लिए संघर्षरत रहने वाले एक जीवट कार्यकर्ता रहे हैं।

राज्य बनने के बाद सरकारें उत्तराखंड की महिलाओं, छात्रों, नौजवानों, कर्मचारियों, भूतपूर्व सैनिकों की आकांक्षा के अनुरूप के लिए काम करने में नाकाम रही। इसलिए लोग फिर से आंदोलित होने लगे।

2005 में सरकार ने राजनीतिक, सामाजिक आन्दोलनकारियों को सबक सिखाने के लिए तीव्र दमन का सहारा लिया और गिरफ्तारियां शुरू करके राजद्रोह या राष्ट्रद्रोह के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून सहारा लेने लगी। प्रशान्त राही भी उत्तराखंड के जनपक्षधर लोगों के साथ मिलकर इन कार्यकर्ताओं की रिहाई और जमानतियों के इन्तजाम में जुट गए। इसके बाद प्रशांत लगातार सत्ता की आँखों की किरकिरी बन गए।

अंततः प्रशान्त राही को 17 दिसम्बर 2007 को गिरफ़्तार कर लिया गया। प्रशान्त पौने चार साल उत्तराखण्ड की कई जेलों में रहने के बाद 2011 में जमानत पर रिहा हुए। जेल में भी प्रशांत को अनेकों यातनाओं का सामना करना पड़ा।

2011 में जेल से बाहर आने के बाद प्रशान्त एक दिन भी नहीं ठहरे। जेल में रहते हुए उन्होंने जिन परेशानियों, पीड़ा और अपमानजनक व्यवहार का सामना किया था, उसको महसूस करते हुए उन्होंने तय किया कि अब वे राजनीतिक बन्दियों की रिहाई के लिए काम करेंगे। अब उनका कार्यक्षेत्र केवल उत्तराखण्ड नहीं बल्कि पूरा देश हो गया था। उनको जहां भी लगता कि राजनीतिक तौर पर गिरफ़्तार लोगों को कानूनी या अन्य प्रकार की कोई भी ज़रूरत है, वे कोई परवाह किए बिना वहां पहुंच जाते और जी-जान से अपने काम में लग जाते।

सितम्बर 2013 को जब प्रशांत कुछ जेल बन्दियों की रिहाई के सन्दर्भ में रायपुर के अधिवक्ताओं से मिलने गये थे उन्हें वहां से उठा लिया गया। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक दूसरे केस में, जिसमें जेएनयू के छात्र हेम मिश्रा और दो स्थानीय आदिवासी महेश तिर्की और पाण्डु नरोटे कुछ दिन पहले पकडे गए थे, के साथ उन पर मुकदमा कायम कर दिया। बाद में इसी केस में शारीरिक रूप से अक्षम दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जीएन साईंबाबा के घर पर छापेमारी की गयी और उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया था।

बहुत कम समय में इस केस को गढ़चिरौली जिला व सत्र न्यायालय ने, न्यायिक सबूतों को सिद्ध किये बिना ही, ठोस सबूतों को आधार बनाए बिना ही, पूर्वाग्रह ग्रसित होकर सभी अभियुक्तों के विरुद्ध निर्णय दिया। प्रशांत समेत पांच अभियुक्तों को दोषसिद्ध करके आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अब 5 वर्ष पूरे होने को हैं और प्रशान्त अमरावती जेल में बन्द हैं और अन्य लोग महाराष्ट्र की अन्य जेलों में बन्द हैं।

वर्तमान में प्रशांत और उनके सह अभियुक्तों के पक्ष में उत्तराखण्ड में हुआ यह फैसला, जिसमें न्यायलय ने सभी को दोषमुक्त कर दिया है, हम सबके लिए एक उम्मीद लेकर आया है। वर्तमान में जब सरकार की नीतियों की महज़ आलोचना करना भी देशद्रोह मान लिया जा रहा हो तो ऐसे दौर में यह फैसला एक सकारात्मक संकेत है और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं व उनसे जुड़े तमाम लोगों के लिए भी एक उम्मीद है।

आज मैं इस बात को भी रेखांकित करना चाहती हूं कि एक न एक दिन भीमा कोरेगांव केस के बंदी,(जिनमें तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ प्रशान्त के गढ़चिरौली मुकदमे को लड़ने वाले वकील सुरेन्द्र गडलिंग भी शामिल हैं) और भारत की विभिन्न जेलों में बंद हजारों गरीब आदिवासी, दलित व मुस्लिम या दिल्ली दंगों में झूठे केस बनाकर जेल में बंद कर दिए गए छात्राएं और नौजवान सभी दोषमुक्त होकर बाहर आयेंगे।

अंत में मुख्य बात यह कि प्रशांत केजेल में चले जाने के बाद हमारी इस लड़ाई में दोस्तों, सहयोगियों का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष जो सहयोग मिला, उसके बिना इतनी लम्बी लड़ाई संभव ही नहीं थी। उत्तराखंड के वकीलों के साथ ही दिल्ली से आये वकीलों ने जिस धैर्य और कड़ी मेहनत से उनके मुकदमे की पैरवी की वह भी एक मिसाल है। हम सबका तहेदिल से शुक्रगुज़ार हैं।

प्रशांत राही और उनके परिवार की इस संघर्षपूर्ण यात्रा में फ़िल्म निर्माण से जुड़ी उनकी बेटी शिखा राही ने पहले दिन से जिस साहस और दृढ़ता से अपने बाबा का साथ दिया वह प्रेरणादायी है। शिखा को 21 दिसम्बर 2007 को पुलिस द्वारा उनके पिता की गिरफ़्तारी की सूचना उस समय दी गई जब वह फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' अपने काम की (बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर) सफलता के लिए लोगों की बधाई ले रही थीं। उस दिन से आज तक शिखा अपने बाबा को न्याय दिलाने के लिए निरन्तर ज़द्दोज़हद करती रही हैं। बाबा से जेल में मिलने जाने और उनकी तमाम ज़रूरतों की निर्बाध पूर्ति करने के साथ ही वे कानूनी पैरवी के लिए भी लगतार जूझती हुए न्याय की धुंधली सी उम्मीद को थामे आगे बढ़ती रहीं।

पिछले वर्ष एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, 'मेरे बाबा ने 10 जून को 62 वर्ष पूरे किये हैं। मैंने उन्हें लगभग चार साल तक उत्तराखण्ड जेल की सलाखों में बन्द देखा, जहां पर वह दिसम्बर 2007 से अगस्त 2011 तक रहे और अब पिछले 5 वर्ष से अधिक समय से गढ़चिरौली केस में, मैं उनको जेल बन्दी के रूप में देख रही हूं। मैं उम्मीद करना चाहती हूं, लेकिन किसी भी तरह से इसमें समर्थ नहीं हो पा रही हूं।'

लेकिन जब शिखा को यह सूचना मिली कि उनके पिता को उत्तराखंड के झूठे मुकद्दमे में दोषमुक्त कर दिया गया है तो उन्होंने अपनी खिलखिलाती हंसी से यह दर्ज किया कि मुझे भरोसा था कि मेरे बाबा आरोप मुक्त होंगे।

हालांकि शिखा लम्बे समय से महाराष्ट्र में प्रशांत को देशद्रोह के मुकदमे में सत्र न्यायालय से हुए आजीवन करावास की सजा के विरुद्ध उच्च न्यायालय में की जाने वाली अपील की सुनवाई के लिए कोशिश कर रही हैं। लेकिन कोविड व अन्य कारणों से यह सुनवाई लगातार टलती जा रही है।

अपने पिता के लिए निरन्तर न्याय के प्रयासों को याद करते हुए वह दृढ़ता भरे शब्दों में कहती हैं, 'मेरे बाबा ने बिना किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल हुए पांच वर्ष जेल में बिता दिये हैं। लेकिन मैं हार मानने वाली नहीं हूं। मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे बाबा व अन्य सहअभियुक्तों के विरुद्ध लगाये गये गैर कानूनी और आपराधिक आरोप गलत हैं और एक न एक दिन यह सिद्ध होकर रहेगा और मैं जानती हूं कि मेरे बाबा जल्दी ही आज़ाद हवा में सांस लेंगे।'

शिखा की यह उम्मीद आगे भी कायम रहेगी और यह न केवल जेल में कैद राजनीतिक बन्दियों के लिए एक रोशनी लायेगी, बल्कि उनके परिजनों के मन में भी आशा का संचार करेगी जिनके अपनों को फर्जी मुकदमे लगाकर जेलों में सिर्फ इसलिए बंद कर दिया गया है कि प्रतिरोध की आवाज़ को दबाया जा सके।

(चंद्रकला राजनीतिक बंदी के बतौर जेल में 16 महीने रह चुकी हैं।)

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