जनज्वार विशेष

हमारा शिक्षक कौन : डॉ. राधाकृष्णन या सावित्रीबाई फुले

Janjwar Desk
5 Sep 2021 4:35 AM GMT
हमारा शिक्षक कौन : डॉ. राधाकृष्णन या सावित्रीबाई फुले
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(हमारा शिक्षक कौन, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन या सावित्रीबाई फुले)

शुरू में जब सावित्रीबाई फुले के स्कूल में दलित और महिलाएं आने से हिचक रहे थे और स्कूल में संख्या काफी कम थी तो उन्होंने शिक्षा और सामाजिक आन्दोलन के बीच के सम्बन्ध को पहचाना और वे ज्योतिबा फुले के साथ विभिन्न मोर्चो पर 'महिला सम्मान', 'महिला अधिकार' और 'दलित अधिकारों' के आंदोलन में अपनी सीधी हिस्सेदारी की...

मनीष आजाद की टिप्पणी

जनज्वार। शिक्षक दिवस 5 सितम्बर (5 September) को डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan) से जोड़ने का क्या औचित्य है? आखिर शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान क्या है? या इससे भी बढ़कर समाज के लिए ही उनका क्या योगदान है? आखिर राधाकृष्णन का दर्शन क्या है?

बहुत से दलित व प्रगतिशील संगठन सावित्रीबाई फुले के जन्म दिन (4 जनवरी) को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाते है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को आन्ध्र प्रदेश के एक गांव में एक ब्राहमण परिवार में हुआ था। दर्शन में उच्च शिक्षा लेने के बाद उन्होने आन्ध्र, मैसूर और कोलकाता में दर्शन के प्रोफेसर के रूप में दर्शन पढ़ाया। कुछ समय उन्होंने आक्सफोर्ड में भी धर्म और नीतिशास्त्र पढ़ाया। इसके अलावा वे दिल्ली विश्वविद्यालय और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के 'वाइस चांसलर' भी रहे और सबसे बढ़कर वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हे 'नाइटहुड' की उपाधि से नवाज़ा तो भारत सरकार ने 'भारत रत्न' से। उन्होंने कभी भी 'स्वतंत्रता आन्दोलन' या किसी भी राजनीतिक-सामाजिक आन्दोलन में हिस्सा नहीं लिया।

उनका दर्शन था 'अद्वैत वेदान्त' का दर्शन। इस पर उन्होंने कई किताबें लिखी हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने अद्वैत वेदान्त की नई व्याख्या करके पश्चिम को अद्वैत वेदान्त दर्शन की ऊंचाइयों से परिचित कराया। और इस रुप में भारत का सर ऊंचा उठाया।

शंकराचार्या के समय में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा यह दर्शन भारतीय दर्शन के इतिहास में 'बुद्ध दर्शन' और 'चर्वाक' दर्शन के विरोध में खड़ा एक प्रतिक्रियावादी दर्शन है, जो पूरे ब्रह्मांड की एकता की बात करता है और सभी तरह के अन्तरविरोधों को माया मानता है। डाॅ. राधाकृष्णन ने भी इसी से प्रभावित होकर 'वैश्विक एकता' (Global oneness) की बात कही और उस समय के प्रगतिशील 'राष्ट्रवाद' को 'वैश्विक एकता' के मार्ग में एक बाधा के रुप में चिन्हित किया (शायद इसी कारण वे स्वतंत्रता आन्दोलन से दूर रहे)।

इस रूप में समाज के सारे अंतरविरोध मसलन दलित-सवर्ण का अंतरविरोध, अमीर-गरीब का अंतरविरोध, साम्राज्यवाद- राष्ट्रवाद का अंतरविरोध जैसे अनेक अन्तरविरोध महज माया रह जाते हैं। व्यक्ति का मूल लक्ष्य है एकता के इस 'परम ज्ञान' को प्राप्त करना। इस परम ज्ञान को वेदों में 'ब्राह्मण' कहा गया है। राधाकृष्णन भी इसका इसी रूप में प्रयोग करते हैं। इस दर्शन की उलटबांसी यह है कि यदि सब कुछ एक है यानी 'परम ब्रहम' या 'ब्राहमण' है तो इसका ज्ञान प्राप्त करने का क्या मतलब है। क्योंकि ज्ञानप्राप्ति के लिए 'आब्जेक्ट' और 'सब्जेक्ट' का अलग अलग अस्तित्व जरुरी है। जिससे राधाकृष्णन और अद्वैतवाद दोनों ही इंकार करते हैं। यानी ज्ञान अपने आप में ही माया है।

भारत के बहुसंख्यक दलितों, आदिवासियों, महिलाओं एवं गरीबों के लिए इस दर्शन में क्या है? कहा तो यह भी जाता है कि उन्होंने अपने शिष्य जदुनाथ सिन्हा की थीसिस चुरा कर अपने नाम से छपवा ली और मामला कोर्ट तक पहुंच गया।

चलिए अब हम सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) की ओर रुख करते हैं। सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के 'सतारा' जिले में 4 जनवरी (कुछ के अनुसार 3 जनवरी) 1831 को एक शूद्र परिवार में हुआ था। अपने पति और साथी 'ज्योतिबा फुले' के साथ मिलकर उन्होने 1847 में दलितों के लिए पहला स्कूल खोला। 1848 में उन्होने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। उन्होने अपने जीवन में कुल 18 स्कूल खोले। इनमें से एक स्कूल में अधेड़ उम्र के और बुजुर्ग लोगों को भी शिक्षा दी जाती थी।

जाहिर है उस वक्त उन्होंने इसके लिए सवर्णों का काफी विरोध झेला। शुरू में जब उनके स्कूल में दलित और महिलाएं आने से हिचक रहे थे और स्कूल में संख्या काफी कम थी तो सावित्रीबाई ने शिक्षा और सामाजिक आन्दोलन के बीच के सम्बन्ध को पहचाना और वे ज्योतिबा फुले के साथ विभिन्न मोर्चो पर 'महिला सम्मान', 'महिला अधिकार' और 'दलित अधिकारों' के आंदोलन में अपनी सीधी हिस्सेदारी की। शिक्षा तथा सामाजिक आन्दोलन एक दूसरे से गुंथ गये। सावित्रीबाई ने अपने नेतृत्व में उस वक्त नाइयों को संगठित किया कि वे विधवाओं के बाल ना काटे। उस समय प्रथा थी कि पति के मरने के बाद पत्नी को गंजा रहना होगा।

उस समय विधवायें अनेक तरह के यौन उत्पीड़न का शिकार होती थी। फलतः प्रायः वे गर्भवती हो जाती थीं, लेकिन समाज के डर से उन्हें या तो अपने बच्चे को मारना पड़ता था या फिर उन्हें खुद आत्महत्या करनी पड़ती थी। इससे निपटने के लिए सावित्रीबाई ने अपने घर पर ही 'बालहत्या प्रतिबन्धक गृह' की स्थापना की, जहां ऐसी महिलाओं को अपने बच्चे को जन्म देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और उन्हें दुबारा से सम्मानजनक जीवन जीने का हौसला दिया जाता था। यहां न सिर्फ दलित महिलाएं, बल्कि ब्राह्मण विधवा महिलाएं भी आती थी। ऐसी ही एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र को सावित्रीबाई ने गोद भी लिया।

इन सब लड़ाइयों और सामाजिक कामों से ही उन्हें शिक्षा का उद्देश्य भी समझ आया जो उनकी कविताओं में बहुत स्पष्ट तरीके से आया है। ऐसी ही एक कविता में वे कहती है-

'आपको सीखने-पढ़ने का अवसर मिला है

तो सीखो-पढ़ो और जाति के बंधन को काट दो।'

यानी यहां शिक्षा महज 'अक्षर ज्ञान' या 'पोथी ज्ञान' नहीं है, बल्कि सामाजिक अन्तरविरोधों को हल करने और समाज को आगे की ओर एक धक्का देने के लिए है।

मशहूर पुस्तक 'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' के लेखक 'पावलो फ्रेरे' भी शिक्षा को उत्पीड़ितों के 'चेतना निर्माण' से जोड़ते है जो उत्पीड़ित को न सिर्फ अपने बन्धनों के प्रति सचेत करता है वरन उसे काटने की चेतना का भी निर्माण करता है।

इसी सन्दर्भ में सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) और ज्योतिबा फुले (Jyotiba Phule) दोनो ही वेदों को 'आलसी की कल्पना' और 'झूठी चेतना का रूप' मानते थे, जो दलितो-महिलाओं की चेतना पर एक बोझ है और इसे उतारकर फेंक देना चाहिए। ज्योतिबा फुले की मृत्यु के समय सावित्रीबाई फुले ने ही उनकी चिता को अग्नि दी थी। यह उस समय के लिए (आज के लिए भी) बहुत ही क्रान्तिकारी कदम था।

महाराष्ट्र में जब प्लेग (plague) की बीमारी फैली तो सावित्रीबाई फुले जी-जान से प्रभावित लोगों की सेवा में लग गयी और प्लेग से प्रभावित एक बच्चे की सेवा करते हुए ही उन्हे भी प्लेग हो गया और इसी से उनकी 10 मार्च 1897 को मौत हो गयी। उनके साथ ही याद करना ज़रूरी है सावित्री बाई की सहयोगी शिक्षिका फ़ातिमा शेख को, जो उनके साथ साथ ही शिक्षा की अलख जगा रही थी।

उन माताओं पिताओं को समझाने में फ़ातिमा शेख का योगदान बहुत महत्वपूर्ण था जो अपनी पिछड़ी सोच के कारण लड़कियों को स्कूल नहीं भेजना चाहते थे। अब आप ही तय कीजिये कि हमारा शिक्षक कौन है।

(मनीष आजाद सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और वह देश-दुनिया के चर्चित-अचर्चित मुद्दों पर विचारणीय टिप्पणियां करते रहते हैं।)

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