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Economic inequality in india : 10 % शहरी परिवारों के पास 1.5 करोड़ की प्रॉपर्टी तो 30 % गरीबों की औसत संपत्ति सिर्फ 2000 रुपए

Janjwar Desk
21 Sep 2021 10:35 AM GMT
Economic inequality in india : 10 % शहरी परिवारों के पास 1.5 करोड़ की प्रॉपर्टी तो 30 % गरीबों की औसत संपत्ति सिर्फ 2000 रुपए
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भारत में भारी आर्थिक असमानता, बड़े पैमाने पर आबादी के पास नहीं सर ढकने को छत (file photo)

NSO की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 10 फ़ीसदी शहरी परिवारों के पास औसतन 1.5 करोड़ की संपत्ति है और गरीबों के औसतन 2000 रुपए की संपत्ति है...

जनज्वार, दिल्ली। देश के शहरों में अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। हाल ही में सरकार द्वारा प्रस्तुत सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Program Implementation) के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (National Statistics Office) द्वारा किए गए अखिल भारतीय एवं निवेश सर्वेक्षण 2020 की रिपोर्ट पेश की गई।

रिपोर्ट ने एक बार फिर से देश में लगातार बढ़ती आर्थिक असमानता की ओर ध्यान आकर्षित किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के 10 फ़ीसद अमीरों के पास शहरी क्षेत्र में 55.7 फीसद संपत्ति है, जबकि 10 फ़ीसद तक ग्रामीण आबादी के पास करीब 132 लाख करोड़ की संपत्ति है।

ग्रामीण आबादी के 50% गरीब लोगों के पास कुल संपत्ति का केवल 10 फीसद हिस्सा है। शहरी क्षेत्रों में 50% आबादी के पास केवल 6.2 फीसद हिस्सा है। आसान शब्दों में समझे तो देश के 10 फीसद शहरी परिवारों के पास औसतन 1.5 करोड़ रुपए की संपत्ति है, जबकि निचले वर्ग के परिवारों के पास औसतन सिर्फ केवल 2000 रुपये की संपत्ति है। यह सर्वे दर्शाता है कि शहरों में गरीबों और अमीरों के बीच की वित्तीय क्षमता का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

ग्रामीण इलाकों में सिर्फ 10 फ़ीसद परिवारों के पास औसतन 81.17 लाख की संपत्ति है। वहीं निचले वर्ग के पास औसत के तौर पर केवल ₹41000 की संपत्ति है। सर्वेक्षण में कहा गया कि शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों की स्थिति काफी बेहतर है।

जनवरी दिसंबर 2019 में किया गया सर्वे

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 77वें दौर के तहत अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वे किया गया। यहां सर्वे जनवरी- दिसंबर, 2019 के बीच किया गया था। इससे पहले यह सर्वे 70वें दौर के तौर पर 2013 में और 59वें दौर के तौर पर 2003 और 26वें दौर के रूप मे 1971- 72 में किया गया। इस ऋण और निवेश सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य 30 जून, 2018 तक परिवारों की संपत्ति और देनदारियों को लेकर बुनियादी मात्रात्मक जानकारी एकत्रित करना था। यह सर्वेक्षण ग्रामीण क्षेत्र के, 5940 गांवों में 69,455 परिवारों और शहरी क्षेत्र के 3,995 ब्लॉकों में 47,006 परिवारों के बीच किया गया।

आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में करोड़पतियों की संख्या हर साल बढ़ रही हैं और उसी प्रकार गरीबी का स्तर भी बढ़ रहा है। वर्ष 2003 के सर्वेक्षण के अनुसार देश में करोड़पतियों की संख्या 61000 थी, 2004 में यह बढ़कर 70,000 हो गई। अनुमान लगाया जा रहा है कि 2020 तक भारत में एक लाख करोड़पति है। इसके साथ ही यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि 2025 तक भारत में करोड़पतियों की संख्या बढ़कर 30 लाख हो जाएगी।

प्रत्येक शहरी पर औसतन 1.2 लाख का कर्ज

इससे पूर्व NSO की एक और रिपोर्ट आई थी। जिसमें बताया गया, रूरल इंडिया में हर परिवार पर औसत कर्ज करीब ₹60,000 है। जबकि शहरी भारत में हर परिवार पर औसत कर्ज करीब 1.2 लाख रुपए है। ग्रामीण भारत में 35 फीसद परिवारों पर कर्ज का बोझ है, जबकि शहरी वर्ग में केवल 22 फीसद ऐसे परिवार हैं, जिन पर किसी तरह का कर्ज है।

कृषक वर्ग परिवारों पर कर्ज का बोझ अधिक

इस सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण भारत में जो परिवार कृषि पर आधारित हैं, उन पर औसतन कर्ज 74,460 रुपए है, जबकि गैर- कृषि आधारित परिवारों पर औसत कर 40,432 रुपए हैं। रिपोर्ट के अनुसार अर्बन इंडिया में सेल्फ एंप्लॉयड (self employed in urban India )पर औसत कर्ज 1.8 रुपए और अन्य हाउसहोल्ड (other household) पर यह कर्ज 99,353 रुपए है। रूरल इंडिया में कर्ज का 66 फ़ीसदी हिस्सा इंस्टिट्यूशन क्रेडिट एजेंसी जैसे बैंक (Bank), पोस्ट ऑफिस (Post Office) जैसे माध्यमों से है। 64 फ़ीसदी कर्ज non-institutional एजेंसी मतलब पेशेवर सूदखोरों से है। शहरों में नॉन- इंस्टिट्यूशन एजेंसियों से कर्ज की हिस्सेदारी केवल 13 फ़ीसदी है और 87 फ़ीसदी कर्ज इंस्टीट्यूशनल संस्थानों से लिया गया है।

50 फ़ीसदी से अधिक परिवार पर कर्ज

NSO कि सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में 50 फ़ीसदी से अधिक कृषक परिवार कर्ज में थे और उन पर प्रति परिवार औसतन 74,121 रुपए कर्ज था। सर्वे में बताया गया, उनके कुल बकाया कर्ज में से केवल 69.6 फ़ीसदी बैंक, सहकारी समितियों और सरकारी एजेंसियों जैसे संस्थागत स्रोतों से लिए गए हैं। जबकि 20.5 फ़ीसदी पेशेवर सूदखोरों से लिए गए हैं। इसके अनुसार कुल कर्ज में 57.5 फ़ीसदी लोन (Loan) कृषि उद्देश्य के लिए लिया गया था। जिस में प्रतिवर्ष कृषि परिवार पर बकाया लोन की औसत राशि 74,121 रुपए है।

आंकड़ों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अल्पविकसित देशों में पूंजी निवेश में अनिवार्य रूप से संसाधनों को सक्षम देशों की ओर मोड़ दिया है। यही कारण है कि गरीब देशों में आर्थिक कठिनाई बढ़ती जा रही है और दूसरी और पूंजी का केंद्रीकरण हो रहा है।

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