देश में वनाधिकार के तहत प्रस्तुत लगभग 52 लाख दावों में से 48% किए जा चुके स्वीकार, मगर उत्तराखंड में 7 हजार में से 3% से भी कम स्वीकार

रामनगर। वन ग्राम नई बस्ती पूछड़ी, कालूसिद्ध एवं सुंदरखाल-देवीचौड़ा खत्ता में गठित ग्राम स्तरीय वनाधिकार समितियों द्वारा संयुक्त रूप से व्यापार भवन, रामनगर में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य वनाधिकार कानून-2006 की बारीकियों को समझना और इसके अंतर्गत सामुदायिक व व्यक्तिगत दावों को तैयार करने की प्रक्रिया पर चर्चा करना था।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष तरुण जोशी ने बताया कि दिसंबर 2005 से पूर्व वन भूमि पर निवास कर रहे सभी निवासी वनाधिकार कानून के तहत पात्र हैं। इस कानून के अंतर्गत वन ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित करने, चार हेक्टेयर तक की कब्जे वाली भूमि पर मालिकाना हक प्राप्त करने और वनों से अपनी निस्तारी जरूरतों को पूरा करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजाति के लिए दिसंबर 2005 से पूर्व का निवास ही पर्याप्त साक्ष्य है, जबकि अन्य परंपरागत वनवासियों के लिए तीन पीढ़ियों (लगभग 1980 से पूर्व) की मौजूदगी का साक्ष्य जरूरी है।
उन्होंने प्रशासन पर आरोप लगाया कि समाज कल्याण विभाग और जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय परंपरागत निवासियों को उजाड़ने की कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने 7 दिसंबर को पूछड़ी में हुई तोड़फोड़ को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि कानूनन ग्राम स्तरीय समिति के गठन के बाद, जब तक दावों के निस्तारण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी को बेदखल नहीं किया जा सकता।
समाजवादी लोकमंच के संयोजक मुनीष कुमार ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश में वनाधिकार के तहत प्रस्तुत लगभग 52 लाख दावों में से 48% स्वीकार किए जा चुके हैं, लेकिन उत्तराखंड में लगभग 7 हजार दावों में से 3% से भी कम स्वीकार होना राज्य सरकार की जन-विरोधी कार्यप्रणाली का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि टोंगिया ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित करने के बावजूद वहां के लोगों को मालिकाना हक नहीं दिया गया है। कालूसिद्ध, पूछड़ी और सुंदरखाल में समितियों का गठन हुए एक वर्ष बीत चुका है, किंतु सरकार द्वारा खंड स्तरीय समिति का गठन न किए जाने से प्रक्रिया अटकी हुई है।
महिला एकता मंच की सरस्वती जोशी ने सरकार से मांग की कि बेदखली की कार्रवाई तुरंत रोककर उत्तराखंड में वनाधिकार कानून का पूर्ण अनुपालन किया जाए और वन भूमि पर निवास कर रहे लोगों के अधिकारों को मान्यता दी जाए।
इस अवसर पर मुख्य रूप से खीम राम, प्रेम राम, नंदकिशोर, शांति मेहरा, अंजलि रावत, सत्य पटवाल, बालादित्य कांडपाल, उमाकांत, धना देवी, रीना, कशिश, लक्ष्मी, रजनी, सीमा, रोशनी और गोपाल लोधियाल सहित वन ग्रामों के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।





