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हरियाणा : घर की कीमत जान देकर चुकाते मजदूर, सुप्रीम कोर्ट का आदेश बना खोरी के ग्रामीणों के लिए मृत्युदंड जैसा

Janjwar Desk
19 Jun 2021 12:47 PM GMT
हरियाणा : घर की कीमत जान देकर चुकाते मजदूर, सुप्रीम कोर्ट का आदेश बना खोरी के ग्रामीणों के लिए मृत्युदंड जैसा
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मजदूरों के आशियानों पर सरकार के इशारे पर ऐसे चला दिया गया था पिछले साल बुल्डोजर (photo : janjwar)

1970 के दशक में जिन मजदूरों ने अरावली की पहाड़ियों में होने वाले खनन कार्यों में अपनी जिंदगी खपा दी, आज उनकी संतानों का परिवार बेदखली का शिकार होने वाला है, उनकी सिर से छत छिनने वाली है...

नई दिल्ली। मजदूरों के लिए काम करने वाले संगठन बंधुआ मुक्ति मोर्चा कार्यालय में हरियाणा के खोरी गाँव के प्रवासी मज़दूरों के पुनर्वास की मांग को लेकर एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की गयी, जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार अधिवक्ताओे तथा बस्ती मज़दूरों ने हिस्सेदारी की।

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि अगर खोरी गांव जंगलात की जमीन पर बसा हुआ है इसलिए उससे बेदखल किया जा रहा है, किंतु इसी जंगलात की जमीन पर बने हुए फार्म हाउस एवं होटल्स को बेदखली का सामना नहीं करना पड़ रहा है यह असमानता सत्ता के गलियारों में क्यों है? कानूनों एवं नियमों के मुताबिक वैश्विक महामारी के दौरान विस्थापन न्यायोचित नहीं है।

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने बताया कि देश में कई राज्यों में शहरी गरीबों के पुनर्वास के लिए नीतियां बनी हुई है राज्य की जिम्मेदारी है कि उन नीतियों में संशोधन करें और यह संशोधन शहरी गरीबों को सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में होना चाहिए जिसकी आज हरियाणा में अत्यंत आवश्यकता है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में शहरी गरीबों के पुनर्वास की पात्रता के लिए कट ऑफ डेट में परिवर्तन करने के लिए जन संगठनों ने लंबा संघर्ष किया है, पवार उसकी जीत मजदूरों के पक्ष में रही है। जब राज्य सरकार है इसके पूंजीपति वर्ग को जमीन देने की घोषणा कर रही है तो फिर खोरी गांव में रहने वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को इस महामारी के दौरान बिना पुनर्वासित कैसे विस्थापित किया जा रहा है। न्यायालय का यह कदम गरीब एवं समाज के अंतिम पायदान पर खड़े इन मजदूरों के पक्ष में न होना हर एक उस आम आदमी को न्यायालय से भरोसा उठाने की दिशा में अग्रसर करेगा।

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी निर्मल गोराना ने बताया कि बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने बंधुआ मजदूरों की लड़ाई 1982 में जमीन से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जीती है, जिसका इतिहास गवाह है और संगठन को पूर्ण विश्वास है कि खोरी के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के पुनर्वास के लिए संगठन मजदूरों के साथ हमेशा खड़ा होता नजर आएगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करते वक्त सरकार की जिम्मेदारी है कि वो पुनर्वास की योजना बनाकर पूर्ण संवेदनशीलता के साथ मजदूरों को पुनर्वास करें, ताकि सरकार एवं न्यायालय से मजदूरों का विश्वास और भरोसा न टूटे।

निर्मल गोराना ने पुलिस संरक्षण में उन पर हुए अत्याचार का पर्दाफाश किया एवं इस मामले में आगे पुलिस के उच्च अधिकारियों के साथ बात करके शिकायत भेजने हेतु बात रखी। यदि बेदखली के साथ पुनर्वास की शुरुआत नहीं होती है तो संगठन इस मामले में जंतर मंतर की सड़क पर खड़ा होकर पुनर्वास की मांग करेगा और यदि आवश्यकता पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा आएगा। आज सुप्रीम कोर्ट का आदेश सुनकर कई मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं जो कि उनके लिए मृत्युदंड के समान प्रतीत होता है।

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एडवोकेट गुंजन सिंह ने बताया कि खोरी गांव में चल रहे मामले को लेकर जब बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी निर्मल गोराना को खोरी गांव में जाकर बिजली भोजन एवं पानी के लिए तरसती हुई जनता की सहायता करने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया तो वह स्वयं सूरजकुंड थाने पर पहुंचे जहां पुलिस ने मना कर दिया कि यहां पर निर्मल घबराना नहीं है, किंतु 2 घंटे बाद निर्मल को हराना उसी सूरजकुंड थाने में पाए गए। इसी क्रम में गुंजन सिंह ने बताया कि जब पुलिस ने निर्मल गोराना को फरीदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में प्रोड्यूस किया तब पुलिस ने केवल एक ही एफआईआर के बारे में मुझे बताया और जब कोट शुरू होने वाला था, उसके 2 मिनट पहले बार बार पूछने पर दूसरी एफआईआर का हवाला दिया गया, जो कि किसी भी आरोपी के खिलाफ पुलिस द्वारा इस प्रकार का व्यवहार करना मानव अधिकारों का हनन है।

एडवोकेट अनुप्रधा सिंह ने बताया कि कोर्ट के आदेश के अनुसार हरियाणा सरकार खोरी गांव के घरों को तोड़ने के लिए तैयार है, किंतु यह कोर्ट की प्रक्रिया घर टूटने के साथ समाप्त नहीं हो जाती मजदूरों को पुनर्वास की नीति 2010 के तहत पुनर्वास किया जाना चाहिए किंतु साथ में 2020 में बसने वाले मजदूर परिवारों को भी राहत देने के लिए सरकार के पास में मजबूत पुनर्वास की नीति होनी चाहिए, जो सरकार को लागू करने की आवश्यकता है।

गौरतलब है कि हरियाणा के फरीदाबाद जिले की अरावली की पहाड़ियों में पिछले 50 वर्ष से बसा खोरी गांव आज उजड़ने की कगार पर है, किंतु सरकार पुनर्वास का नाम तक नहीं ले रही है। इस गांव में बंगाली कॉलोनी, सरदार कॉलोनी, चर्च रोड, इस्लाम चौक, हनुमान मंदिर, लेबर चौक, पुरानी खोरी नाम से अलग अलग कॉलोनी बसी हुई है। ये सभी घर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के परिवारों के है। इस गांव में सभी सम्प्रदाय के मजदूर परिवार रहते हैं। ये परिवार कभी धर्म और मजहब के नाम पर आपस में नही लड़ते हैं। खोरी गांव सूरजकुंड पर्यटक स्थल के पास है और इन्ही अरावली की पहाड़ियों में 50 फार्म हाउस एवं कई होटल्स बनी हुई है, जिनका पनपना आज भी जारी है, किंतु इन गगनचुम्बी इमारतों को हाथ लगाने की हिम्मत आज तक न हरियाणा सरकार को हुई और ना ही फरीदाबाद प्रशासन को हुई।

इन 10,000 घरों के बसे इस गांव पर प्रशासन की नजरें गड़ी हैं, जिससे मजदूर तबके के परिवारों का आशियाना पुनर्वास के अभाव में संकट में पड़ गया है। वर्ष 1970 के दशक में लोगों ने इन अरावली की पहाड़ियों में होने वाले खनन कार्यों में अपनी जिंदगी खपा दी, वहीं आज उनकी संतानों का परिवार बेदखली का शिकार होने वाला है। जब धीरे धीरे लोग 1990 से आजीविका की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन करने लगे तब मजदूर परिवारों ने इस अरावली क्षेत्र में बसना शुरू कर दिया।

फरीदाबाद में इन अरावली की पहाड़ियों का कुछ हिस्सा भूमाफियों द्वारा प्लॉट काट कर प्रशासन की नाक के नीचे से इन गरीब मजदूरों को बेच दिया गया। इन भूमाफियाओं को न किसी वन विभाग ने रोका और न ही किसी सरकार के आला अधिकारी ने रोका, जबकि यहां तक की सरकार और प्रशासन ने इन तमाम मजदूर वर्ग को आधार और पहचान पत्र तक जारी कर दिए। धीरे धीरे भूमाफियाओं ने लोगो को सारी खोरी बेच दी और सरकार एवं प्रशासन मौन मूक रहा।

खोरी के लोगों ने मिलकर खोरी गांव रेजिडेंट वेलफेयर एसोशिएसन बनाया और 2010 में खोरी गांव के मजदूरों के घरों का मामला जिसमें स्टे एवं पुनर्वास की प्रेयर के साथ पहली पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट में आया। यह सुनवाई 25.4.2016 एवं 29.4.2016 में पूर्ण हुई और मजदूरों की जीत हुई जिसमें पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में हरियाणा सरकार से मजदूरों को पुनर्वास देकर बेदखल करने के आदेश जारी किए। किंतु वर्ष 2016 से वर्ष 2017 आ गया, पर सरकार मजदूर परिवारों के पुनर्वास पर मौन मूक सब देखती रहा। वर्ष 2017 में फरीदाबाद नगर निगम सुप्रीम कोर्ट में इस ऑर्डर को चैलेंज करता है।

वर्ष 2020 में कोरोना का संकट भारत पर मंडराता है और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में 19 फरवरी 2020 को इल लीगल इंक्रोचमेंट हटाने के लिए फरमान जारी करता है। अचानक नगर निगम नोटिस देता है की सभी मजदूर परिवार अपने दस्तावेज जमा कराएं, किंतु महामारी अपने पहले चरण में बड़ी उफान पर थी, साथ ही सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा की थी। ऐसे दौर में लोग अपने दस्तावेज जमा नहीं करवा पाए। लम्बे लॉकडाउन से मजदूरों का रोजगार छिन गया और लोग भूख के जंग लड़ने लगे। अचानक सितंबर 2020 के अंत में नगर निगम फरीदाबाद ने अपना बुल्डोजर चलाकर 1700 से ज्यादा घरों को तोड़ डाला। बंधुआ मुक्ति मोर्चा एवं राष्ट्रीय मजदूर आवास संघर्ष समिति ने फरीदाबाद डीसी कार्यालय के सामने धरना प्रदर्शन कर पुनर्वास की मांग की।

वर्ष 2010 में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण पुनर्वास नीति 2010 के मुताबित कट ऑफ डेट 2003 थी अर्थात पुनर्वास केवल 2003 से पहले बसे लोगों को ही मिल पाएगा इसलिए तत्काल वर्ष जनवरी, 2021के प्रारंभ में ही पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। फरवरी से अप्रैल, 2021 के बीच 3 बार मेटर की सुनवाई चली और हरियाणा सरकार को रिप्लाई फाइल करने का समय दिया गया जबकि हाई कोर्ट ने खोरी गांव के मजदूर परिवारों को स्टे देने इनकार कर दिया क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग था।

2 अप्रैल 2021 को नगर निगम ने फिर 300 घरों को तोड़ दिये, वहीं अप्रैल, 2021 में एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में एक एसएलपी के रूप में सरीना सरकार बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा फाइल हुई जिसमें तत्काल स्टे की प्रेयर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने 7 जून, 2021 को 6 सप्ताह में जंगलात जमीन पर बसे खोरी गांव से लोगो को बेदखल करने के आदेश जारी किए। आदेश मिलते ही फरीदाबाद प्रशासन ने पुलिस बल के पुख्ता इंतजाम कर लिए। फिर लोगों ने इसका विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस पुनर्वास के लिए हर आवाज उठाने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार कर मन मुताबिक सेक्शन लगाकर जेल में डालने लगी। 14 जून को 150 लोगों की तथा 15 जून को फिर एक नई एफआईआर दर्ज कर दी गई। ईधर प्रशासन ने लोगों को बिजली एवं पानी की सप्लाई बंद कर दी और लोग ज्यादा परेशान होने लगे।

15 जून, 2021 को सीनियर ऐडवोकेट कोलिन गोंसाल्वेस ने खोरी गांव जाकर सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर को सरल भाषा में लोगों को बताया एवं जमीनी स्तर पर तथ्यों को जानने का प्रयास किया। इसी दिन बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी निर्मल गोराना को सूरजकुंड पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस कस्टडी में निर्मल गोराना के साथ शारीरिक एवं मानसिक टॉर्चर किया गया। बार बार निर्मल के कपड़े उतारकर तो कभी पुलिस दारू पीकर सारा गुस्सा निर्मल गोराना पर निकालने लगी। पुलिस ने मन मर्जी से जो चाहे वो धारा लगा डाली। निर्मल को ब्लैंक पेपर पर सिग्नेचर करने को बाध्य किया गया। सिग्नेचर नहीं करने पर निर्मल की एफआईआर में सेक्शन 180 सीआरपीसी लगा दी गई और निर्मल को ईश्वर सिंह उप निरीक्षक ने बोला की तुझे मैं बर्बाद कर दूंगा। अगर कुछ ज्यादा बोला तो मैं तेरे पर इन्वेस्टिगेशन में देशद्रोह की धारा लगा दूंगा, जिससे कभी भी तू जेल से बाहर नहीं आ पाएगा। लगभग 2 एफआईआर में कई धाराओ में निर्मल को आरोपी बनाया गया और कभी सिर के बाल खींचकर तो कभी धक्का तो कभी मुक्का मारकर टॉर्चर किया गया।

16 जून को फरीदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में निर्मल गोराना को पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। निर्मल गोराना को जमानत पर रिहा कर दिया गया, किंतु कोर्ट में पुलिस 3 दिन के पुलिस रिमांड पर अड़ी हुई थी पर पुलिस का वो सपना पूरा नहीं हो पाया। आज तक लगभग 20 से ज्यादा लोगों को जेल में डाल दिया गया। आज भी 2 व्यक्ति जेल में है जिनकी जमानत करने के लिए मानवाधिकार एडवोकेट अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

15 जून, 2021 को फिर से सुप्रीम कोर्ट में खोरी गांव के प्रतिनिधियों की और से एक एसएलपी पुनर्वास की मांग एवं महामारी में स्टे की मांग को लेकर फाइल की गई, जिसमें 17 जून, 2021 को फिर बेदखली के आदेश की पुनरावृति हुई। खोरी के निवासियों के पुनर्वास की मांग को लेकर 8 जून, 2021 से कई जन संगठनों के सहयोग से एक ऑनलाइन कैंपेन चलाया जा रहा है, जिसमें 20 हजार से ज्यादा ट्वीट एवं लगभग 1500 से ज्यादा इमेल एक पत्र के रूप में डीसी फरीदाबाद, नगर निगम फरीदाबाद एवं मुखमंत्री हरियाणा सरकार को किए गए।

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक हरियाणा में 400 एकड़ की जंगलात की जमीन पतंजलि को दे दी गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की वर्ष 2016 की रिपोर्ट के अनुसार 1000 एकड़ जमीन बाबा रामदेव को सरकार किनोर से दी जानी तय थी। फरीदाबाद प्रशासन ने एक ड्रोन सर्वे कर आंकड़ा दिया की खोरी में 6563 घर रियायशी मकान, 870 कच्चा घर, 70 दुकानें, 2 टावर, 5 स्कूल, 2 इंडस्ट्री, 20 मंदिर, 12 मस्जिद, 1 चर्च है और 170 एकड़ जमीन पर कब्जे का पाया जाना बताया गया है। 15 से 16 जून के बीच में 2 लोगों ने अपने घर के उजड़ने को लेकर परेशान होकर आत्महत्या कर ली। 17 जून को एक महिला की छत से कूद कर जान देने एवं उसके पति की हालत नाज़ुक होने का मामला भी सामने आया है। 18 जून, 2021 को सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा खोरी गांव जाकर मजदूर परिवार के मुलाकात की गई एवं ग्राउंड रियल्टी जानने का प्रयास किया गया।

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