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राष्ट्रीय

सुकमा में सुरक्षा बल के कैंप के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर हुई गोलीबारी में 3 की मौत

Janjwar Desk
19 May 2021 9:56 AM GMT
सुकमा में सुरक्षा बल के कैंप के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों पर हुई गोलीबारी में 3 की मौत
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प्रतीकात्मक तस्वीर 

हम स्वेच्छा से अपनी जमीन अस्पताल व स्कूल के लिए दे देते हैं। हमें सड़क निर्माण के लिए तैनात की जाने वाली सुरक्षा से भी कोई एतराज नहीं है। हम यहां एक कैंप नहीं चाहते।

जनज्वार ब्यूरो। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में सिलगर गाँव के समीप सीआरपीएफ द्वारा 12 मई को एक सुरक्षा कैम्प स्थापित किया गया था। इस नये कैम्प को हटाने की मांग को लेकर आस-पास के ग्रामीण पिछले 4 दिन से प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन करने वालों में आस-पास के 30 गाँव के आदिवासी शामिल हैं। इस दौरान ग्रामीणों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प में 3 लोगों की मौत हो गई। कई ग्रामीण घायल हुये हैं। ग्रामीणों की मौत के बाद से सिलजर गांव के पास स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। सड़क पर पत्थरों और आगजनी के निशान अभी भी मौजूद है।

3 प्रदर्शनकारियों की मौत से ग्रामीणों में गुस्सा

एक प्रदर्शनकारी 65 साल के सोमारू कोरसा कहते हैं- हम लोग 4 दिन से यहां प्रदर्शन कर रहे थे। हमारे पास राशन खत्म हो चुका है। इसलिए हम लोगों ने सोचा कि कैंप को यहां से हटाने संबंधी अपना माँगपत्र देकर कर घर लौट जाएंगे। अगर कैंपर नहीं हटा तो हम लोग दोबारा प्रदर्शन करने के लिए आते। लेकिन हमारे तीन ग्रामीण साथियों को मार दिया गया है और कई घायल है इसलिए हम यहां से हटने वाले नहीं हैं।

जनजातीय लोगों ने पुलिस व सुरक्षबलों पर गंभीर आरोप लगाया है। अपना माँगपत्र सौंपने गये ग्रामीणों पर टीयर बम छोड़े गए, ओपन फायर किया गया। इस पर गुस्साए ग्रामीणों ने भी कैंप पर और पुलिस के वाहनों पर पत्थर फेंके। जब वे अपने तीन मृतक साथियों के मृतक शरीर को लेने गए तब उन पर दोबारा लाठीचार्ज किया गया। इसके साथ ही ग्रामीणों को नक्सली कैडर कहा गया।

इस मामले में बस्तर के आईजी पी सुंदर राज ने कहा कि 'हमारे लोगों ने स्थिति नियंत्रण से बाहर होने के बाद फायर किया था ताकि स्थिति को नियंत्रण में लाया जा सके।' पुलिस ने अब तक 5 लोगों को गिरफ्तार किया है इनमें एक महिला भी शामिल है। मारे गये लोगों को अब तक ग्रामीणों को नहीं लौटाया गया है। पुलिस का कहना है कि मृतकों की पहचान नहीं हुई है।

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान एक ग्रामीण सुनील कोरसा कहते हैं- हम स्वेच्छा से अपनी जमीन अस्पताल व स्कूल के लिए दे देते हैं। हमें सड़क निर्माण के लिए तैनात की जाने वाली सुरक्षा से भी कोई एतराज नहीं है। हम यहां एक कैंप नहीं चाहते। एक बार कैंप स्थापित हो जाने के बाद हमारे आंदोलनों से लेकर हमारे रीति-रिवाज तक हर चीज की जांच की जाएगी। हम नक्सलियों और पुलिस दोनों के डर से नहीं जीना चाहते।

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