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बॉम्बे HC ने तब्लीगीयों पर दर्ज सभी FIR किए रद्द, कहा मीडिया ने दुष्प्रचार कर बनाया बलि का बकरा

Janjwar Desk
22 Aug 2020 10:21 AM GMT
बॉम्बे HC ने तब्लीगीयों पर दर्ज सभी FIR किए रद्द, कहा मीडिया ने दुष्प्रचार कर बनाया बलि का बकरा
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कोर्ट ने कहा कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बड़े स्तर पर मर्क़ज दिल्ली में शामिल होने वाले विदेशी नागरिकों के खिलाफ प्रोपेगंडा किया गया और ऐसी तस्वीर बनाने का प्रयास किया गया कि ये विदेशी भारत में कोरोना वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार थे....

मुंबई। बीते कुछ महीने पहले जब तब्लीगी जमात के सदस्यों पर आरोप लगाया गया कि वह देश में कोरोना फैला रहे हैं, तो यह खबर देश और दुनिया की मीडिया में छा गई थी। देश का कथित मुख्यधारा का मीडिया बिना दोष साबित हुए तब्लीगियों को दोषी बताने लगा। लेकिन शनिवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए 29 विदेशी नागरिकों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर को खारिज कर दिया। इन तब्लीगियों केखिलाफ आईपीसी, महामारी अधिनियम, महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम और विदेशी नागरिक अधिनियम, टूरिस्ट वीजा का उल्लंघन समेत कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था।

पुलिस ने विदेशी नागरिकों के अलावा उन्हें आश्रय देने के आरोप में छह भारतीय नागरिकों और मस्जिदों के ट्रस्टियों को भी बुक किया था। आज औरंगाबाद पीठ के जस्टिस टीवी नलवाडे और जस्टिस एमजी सेवलिकर की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर तीन अलग-अलग याचिकाओं को सुना, जो कि आइवरी कोस्ट, घाना, तंजानिया, जिबूती, बेनिन और इंडोनेशिया जैसे देशों से संबंधित हैं। सभी याचिकाकर्ताओं को पुलिस द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में संबंधित मस्जिदों में रहने और लॉकडाउन के आदेशों का उल्लंघन कर नमाज अदा करने की कथ‌ित गुप्त सूचनाओं बाद बुक किया गया था।

कानूनी मामलों की समाचार वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे भारत सरकार द्वारा जारी वैध वीजा पर भारत आए थे और वे भारतीय संस्कृति, परंपरा, आतिथ्य और भारतीय भोजन का अनुभव करने आए थे। उनकी दलील थी कि भारत पहुंचने के बाद, हवाई अड्डे पर उनकी COVID-19 की जांच की गई और जब उन्हें नेगेटिव पाया गया, तब उन्हें हवाई अड्डे से बाहर जाने की अनुमति दी गई।

इसके अलावा, उन्होंने अहमदनगर जिले के पुलिस अधीक्षक को आने की सूचना दी थी। 23 मार्च के बाद लॉकडाउन के कारण, वाहनों की आवाजाही बंद कर दी गई। होटल और लॉज बंद कर दिए गए, इसलिए उन्हें मस्जिद ने आश्रय दिया था। वे जिला कलेक्टर के आदेश के उल्लंघन सहित अवैध गतिविधि में शामिल नहीं थे।

उन्होंने कहा कि मर्क़ज़ में भी उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग के मानदंडों का पालन किया था। उनका तर्क है कि वीजा दिए जाने के दौरान, उन्हें स्थानीय अधिकारियों को अपनी यात्राओं के बारे में सूचित करने के लिए नहीं कहा गया था, लेकिन उन्होंने अधिकारियों को सूचित किया था। इसके अलावा, वीजा की शर्तों के तहत, मस्जिद जैसे धार्मिक स्थानों पर जाने के लिए कोई निषेध नहीं था।

दूसरी ओर अहमदनगर के जिला पुलिस अधीक्षक ने अपने जवाब में कहा कि याचिकाकर्ताओं को इस्लाम धर्म का प्रचार करने के लिए घूमते हुए पाया गया और इसलिए, उनके खिलाफ अपराध दर्ज किए गए। उन्होंने यह भी कहा कि तीन अलग-अलग मामलों के पांच विदेशी नागरिक वायरस से संक्रमित पाए गए। उन्होंने कहा, क्वारंटीन अव‌धि समाप्त होने के बाद सभी याचिकाकर्ताओं को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया था।

डीएसपी ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने निषेधात्मक आदेश जारी कर सभी सार्वजनिक स्थानों को बंद करने के निर्देश दिए थे। हालांकि, प्रतिबंधात्मक आदेशों और वीजा की शर्तों के बावजूद, याचिकाकर्ताओं ने तब्लीग गतिविधि में भाग लिया। इसके अलावा, सार्वजनिक स्थानों पर घोषणा की गई थी कि जो लोग मर्क़ज़ मस्जिद से आए थे, वे COVID-19 परीक्षण के लिए स्वेच्छा से आगे आएं, लेकिन वे स्वेच्छा से आगे नहीं आए और उन्होंने संक्रमण फैलने का खतरा पैदा किया।

याचिकाकर्ताओं पर भारतीय दंड संहिता की धारा 188, 269, 270, 290 के तहत धारा 37 (1) (3) आर / डब्ल्यू के तहत, महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951 के 135 और महाराष्ट्र COVID-19, उपाय और नियम, 2020 के सेक्‍शन 11, महामारी रोग अधिनियम, 1897 की धारा 2, 3 और 4, विदेशियों के लिए अधिनियम 1946 की धारा 14(b), आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के सेक्‍शन 51(b) के तहत अपराध दर्ज किया गया था।

वीजा शर्तों के अध्ययन के बाद जस्टिस नलवाड़े ने कहा कि रिकॉर्ड पर पेश की गई पूर्वोक्त सामग्री से पता चलता है कि हाल ही में नवीनीकृत कि गए मैनुअल ऑफ वीजा के तहत भी, धार्मिक स्थानों पर जाने और धार्मिक प्रवचनों में शामिल होने जैसी सामान्य धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए विदेशियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। आमतौर पर एक पर्यटक से यदि वह धार्मिक विचारधाराओं आदि का प्रचार नहीं करना चाहता है तो पैरा संख्या 19.8 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने की उम्मीद नहीं है।

जस्टिस नलवाडे ने आगे कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि तब्लीग जमात मुस्लिमों का अलग संप्रदाय नहीं है, बल्‍कि यह धर्म के सुधार के लिए आंदोलन है। हर धर्म सालों तक सुधार के कारण विकसित हुआ है क्योंकि समाज में परिवर्तन के कारण और भौतिक दुनिया में हुए विकास के कारण सुधार हमेशा आवश्यक है। किसी भी मामले में, रिकॉर्ड से भी, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है कि विदेशी नागरि दूसरे धर्म के व्यक्तियों को इस्लाम में परिवर्तित कर इस्लाम धर्म का विस्तार कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि विदेशी भारतीय भाषाओं जैसे कि हिंदी या उर्दू में बात नहीं करते हैं और वे अरबी, फ्रेंच आदि भाषाओं पर बात कर रहे हैं। उपरोक्त चर्चा के मद्देनजर, यह कहा जा सकता है कि विदेशियों का इरादा तब्लीगी जमात के सुधारा में बारे में विचारों को जानने का हो सकता है। आरोपों की प्रकृति में बहुत अस्पष्ट हैं और इन आरोपों से यह अनुमान लगाना किसी भी स्तर पर संभव नहीं है कि वे इस्लाम धर्म का प्रसार कर रहे थे और धर्मांतरण का इरादा था। यह भी नहीं है कि इन विदेशियों से किसी भी बात पर राजी होने का तत्व है।

मीडिया की भूमिका की आलोचना करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बड़े स्तर पर मर्क़ज दिल्ली में शामिल होने वाले विदेशी नागरिकों के खिलाफ प्रोपेगंडा किया गया और ऐसी तस्वीर बनाने का प्रयास किया गया कि ये विदेशी भारत में कोरोना वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार थे। इन विदेशियों का वस्तुतः उत्पीड़न किया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब महामारी या विपत्ति आती है, तब एक राजनीतिक सरकार बलि का बकरा ढूंढने की कोशिश करती है और हालात बताते हैं कि इस बात की संभावना है कि इन विदेशियों को बलि का बकरा बनाने के लिए चुना गया था। उपरोक्त परिस्थितियों और भारत में संक्रमण के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी। अब विदेशियों के खिलाफ की गई इस कार्रवाई के बारे में पश्चाताप करने और इस तरह की कार्रवाई से हुए नुकसान की भरापाई के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाने के लिए उचित समय है।

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