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झारखंड

ग्राउंड रिपोर्ट : हैदराबाद नहीं लौट पाने के कारण झारखंड के गोरटोली गांव को हो रहा हर महीने 10 लाख का घाटा

Janjwar Desk
12 Aug 2020 8:22 AM GMT
ग्राउंड रिपोर्ट : हैदराबाद नहीं लौट पाने के कारण झारखंड के गोरटोली गांव को हो रहा हर महीने 10 लाख का घाटा
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बुजुर्ग बंशी यादव व उनकी पत्नी मुनिया देवी अपने दिवंगत बेटे सुनील यादव की तसवीर दिखाते हुए, जो हैदराबाद में जूस का स्टाॅल चलाते थे।

लाॅकडाउन ने कैसे उत्तर भारत के गांवों की आर्थिक कमर तोड़ी है, इसका एक उदाहरण झारखंड के गिरिडीह जिले का गोरटोली गांव है। यह गांव पूरी तरह से प्रवासियों की कमाई पर निर्भर है। रोटी, कपड़ा से लेेकर मकान तक के लिए। लाॅकडाउन की वजह से यह गांव आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे में यहां के युवा फिर अपनी काम धंधे वाली जगह पर वापसी की तैयारी में हैं...

गिरिडीह से राहुल सिंह की रिपोर्ट

झारखंड के गिरिडीह जिले (Giridih) के गोरटोली गांव (Gortoli Village in Deori Block Giridih District) के 66 साल के वंशी यादव ने पांच बार वृद्धावस्था पेंशन के लिए आवेदन दिया, लेकिन अबतक उनके नाम को इसके लिए स्वीकृति नहीं मिली। उनकी पत्नी मुनिया देवी भी वृद्धावस्था पेंशन से वंचित हैं।

वंशी यादव के पास बामुश्किल पांच-छह कट्ठा खेत है। यानी वे सीमांत किसान हैं। वे कोरोना महामारी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित हैं। उनके खाते में दूसरे किसानों की तरह केंद्र के दिए दो हजार रुपये की एक भी किश्त नहीं आयी है। न खेती, न सरकारी नौकरी, न सरकार की योजनाओं का लाभ। ऐसे में वे चाहते हैं कि उनका बेटा अनिल यादव फिर से अपने काम धंधे वाले शहर हैदराबाद चला जाए और वहां की कमाई से परिवार की मदद पहले की तरह करे। वंशी यादव कहते हैं कि लाॅकडाउन का बहुत खराब असर उनके गांव पर पड़ा है।

अनिल लाॅकडाउन के दौरान मई में गांव के अन्य लड़कों के साथ गाड़ी रिजर्व कर घर आए। तब से यहीं हैं। चार महीने गुजर गए। लेकिन, अब वे और उनके जैसे गांव के दूसरे युवक भी चाहते हैं कि हैदराबाद लौटा जाएं। गांव के 10-15 लोग हैदराबाद जा चुके हैं और उनसे यहां रह रहे दूसरे लोग बातचीत कर वहां की जानकारी ले रहे हैं। अनलाॅक की प्रक्रिया शुरू हो जाने के कारण स्कूल-काॅलेज छोड़ दूसरे संस्थान खुल गए हैं। ऐसे में अनिल व दूसरे लड़के ट्रैवल एजेंट से संपर्क कर ट्रेन के टिकट के जुगाड़ में लगे हैं। टिकट मिलने पर ये लोग वापस लौट जाएंगे।

वंशी यादव के परिवार की कहानी

वंशी यादव के दो बेटे थे, जिसमें छोटे बेटे सुनील यादव की दो साल पहले गांव के पास ही सड़क हादसे में मौत हो गई। पहले अनिल और सुनील दोनों हैदराबाद में रहकर जूस का स्टाॅल चलाते थे और हर महीने घर वालों के लिए पैसे भेजते थे। अब अनिल अकेले यह काम करते हैं। अनिल अब अकेले भाई हैं और परिवार के भरण पोषण का इकलौता माध्यम भी। जनज्वार संवाददाता जब गांव पहुंचता है तो उनके पिता बंशी यादव भावुक होकर अपने दिवंगत बेटे सुनील यादव की तसवीर दिखाते हैं और यह जानना चाहते हैं कि क्या सरकार से कोई मुआवजा मिल सकता है। सुनील की पत्नी व एक छोटा बेटा भी परिवार में हैं।

प्रवासियों के लिए अपना रोजगार नौकरी से बेहतर

गोरटोली गांव गिरिडीह-कोडरमा रोड पर हीरोडीह थाना के निकट स्थित है। यह गांव गिरिडीह जिले के देवरी प्रखंड के जमखोखरो पंचायत में पड़ता है। इस गांव में करीब 120 परिवार हैं और लगभग इतनी संख्या में यहां के पुरुष सदस्य हैदराबाद में रहते हैं। छिटपुट संख्या में कुछ लोग दूसरे औद्योगिक शहरों दिल्ली, मुंबई या सूरत में भी रहते हैं। दरअसल, गिरिडीह जिले के उत्तरी हिस्से से रोजगार के लिए महानगरों व औद्योगिक राज्यों में पलायन बहुत अधिक हुआ है। देवरी, तीसरी, जमुआ व बगोदर प्रखंड से बड़ी संख्या में लोग महानगरों में रहते है। विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने लाॅकडाउन के दौरान यह दावा किया था कि उनके गृह जिले गिरिडीह के करीब 50 हजार लोग बाहर रहते हैं।

गोरटोली गांव में यादव, बढई, सोनार जाति के लोग हैं। इस गांव में कई ऐसे परिवार हैं, जिसके दो से तीन सदस्य हैदराबाद में रहते हैं। गांव के 80 प्रतिशत परिवारों का कम से कम एक सदस्य हैदराबाद में रहता ही है। वे सब वहां जूस का काम करते हैं। सड़क किनारे जूस का स्टाॅल लगाते हैं और उससे इनको किसी कारखाने में काम करने की तुलना में अधिक अच्छी कमाई होती है। औसतन 20 हजार रुपये एक व्यक्ति कमा लेता है, जबकि लाॅकडाउन के दौरान जो जानकारियां आयीं हैं, उसके अनुसार कारखानों व अन्य साइट पर काम करने वाले लोगों मासिक कमाई औसतन 12-13 हजार रुपये होती है। मोटे तौर पर उनकी तनख्वाह 10 हजार से 15 हजार रुपये महीने के बीच होती है।

यानी अपना काम अधिक फायदे का धंधा है। दूसरे पेशे से अधिक अच्छी कमाई इन्हें उन काम में शामिल होने से भी रोकती है। हैदराबाद में जूस की दुकान चलाने वाले यहां के युवा बताते हैं कि गर्मी के तीन महीनों अप्रैल, मई और जून में सेल बाकी महीने से दोगुणा हो जाता है तो कमाई और बढ जाती है।

गोरटोली के हैदराबाद में रहने वाले लोग, जो अब अनलाॅक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद वापसी की तैयारी में हैं।

गांव की पूरी अर्थव्यवस्था हैदराबाद की कमाई पर टिकी है

गोरटोली गांव की पूरी अर्थव्यवस्था (Lockdown Impact Case Study in Jharkhand Gortoli Village) ही हैदराबाद की कमाई पर टिकी है। लाॅकडाउन पूर्व की स्थिति की बात करें तो, यहां के 120 से 130 लोग हैदराबाद में रहते हैं और प्रति व्यक्ति अगर गांव अपने परिवार को आठ हजार रुपये भी हर महीने भेजता है तो गांव में हर महीने 10 लाख रुपये पहुंचता है। हालांकि गांव के कुछ लोग यह कहते हैं कि कई ऐसे लोग है जो 15 हजार रुपये महीने तक घर भेजते हैं। गर्मी में कमाई भी ज्यादा होती है और ऐसे में यह मासिक औसत 15 लाख रुपये तक भी हो सकता है।

हैदराबाद की कमाई से गांव में अधिकतर लोगों ने पक्का मकान बना लिया है। गांव में कई लोगों के पास पुराना कच्चा मकान व नया पक्का मकान दोनों है। गांव में जब लोगों के पास पैसे आए तो सीमेंट की दो दुकानें भी खुल गईं, लेकिन अब लाॅकडाउन में उनकी बिक्री मंद है। सीमेंट दुकान चलाने वाले युवा राकेश रंजन बताते हैं कि लाॅकडाउन के कारण लोगों के पास नकदी नहीं हैं, इस कारण दुकान की बिक्री 70 प्रतिशत तक गिर गई है। वे कहते हैं कि जो मकान बन रहे थे, उसमें अधिकतर का काम ठप है। गांव के अपवाद में ही ऐसे लोब हैं जो परिवार के साथ हैदराबाद में रहते हैं। लोगों का गांव से लगाव ऐसा है कि वहां की कमाई वहां की जगह अपने पैतृक स्थल में ही निवेश करते हैं।

अनिल यादव अपने पुराने कच्चे मकान में और नये पक्के मकान में।

लाॅकडाउन लगने के बाद जब थोड़ी छूट मिली तो यहां के रहने वाले युवा गाड़ी रिजर्व कर गांव चले आए। हर व्यक्ति पर पांच हजार रुपये तब खर्च आया था।

एक युवा संतोष यादव बताते हैं कि वे आठ साल से हैदराबाद में रह रहे हैं और जूस की दुकान चलाते हैं। वे कहते हैं कि यहां रहने पर काम नहीं चलेगा, यहां हम न बिजनेस कर सकते हैं और न कोई दूसरा रोजगार है।

हैदराबाद में ही 11 साल से रह रहे सुभाष यादव कहते हैं, हैदराबाद हम नहीं जाएंगे तो घर नहीं चलेगा, वहीं की कमाई से हमारा सारा काम होता है। सुभाष यादव सात-महीने से गांव में फंसे हुए हैं। वे ठंडे के महीने में गांव आए और होली के बाद जाने की सोच ही रहे थे कि कोरोना महामारी की वजह से लाॅकडाउन लग गया।

गांव के एक युवक राजू यादव भी हैदराबाद में ही जूस बनाने का काम करते हैं। राजू जब लाॅकडाउन में गांव आए तो उन्होंने स्थानीय स्तर पर रोजगार पाने के लिए मनरेगा में रजिस्ट्रेशन व जाॅब कार्ड के लिए पंचायत सेवक को आवेदन दिया लेकिन ढाई-तीने महीने बाद भी उनका जाॅब कार्ड नहीं बन सका है। राजू बताते हैं कि रोजगार सेवक को 40 से 50 लोगों ने मनरेगा जाॅब कार्ड के लिए आवेदन दिया, लेकिन बन नहीं पाया है। वे कहते हैं कि इस संबंध में पूछने पर रोजगार सेवक कहते हैं कि लाॅकडाउन के बाद ही बनेगा। यह स्थिति तब है जब मनेरगा में अतिरिक्त रोजगार सृजन के लिए केंद्र सरकार ने 40 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम दी है। यह रकम कोरोना महामारी के दौरान मोदी सरकार द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम पैकेज का हिस्सा है।

हैदरबाद में स्थानीय लोगों का संगठन भी है सक्रिय

गांव के ही एक युवक अमित कुमार यादव बताते हैं कि हम वहां हैदरबाद हाइटैक सिटी, सिकंदराबाद, बंजारा हिल, उप्पल आदि जगहों पर रहते हैं। लोगों का एक दूसरे संपर्क बना रहता है और सामाजिक आयोजनों पर मिलना-जुलना होता है।

गिरिडीह जिले के ही जमुआ प्रखंड के जीत यादव ने हैदराबाद में झारखंड एकता समाज नामक एक संगठन बना रखा है, जिसमें एक हजार सदस्य हैं। यह संगठन झारखंड वासियों की एकजुटता के लिए काम करता है। इस संगठन में वर्तमान में मुख्य रूप से गिरिडीह, कोडरमा व हजारीबाग के लोग हैं। संगठन जरूरत पड़ने पर किसी की आर्थिक सहायता भी करता है और उनके हक के मुद्दे भी उठाता है। अस्तपाल में भी इलाज के दौरान जरूरतमंद को भी मदद दी जाती है।

संगठन में शामिल हर सदस्य को हर महीने 100 रुपये चंदा देना होता है। साल में एक बार 29 जुलाई को वार्षिक आयोजन होता है, जिसमें सभी जुटते हैं। उस आयोजन में झारखंड के किसी स्थानीय नेता या फिर हैदराबाद के ही किसी प्रमुख व्यक्ति को बुलाया जाता है। हैदराबाद में इनके आयोजन में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, पूर्व विधायक राजकुमार यादव व तेलंगाना के चर्चित भाजपा विधायक राजा सिंह शामिल हो चुके हैं।

गांव में शिक्षा की बेहतर सुविधाएं नहीं हैं। एक प्राइमरी स्कूल है, जो एक ही शिक्षक के भरोसे चलता है। जरूरतों की वजह से लोगों का पढाई से अधिक रोजगार पर जोर हैं। हालांकि अब नई पीढी के कुछ युवा हजारीबाग, गिरिडीह में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल छह-सात ही ग्रेजुएट हैं। हाइस्कूल में पढाई के लिए लड़कियां तीन किमी दूर तो लड़के आठ किमी दूर जाते हैं।

गांव में एक भी ऐसा परिवार नहीं है जिसके पास कृषि से सहज जीवन गुजारने के लिए आठ-दस बीघा खेत हो। अधिकतर लोग बेहद छोटी कृषि जोत वाले हैं। ऐसे में बिना बाहरी कमाई के इस गांव में भोजन, आवास, शिक्षा व अन्य सुविधाएं सहज-सुलभ नहीं हो सकती। जाहिर है, लोग इसी वजह से अपने ठिकाने पर वापसी की अब तैयारी कर रहे हैं।




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