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Deendayal Upadhyaya's birth anniversary : मुस्लिमों को समस्या और उचित भारतीय नहीं मानते थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय

Janjwar Desk
25 Sep 2021 3:48 PM GMT
Pandit Deen Dayal Upadhyay
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(आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 55वीं जयंती है)

Deendayal Upadhyaya's birth anniversary : पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने अपने लेख में कहा था- अखंड भारत के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा मुस्लिम संप्रदाय की पृथकवादी एवं अराष्ट्रीय मनवृत्ति है। पाकिस्तान की सृष्टि उस मनोवृत्ति की विजय है...

Deendayal Upadhyaya's birth anniversary जनज्वार। आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deen Dayal Upadhyay) की जयंती है। वह एक कुशल अर्थ चिंतक, संगठन शास्त्री, राजनीतिज्ञ, वक्ता, लेखक व पत्रकार साथ एक चिंतक और संगठनकर्ता भी थे। आरएसएस के एक अहम नेता और समाज सेवक होने के साथ ही दीन दयाल साहित्यकार भी थे। अगर देखें तो दक्षिणपंथी खेमे में ऐसे विरले लोग ही मिलेंगे है जो आधुनिक साहित्य में रूचि रखते हों।

दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को ब्रज के मथुरा जिले के छोटे से गांव "नगला चंद्रभान" में हुआ था। उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय और माता का नाम रामप्यारी था जो धार्मिक प्रवृत्ति की थी। एस.डी कॉलेज (S.D college) कानपुर से उन्होंने बीए (B.A) की पढ़ाई पूरी की, जहां उनकी मुलाकात सुरेंद्र सिंह भंडारी, बलवंत महासिंहे जैसे कई लोगों से हुई जिनसे मिलने के बाद दीनदयाल हिन्दू राष्ट्र की सेवा से जुट गये।

दीनदयाल ने बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लिए काम करना शुरू कर दिया था। एक ऐसा दौर भी आया कि संघ में केशव बलिराम हेडगेवार (Keshav Baliram Hedgevar) और माधव सदाशिव गोलवलकर (Madhav Sadashiv Golvalkar) के बाद बड़े स्वयंसेवक में उनकी गिनती होने लगी थी। ये संघ के उबार का दौर था जो एक धर्म के नाम पर अलग समाज का निर्माण करने में लगा था। स्वाधीनता आंदोलन (Freedom Movement) के दौरान अनेक नेता पत्रकारिता का उपयोग समाज हित के लिए करके देश को स्वतंत्रता दिलाने में मदद कर रहे थे। लेकिन ऐसे बहुत से लोगो ने इस माध्यम का निजी महत्वाकांक्षा और संगठन के प्रचार-प्रसार के लिए भी किया।

इसी क्रम में संघ ने भी पत्रकारिता का उपयोग अपनी विशेष विचारधारा और संगठन के प्रचार-प्रसार के लिए किया। शायद पंडित दीनदयाल उपाध्याय से बेहतर इस काम के लिए संघ में कोई दूसरा नहीं था और उन्होंने इसे बख़ूबी से अंजाम दिया। इस क्रम में उनके हिंदी और अंग्रेजी के लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। उन्होंने "चंद्रगुप्त नाटक" भी लिखा था।

दीनदयाल ने लखनऊ में राष्ट्र धर्म (Rashtra Dharma) प्रकाशन नामक संस्थान की स्थापना की और अपनी हिन्दूवादी (Hindutva) विचारधारा को प्रस्तुत करने के लिए एक मासिक पत्रिका "राष्ट्र धर्म" की शुरुआत की थी, जो बाद में उन्होंने पांचजन्य (साप्ताहिक पत्रिका) तथा "स्वदेश" (दैनिक) की शुरुआत की।

आपको ये भी बताते चलें कि पांचजन्य (Paanchjanya) आरएसएस का मुखपत्र है जो हमेशा से हिन्दूवादी विचारधारा से जुड़े लेख प्रकाशित करती रहती है। अभी कुछ दिन पहले पांचजन्य ने इंफोसिस के मालिक को देश के 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का हिस्सा बताया था जिसपर बवाल हुआ तो सरकार को भी सफाई देनी पड़ी थी।

1953 में अखिल भारतीय जनसंघ (वर्तमान में भाजपा) की स्थापना होने पर, उन्हें यूपी का सचिव बनाया गया। इस वक्त आरएसएस पर गांधी (Mahatma Gandhi) की हत्या से जुड़े होने का आरोप लग रहे थे। इसी समय संघ को एक राजनीतिक पार्टी की जरूरत महसूस हुई और संघ के ही कुछ लोगो ने मिलकर जनसंघ (Jansangh) की स्थापना की, इसका उद्देश्य अपने राजनीतिक हित को साधना था। बलराज माधोक (Balraj Madhok) के नेतृत्व में जनसंघ खड़ा हुआ और संघ के कई दिग्गज़ जनसंघ के जरिये राजनीति में आये। हालांकि संघ ने अपने संगठन को राजनीति से विशुद्ध रूप से अलग रखा जो आज भी है।

दीनदयाल को अधिकांश लोग उनकी सामाजिक सेवा के लिए याद करते हैं। डॉ .श्यामा प्रसाद मुखर्जी (Shyama Prasad Mukherjee) ने दीनदयाल की कुशल संगठन क्षमता के लिए कहा था कि अगर भारत के पास 2 दीनदयाल होते तो भारत का राजनीतिक परिदृश्य ही अलग होता। शायद वो एक हिन्दू राष्ट्र की तरफ इशारा कर रहे थे। अगर देखें तो शुरू से लेकर आजतक संघ का एजेंडा यही है।

दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक जीवन के विवाद पर आरएसएस के मुखपत्र कहे जाने वाले ऑर्गेनाइजर (Organiser) के पूर्व संपादक रहे आर बालाशंकर ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने ओपिनियन में लिखा था, 'भाजपा के दीनदयाल उपाध्याय की वही अहमियत है जो कांग्रेस के लिए मोहनदास करमचंद गांधी की है।' भाजपा के लिए दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक जीवन का सफर एक प्रेरणादायक सफल रहा। लेकिन कांग्रेस और अन्य पार्टियों के लिए उनकी छवि एक हिंदुत्व विचारधारा के रूप में उभर कर सामने आई जिनका मानना था कि दीनदयाल उपाध्याय मुसलमानों को एक उचित भारतीय नहीं मानते हैं। लेकिन ये भी सच है कि संघ ने भी मुसलमानों के प्रति अपना रुख साफ नहीं किया।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दावा है कि वह दीनदयाल उपाध्याय को अपना आदर्श तथा प्रेरणा स्रोत मानकर कार्य कर रही है। लेकिन कहीं ना कहीं लोग इसे जातिवादी समीकरण बैठाने के लिए जातिगत राजनीति के नजरिये से भी देखते रहे हैं। भाजपाई कहते हैं कि दीनदयाल उपाध्याय जितनी अधिक श्रद्धा, भक्ति राष्ट्र के प्रति रखते थे, उतनी ही आस्था एवं श्रद्धा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति रखते थे। उन्होंने अपने संपूर्ण राजनीतिक जीवन में लोकतांत्रिक मूल्यों को गतिशीलता प्रदान की है।

बीते सालों में भाजपा ने दीनदयाल उपाध्याय की जन्म शताब्दी के आयोजन पर हिंदुत्व ब्रिगेड के संगठनों को यह अवसर प्रदान किया कि उनकी महानायक जैसी छवि प्रस्तुत की जाए। भाजपाईयों द्वारा दीनदयाल उपाध्याय को नायक बताते हुए उनके नाम पर रेलवे स्टेशन और कई कॉलेजों के नाम रखे गए। जिसमें मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन और गोरखपुर कॉलेज का नाम दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज रखा गया।

कांग्रेस पार्टी के लिए दीनदयाल उपाध्याय की छवि

कांग्रेस (Congress) को सरकारी पत्राचार में भारतीय जनसंघ के संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीरों के इस्तेमाल पर आपत्ति है। कांग्रेस का कहना है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय मुसलमानो के प्रति उनका अपना एक अलग नज़रिया था। वह केवल हिंदुत्व की विचारधारा का पालन करते थे। दैनिक भास्कर ने अपने 6 महीने पहले छपी एक रिपोर्ट में बताया था कि भाजपा- कांग्रेस हेडक्वार्टर एक ही सड़क पर बने हैं। लेकिन कांग्रेस ने अपने मुख्यालय के पते से दीनदयाल उपाध्याय मार्ग हटाकर कोटला रोड कर दिया।

दिल्ली के दीनदयाल मार्ग पर दो बड़ी पार्टी भाजपा और कांग्रेस के दफ्तर होंगे, जिसमें भाजपा का दफ्तर 2018 में ही तैयार हो गया और कांग्रेस कार्यालय का कार्य प्रगति पर है। भाजपा के दफ्तर का पता 6A, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग है लेकिन उसी सड़क पर स्थित कांग्रेस ने अपने दफ्तर का पता 9, कोटला रोड तय किया। बीते साल मनाई गई दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर कांग्रेस नेताओं ने कहा था कि भाजपा केवल दीनदयाल उपाध्याय की छवि को नायक के रूप में गड़ रही है, जबकि उनकी स्वाधीनता आंदोलन और राजनीति में एकतरफा विचारधारा थी।

मुसलमानों पर राय

दीन दयाल उपाध्याय भारतीय राष्ट्र राज्य में मुसलमानों की स्थिति को लेकर क्या राय रखते थे। उन्होंने 24 अगस्त 1953 को पांचजन्य अखबार में 'अखंड भारत : ध्येय और साधन' नाम लेख में अपने विचार सामने रखे थे। इस लेख में उन्होंने लिखा था- सन 1947 की पराजय भारतीय एकतानुभूति की पराजय नहीं अपितु उन प्रयत्नों की पराजय है जो राष्ट्रीय एकता के नाम पर किए गए। हम असफल इसलिए नहीं हुए कि हमारा ध्येय गलत था बल्कि इसलिए मार्ग गलत चुना। सदोष साधन के कारण ध्येय सिद्धि न होने पर ध्येय न तो त्याज्य ही ठहाराया जा सकता है और न अव्यवहारिक ही। आज भी अखंड भारत की व्यावहारिकता में उन्हीं को शंका उठती है जिन्होंने दोषयुक्त साधनों को अपनाया तथा जो आज भी उनको छोड़ना नहीं चाहते।

इस लेख में उन्होंने आगे लिखा था- "अखंड भारत के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा मुस्लिम संप्रदाय की पृथकवादी एवं अराष्ट्रीय मनवृत्ति है। पाकिस्तान की सृष्टि उस मनोवृत्ति की विजय है। अखंड भारत के संबंध में शंकाशील यह मानकर चलते हैं कि मुसलमान अपनी नीति में परिवर्तन नहीं करेगा। यदि उनकी धारणा सत्य है तो फिर भारत के चार करोड़ मुसलमानों को बनाए रखना राष्ट्रहित के लिए संकट होगा। क्या कोई कांग्रेसी यह कहेगा कि मुसलमानों को भारत से खदेड़ दिया जाए? यदि नहीं तो उन्हें भारतीय जीवन के साथ समरस करना होगा। यदि भौगोलिक दृष्टि से खंडित भारत में यह अनुभूति संभव है तो शेष भू-भाग को मिलते देर नहीं लगेगी। एकता की अनुभूति के अभाव में देश खंडित हुआ है तो उसके भाव से वह अब अखंड होगा। हम उसी के लिए प्रयत्न करें। किंतु मुसलमानों को भारतीय बनाने के अलावा हमें अपनी तीस साल पुरानी नीति बदलनी पड़ेगी। कांग्रेस ने हिंदू मुस्लिम एक्य के प्रयत्न गलत आधार पर किए। उसने राष्ट्र की और संस्कृति की सही एवं अनादि से चली आने वाली एकता का साक्षात्कार किया तथा अनेकों को कृत्रिक तथा राजनीतिक सौदेबाजी के आधार पर एक करने का प्रयत्न किया। भाषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि सभी की कृत्रिम ढंग से रचना की। ये यत्न कभी सफल नहीं हो सकते थे। राष्ट्रीयता और अराष्ट्रीयता का समन्वय नहीं।"

"यदि हम एकता चाहते हैं तो भारतीय राष्ट्रीयता जो हिंदू राष्ट्रीयता है तथा भारतीय संस्कृति जो हिंदू संस्कृति है, उसका दर्शन करें। उसे मानदंड बनाकर चलें। भागीरथी की पुण्य धाराओं में सभी प्रवाहों को संगम होने दें। यमुनाभी मिलेगी और अपनी सभी कालिमा खोलकर गंगा की धवल धारा में एकरूप होजाएगी। किंतु इसके िलए भी भागीरथ के प्रयत्नों की निष्ठा एवं सद्विप्रा: बहुधा वदन्ति की मान्यता लेकर हमने संस्कृति और राष्ट्री की एकता का अनुभव किया है।"

दीनदयाल की मौत पर विवाद

11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन में उनकी लाश मिलने से सारे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी। इस दिन दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमई हत्या कर दी गई थी। हत्या को लेकर कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप हुए जो आज भी जारी हैं। भाजपा के नेताओं का कहना है कि पंडित दीनदयाल की हत्या कांग्रेस पार्टी द्वारा करवाई गई क्योंकि उनकी विचारधारा कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी थी। हालांकि ये भी अफवाह है कि इसमें जनसंघ के नेताओ का भी हाथ हो सकता है, इसके कोई पुख्ता प्रमाण आजतक नहीं हैं। लेकिन ये भी पुख्ता प्रमाण आजतक नहीं मिला की हत्या किसने कारवाई।

बलराज मधोक, जो दीनदयाल के हत्या के बाद जन संघ के अध्यक्ष बने थे, उनके मुताबिक वह परिवार की आंतरिक राजनीति का शिकार हुए। बलराज मधोक अपनी आत्मकथा "जिंदगी का सफ"-3. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या से इंदिरा गांधी की हत्या तक में लिखते हैं कि दीनदयाल की हत्या के पीछे ना कम्युनिस्टों का हाथ था, ना ही किसी चोर का था। उन्हें अपने लोगों द्वारा भेजे गए हत्यारे ने ही मारा। उनकी हत्या भाड़े के हत्यारे ने की थी। उनकी हत्या के साजिशकर्ता स्वार्थी एवं मतलबी किस्म के संघ - जनसंघ के कुछ नेता थे। 25 मार्च 1968 को नागपुर से नानाजी देशमुख ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मौत को राजनीतिक हत्या करार दिया था। उनका कहना था कि उपाध्याय के पास कुछ गोपनीय दस्तावेज थे जिन्हें हासिल करने के लिए किसी ने उनकी हत्या करवाई।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती

25 सितंबर 2021 यानी आज दीनदयाल उपाध्याय थी 55 वी जयंती है। इस मौके पर बीजेपी के कई नेताओं द्वारा उनको याद कर श्रद्धांजलि दी गई। पीएम मोदी ट्वीट कर बोले एकात्मक मानव दर्शन के प्रेरणा पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना जीवन समर्पित किया। उनके विचार देशवासियों को सदैव प्रेरित करते रहेंगे।

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