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झारखंड: 5 बच्चों के साथ भूखा रहने को मजबूर है पोड़ाहाट की गुम्मी दिग्गी

Janjwar Desk
18 July 2021 2:30 AM GMT
झारखंड: 5 बच्चों के साथ भूखा रहने को मजबूर है पोड़ाहाट की गुम्मी दिग्गी
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(11 मुख्यमंत्रियों में रघुबर दास को छोड़कर दस मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय के रहे हैं, बावजूद राज्य के आम आदिवासियों के जीवन स्तर पर कोई विशेष बदलाव नजर नहीं आ पा रहा है)

जिन्हें भी सत्ता मिली, वे केवल अपनी कुर्सी बचाने के ही फिराक में लगे रहे। उनमें झारखंड के विकास और आदिवासीयों के प्रति संवेदना का घोर अभाव रहा। यही वजह रही कि राज्य में भूख की समस्या आज भी वहीं खड़ी जहां वह राज्य बनने के पहले खड़ी थी....

विषद कुमार की रिपोर्ट

जनज्वार। भारत की आजादी के 53 साल बाद 2000 में आदिवासियों के विकास के निहितार्थ झारखंड अलग राज्य अस्तित्व में आया। वैसे आदिवासियों की बहुलता और उनके विकास के निहितार्थ ही गुलाम भारत में ही झारखंड राज्य की अवधारणा तैयार की गई थी। इन आंकड़ों पर न जाकर एक और बात बताना जरूरी होगा कि गुलाम भारत में अंग्रेजों के खिलाफ पहली लड़ाई तत्कालीन बिहार के आदिवासियों ने ही लड़ी थी।

बता दें कि 1769 में रघुनाथ महतो के नेतृत्व में 'चुहाड़ विद्रोह' से शुरू होकर 1771 में तिलका मांझी का विद्रोह, 1820-21 का पोटो हो के नेतृत्व में 'हो विद्रोह', 1831-32 में बुधु भगत, जोआ भगत और मदारा महतो के नेतृत्व में 'कोल विद्रोह', 1855 में सिद्धु-कान्हू के नेतृत्व में 'संताल हूल' और 1895 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए 'उलगुलान' ने अंग्रजों को 'नाको चने चबवा' दिये थे।

बता दें कि अलग राज्य गठन के 20 वर्षों में झारखंड 11 मुख्यमंत्रियों सहित तीन बार राष्ट्रपति शासन को झेला है, जो शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में किसी राज्य की यह पहली घटना है। मजे की बात तो यह है कि इन 11 मुख्यमंत्रियों में रघुबर दास को छोड़कर दस मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय के रहे हैं, बावजूद राज्य के आम आदिवासियों के जीवन से जुड़े, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर कोई विशेष बदलाव नजर नहीं आ पा रहा है। कहना ना होगा कि झारखंड अलग राज्य की अवधारणा केवल भाषणों और किताबों तक सिमट कर रह गया है।

कारण साफ है, जिन्हें भी सत्ता मिली, वे केवल अपनी कुर्सी बचाने के ही फिराक में लगे रहे। उनमें झारखंड के विकास और आदिवासीयों के प्रति संवेदना का घोर अभाव रहा। यही वजह रही कि राज्य में भूख की समस्या आज भी वहीं खड़ी जहां वह राज्य बनने के पहले खड़ी थी।

गुम्मी दिग्गी के पति का देहांत 4 साल पहले हो गया था। कुछ ही महीने बाद परिवार की आर्थिक हालत बहुत ही खराब होने लगी। गुम्मी दिग्गी के 5 बच्चे हैं। सबसे बड़ी बेटी 14 साल की अरकाली दिग्गी है। इस उम्र में जिसके हाथों में कलम और कॉपी होनी चाहिए थी, अचानक उसके मासूम कंधे पर आज अपनी माँ और छोटे भाई बहनों के पालन पोषण की जिम्मेदारी आन पड़ी है।


पिछले साल उसे दूसरे राज्य में काम करने जाना पड़ा। वह जो कमाती, कुछ अपनी माँ को भेज दिया करती थी, जिससे परिवार का कुछ हद तक खर्चा चल पा रहा था। लेकिन इस साल कोरोना महामारी के बीच हुए लॉकडाउन के कारण वह परिवार का कुछ भी मदद नहीं कर पा रही है। ऐसे में छोटे भाई बहनों को गंभीर भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है। इस परिवार के लोगों को न राशन कार्ड का लाभ मिला और न ही विधवा पेंशन और न सरकार की अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ।

यह हाल है झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिला अंतर्गत सोनुआ प्रखंड के पोड़ाहाट पंचायत व गांव का भालूमारा टोले का। जहां रहती है अपने 5 बच्चों के साथ 35 वर्षीया गुम्मी दिग्गी। 4 साल पहले उसके पति की मौत ईंट भट्ठा की दीवार गिरने से उसके नीचे दबकर हो गई थी। वह झारखंड से सटा पश्चिम बंगाल में ईंट भट्ठा में काम करता था। ईंट की पकाई के बाद उसके निकालने की प्रक्रिया में अचानक ईंट का टाल उसके उपर आ गिरा जिससे उसकी घटना स्थल पर ही मौत हो गई। लेकिन उसके परिवार को इस दुर्घटना से हुई मौत का कोई मुआवजा नहीं मिला।

गुम्मी किसी तरह गांव में ही मजदूरी करके और जंगल से जलावन की लकड़ी वगैरह लाकर उसे बेचकर बच्चों का पेट पालती रही। पिछले साल गांव के सरकारी स्कूल में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली बड़ी बेटी अरकाली दिग्गी जिसकी उम्र 13 साल के करीब हो गई थी, पश्चिम बंगाल में ईंट भट्ठा में काम करने चली गई। बता दें कि गुम्मी दिग्गी के 5 बच्चों में से 2 बच्चे स्कूल जाते थे, 13 साल की लड़की तीसरी कक्षा में और 10 साल की लड़की दूसरी कक्षा में पढ़ती थी।

स्कूल जाने का एकमात्र कारण था, मध्याह्न भोजन। इन बच्चों को स्कूल में मध्याह्न भोजन में जो खाना मिलता था, उसमें से कुछ बचाकर घर लाते थे, जिसे अन्य तीन भाई—बहन का पेट भरता था। लेकिन वह भी कोरोना काल में हुए लॉकडाउन के कारण बंद हो गया। तब 13 साल की अरकाली दिग्गी को काम करने पश्चिम बंगाल जाना पड़ा। लेकिन इस वर्ष के लॉकडाउन में उसे घर आना पड़ा, जिस कारण इस परिवार को भूखों मरने की स्थिति आ गई है, बावजूद कोई सुध लेने वाला नहीं है।

गुम्मी दिग्गी हो जनजाति समुदाय से आती है, वह हिन्दी तो थोड़ी बहुत समझ लेती है लेकिन बोल नहीं पाती, ऐसे में वह अपनी हो भाषा में बताती है- ''अंञ (तअः) जान सोरकारी योजना रेया: लोभ कॉलिंग नमतडा/नमाकडा। रोशोन कार्ड, विधवा पेंशन, स्वास्थ्य कार्ड, मनरेगा कार्ड, गैस, शौचालय को बनोअ:। प्रधानमंत्री आवास/ओवाअः गे मेनःअ:। गेलउपुन सिरमारेन कुई होन तञ बंगाल पईटीइ सेनाकनाअ:। अंञ नेन तअः रे ठिकेदारी रेञ पइटी तना। ऐनाओ कोरोना ते कञ नमे तना। मोंया होन को मेनाअःकोवा। उपुन सिरमा अयारते अञः कोवा गो:ऐ बगेयाडिञः।''


जिसका हिन्दी अर्थ है - ''मेरे पास सरकारी कोई भी योजना का लाभ नहीं मिला है। राशन कार्ड, विधवा पेंशन, स्वास्थ्य कार्ड, मनरेगा कार्ड, गैस, शौचालय नहीं है। केवल प्रधान मंत्री आवास है। 14 साल की बेटी बंगाल काम करने गई है। हम यहां मजदूरी करते हैं, लेकिन करोना के कारण वह भी नहीं मिलता है। पांच बच्चे हैं। पति की चार साल पहले मौत हो गई है।''

बता दें कि प्रधान मंत्री आवास उसके पति के जिंदा रहते बना था। बस वही एक सरकारी लाभ मिला है इस परिवार को। यहां तक कि आधार कार्ड भी केवल गुम्मी दिग्गी के नाम है, बाकी किसी भी बच्चों का आधार कार्ड नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर राशन कार्ड बनता भी है तो वह केवल गुम्मी दिग्गी का ही बनेगा, बच्चों का नाम राशन कार्ड में शामिल नहीं हो सकता है।

बताते चलें कि पश्चिम सिंहभूम जिला में 20 प्रखंड हैं। पूरे जिले में राशन कार्ड की स्थिति कुछ इस प्रकार है: एपीएल - 66,535, बीपीएल - 1,12,242, अन्तोदय - 18,335, अतिरिक्त बीपीएल - 5,593, यानी कुल कार्ड की संख्या - 2,02,704 है।

वहीं पूरे सोनुवा प्रखंड में राशन कार्ड की स्थिति कुछ इस प्रकार है: एपीएल- 1456, बीपीएल- 8426, अन्तोदय - 235, अतिरिक्त बीपीएल - 425, यानी कुल कार्ड की संख्या- 10,542 है।

वहीं पाड़ाहाट पंचायत में राशन कार्ड की स्थिति कुछ इस प्रकार है : एपीएल - 94, बीपीएल - 889, अन्तोदय- 9, अतिरिक्त बीपीएल - 23, यानी कुल कार्ड की संख्या- 1015 है।

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