पठानकोट : प्रोफेसर ने फंदा लगाकर की आत्महत्या, सुसाइड नोट में सामने आई ये वजह

विकास राणा की रिपोर्ट
जनज्वार। पठानकोट के एसडी कॉलेज के फिजिक्स प्रोफेसर ने शनिवार की रात घर में पंखे से फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। मृतक की पहचान 42 वर्षीय सुलिंदर कालिया निवासी म्युनिसिपल कालोनी के तौर पर हुई है।कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के कारण छह महीने से घरों में कैद लोगों में बढ़ी मानसिक उलझन और अकेलेपन के कारण खुदकुशी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रहे हैं।
सुसाइड करने से पहले सुलिन्द्र ने एकसुसाइड के जरिए अपनी पत्नी और बच्चों को लिखा कि अनु और बच्चों को छोड़कर जाने का दिल नहीं कर रहा है, पर मुझे पापा बुला रहे हैं, जाना होगा। सुसाइड नोट पर सुलिन्द्र ने अपने हस्ताक्षर भी किए हुए थे।
प्रो.कालिया ने सुसाइड नोट में लिखा है कि अनु और बच्चों को छोड़कर जाने का दिल नहीं कर रहा। पर मुझे पापा बुला रहे हैं। वो मुझे अपने पास बुला रहे हैं। मुझे जाना पड़ेगा। मेरे बाद उनका बुरा हाल होगा, पर मुझे जाना पड़ेगा। मम्मी और अनु के मम्मी, डैडी मुझे माफ करना, मेरे बाद अनु और बच्चों को संभाल लेना। भगवान के सहारे छोड़ कर जा रहा हूं, क्योंकि उस पर बड़ा यकीन है।
मामले पर सुलिन्द्र की पत्नी का कहना था कि देर रात को जो मैं उठी तो मेरे पति मुझे बेड पर नहीं दिखे जिसके बाद जब दूसरे कमरे में जाकर देखा तो वह पंखो से लटक रहे थे और उनकी मौत हो चुकी थी। जब मैनें चीख पुकार कर लोगों को बताया तो स्थानीय निवासियों द्वारा थाना डिवीजन 2 की पुलिस को जानकारी दी गई।
जिसके बाद पुलिस ने सुलिन्द्र की लाश को उतारा गया और जेब से सुसाइड नोट बरामद कर लिया गया। पुलिसा का कहना है कि संक्षिप्त सुसाइड नोट में डॉ सुलिन्द्र की हैंड राइटिंग में ही लिखा गया था और नीचे हस्ताक्षर भी किए थे। उन्होंने लिखा था कि वह यह कदम खुद उठा रहे हैं, इसके लिए किसी को कुछ भी न पूछा जाए।
42 वर्षीय डॉ. सुलिंद्र कालिया के पिता की 4 साल पहले मौत हुई थी जिसके बाद काफी ज्यादा डिप्रेशन लिया हुआ था। प्रोफेसर का पिता से काफी लगाव था। कुछ दिन पहले प्रोफेसर सुलिंद्र ने पिता का श्राद्ध भी किया था। जिसके बाद प्रोफेसर जिसमें अपने स्टूडेंट्स को ट्यूशन पढ़ाया करते थे, वही पर पंखे से चुनरी बांधकर लटके हुए थे।
घटना के बाद से ही प्रोफेसर के साथी शिक्षक सुलिन्द्र द्वारा उठाए गए इस कदम से हैरान है। उनका कहना था कि सुलिन्द्र एक मिलनसार और हंसमुख इंसान था। उसने ऐसा कदम क्यों उठाय समझ से परे है।उनका बेटा आठवीं में तथा बेटी सेंट जोसेफ कॉन्वेंट स्कूल में यूकेजी में पढ़ती है। पत्नी एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाने जाती थीं।
बता दे परिवार ने म्यूनिसिपल कॉलोनी में नई कोठी भी बनाई है और इसी साल फरवरी में गृह प्रवेश किया था। लॉकडाउन के बाद 6महीने से परिवार घर पर ही था। मामले की जांच कर रहे थाना डिवीजन नं.2 के एएसआई रामलाल ने बताया कि मृतक प्रोफेसर की जेब से सुसाइड नोट मिला है, जिसे पुलिस कब्जे में लेकर परिवार के बयान पर जांच कर रही है। सिविल अस्पताल से लाश का पोस्टमार्टम करवा दिया है।
2016 में हुए सबसे हालिया 'राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण' की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 करोड़ लोगों को चिकित्सकीय मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रूरत है जबकि यह सेवाएँ सिर्फ़ 3 करोड़ भारतीयों को मिल पा रही हैं।
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति उदासीन सामाजिक रवैए को दिखाने वाला दूसरा आँकड़ा यह बताता है कि दुनिया भर में आत्महत्या करने वाली सभी महिलाओं में से 36 प्रतिशत भारतीय महिलाएँ हैं। विश्वप्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका लैंसेट के अक्तूबर 2018 के 'लैंसेट पब्लिक हेल्थ' अंक में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक़ विश्व की कुल जनसंख्या में मात्र 18 फ़ीसदी हिस्सा रखने वालीं भारतीय महिलाएँ दुनिया में होने वाली कुल स्त्री आत्महत्याओं में 36 फ़ीसदी हिस्सा रखती हैं।
सुसाइड प्रिवेंशन इंडिया फ़ाउंडेशन (एसपीआईएफ़) ने हाल ही में 'कोविड19 ब्लूज़' नामक ऑनलाइन सर्वे के अनुसारकोरोना के बाद से देश में ख़ुद को चोट पहुँचाने (स्लेफ़ हार्म), अपनी मृत्यु की कामना करने और ख़ुद अपनी जान लेने की प्रवृत्ति कई गुना बढ़ी हुई पाई गई है।
2018 में पारित हुए 'मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017' के तहत भारत में आत्महत्या के अपराधीकरण का क़ानून ख़त्म करते हुए मानसिक बीमरियों से जूझ रहे लोगों को मुफ़्त मदद का प्रावधान किया गया है।
इस नए क़ानून के तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के मदद पहुँचाना, इलाज करवाना और पुनर्वास देना सरकार की ज़िम्मेदारी होगी।
भारत के साथ-साथ पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ से जूझ रहे लोगों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हालाँकि, इस मामले में अभी तक विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से कोई ठोस बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे शोध अवसाद और आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों पर कोरोना के संभावित असर को दर्ज करते हैं।











