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उत्तर प्रदेश

शामली में कथित लिंचिंग की उच्च स्तरीय जांच की उठने लगी मांग, घटना की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर पुलिस कार्रवाई की माले ने की कड़ी निंदा

Janjwar Desk
9 July 2024 1:22 PM GMT
शामली में कथित लिंचिंग की उच्च स्तरीय जांच की उठने लगी मांग, घटना की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर पुलिस कार्रवाई की माले ने की कड़ी निंदा
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File photo

UP पुलिस अपने दावे को थोपना चाहती है कि मौत मॉब लिंचिंग से नहीं, बल्कि हाथापाई या अन्य कारण से हुई, जबकि परिजनों के अनुसार घटना के बमुश्किल दो घंटे के अंदर मौत हुई। ऐसे में इसकी उच्चस्तरीय जांच से ही सच्चाई सामने आयेगी...

लखनऊ। इस महीने चार जुलाई की रात को जलालाबाद के मोहल्ला अमानत अली निवासी फिरोज को कथित रूप से कस्बे के मोहल्ला आर्यनगर में घर में घुसने पर पकड़ने की खबर फैली थी, कहा गया कि उसी दौरान भीड़ ने फिरोज को पुलिस को सौंप दिया। फिरोज के साथ मारपीट की गई, जिसके बाद देर रात में उसकी अपने घर पर मौत हो गई थी।

इस मामले में भाकपा (माले) ने शामली के थाना भवन थाना क्षेत्र में कथित मॉब लिंचिंग से फिरोज की मौत मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। पार्टी ने घटना की सोशल मीडिया पर रिपोर्टिंग करने वाले दो मुस्लिम पत्रकारों जाकिर अली त्यागी व वसीम अकरम त्यागी समेत तीन पत्रकारों के खिलाफ नए आपराधिक कानून की धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की कड़ी निंदा की है।

भाकपा (माले) के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने आज 9 जुलाई को जारी बयान में कहा कि लोकसभा चुनाव बाद प्रदेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा अपराध की घटनाएं बढ़ गई हैं। शामली की घटना से पहले अलीगढ़ में 18 जून को फरीद उर्फ औरंगजेब की मॉब लिंचिंग में मौत और 30 जून को बुलंदशहर में दो भाइयों तंजीम व फैजान पर भीड़ हिंसा हुई थी। नफरती राजनीति, आरोपियों के प्रति संरक्षणकारी भूमिका और प्रशासन द्वारा कड़ी कार्रवाई न किये जाने से इस तरह की घटनाओं को शह मिल रही है।

​कथित मॉल लिंचिंग मामले में मृतक फिरोज कुरैशी की यह तस्वीर हो रही सोशल मीडिया पर वायरल

माले नेता ने कहा कि शामली में फिरोज की 4 जुलाई को मॉब लिंचिंग से मौत के दावे पर पत्रकारों के खिलाफ पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज किया जाना पत्रकारिता और प्रेस की आजादी पर हमला है। ये मुकदमे जिनमें तीन पत्रकारों सहित अल्पसंख्यक समुदाय के तीन व्यक्तियों को नामजद किया गया है, रद्द किए जाने चाहिए। पुलिस अपने दावे को थोपना चाहती है कि मौत मॉब लिंचिंग से नहीं, बल्कि हाथापाई या अन्य कारण से हुई, जबकि परिजनों के अनुसार घटना के बमुश्किल दो घंटे के अंदर मौत हुई। ऐसे में इसकी उच्चस्तरीय जांच से ही सच्चाई सामने आयेगी। असल हमलावरों को सख्त सजा और पीड़ित परिवार को न्याय मिले। घृणा अपराध की घटनाओं पर कड़ाई से रोक लगाई जाए।

फिरोज कुरैशी की मौत के मामले में पुलिस का कहना है कि 4 जुलाई की घटना में कोई मॉब लिंचिंग नहीं हुई है, फिरोज कुरैशी नाम के एक शख्स की उसके घर पर मौत हुयी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी मौत की वजह साफ है कि किसी हमले की वजह से कुरैशी की मौत नहीं हुई। वहीं दूसरी तरफ फिरोज कुरैशी के घरवाले आरोप लगा रहे हैं कि फिरोज को तीन लोगों ने पीटा था। इन तीनों आरोपियों के नाम पिंकी, पंकज और राजेंद्र हैं। इस मामले में 5 जुलाई को FIR भी दर्ज कराई गई थी, मगर पुलिस का कहना है कि अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।

अब इस मामले में पुलिस ने बिहार के एक यूट्यूब चैनल हिंदुस्तानी मीडिया, जिसे सदफ कामरान चलाते हैं, के खिलाफ भी मुकदमा जरूर दर्ज कर लिया है। पुलिस का कहना है कि जब मॉब लिंचिंग की बात को नकारा जा चुका है उसके बाद भी हिंदुस्तानी मीहिया चैनल गलत जानकारी दे रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यूट्यूब चैनल के खिलाफ 7 जुलाई को थाना भवन पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई है। एफआईआर में लिखा गया है, "इस मामले में धार्मिक विद्वेष पैदा करने के उद्देश्य से हिंदुस्तानी मीडिया चैनल नाम के मीडिया आउटलेट के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर गलत तथ्यों के साथ एक वीडियो अपलोड किया गया। इस वीडियो में आरोप लगाए गए कि जिले में एक मुस्लिम शख्स की मॉब लिंचिंग हुई है। इस बात की पूरी आशंका है कि इस वीडियो के चलते शांति व्यवस्था और सांप्रदायिक तानाबाना बिगड़ सकते हैं।"

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