ग्राउंड रिपोर्ट

Ground Report: PM मोदी के बनारस में दर्जनभर बच्चे कुपोषण के शिकार, सो रही नौकरशाही के उड़े होश

Janjwar Desk
16 May 2022 10:51 AM GMT
Ground Report: PM मोदी के बनारस में दर्जनभर बच्चे कुपोषण के शिकार, सो रही नौकरशाही के उड़े होश
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Ground Report: PM मोदी के बनारस में दर्जनभर बच्चे कुपोषण के शिकार, सो रही नौकरशाही के उड़े होश

Ground Report : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनारस में दर्जनभर से ज्यादा बच्चों के कुपोषण के जद में आने से स्वास्थ्य महकमे खलबली मची हुई है। यह स्थिति तब है जब डबल इंजन की सरकार दहाड़ती रही है कि उसके पास जनता का पेट भरने के लिए अनाज की कमी नहीं है।

उपेंद्र प्रताप की रिपोर्ट

Ground Report : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनारस में दर्जनभर से ज्यादा बच्चों के कुपोषण के जद में आने से स्वास्थ्य महकमे खलबली मची हुई है। यह स्थिति तब है जब डबल इंजन की सरकार दहाड़ती रही है कि उसके पास जनता का पेट भरने के लिए अनाज की कमी नहीं है। हैरत की बात यह है कि जिन महिलाओं के बच्चे कुपोषण के शिकार हुए हैं। उन्हें न तो आंगनबाड़ी योजनाओं का लाभ मिला रहा था और न पुख्ता इलाज। अगर इन्हें इलाज और बाल विकास योजनाओं का लाभ मिल रहा था तो बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर ये कुपोषण की जद में आए क्यों ? इधर, कुपोषण जैसे गंभीर विषय को विभाग द्वारा हल्के में लिए जाने डीएम कौशल राज शर्मा ने अधिकारियों की बैठक कर जमकर लताड़ लगाई है और अब सूटेड-बूटेड अधिकारियों की ताबड़तोड़ बैठकों का दौर भी शुरू हो गया है।

जिला अस्पताल के कुपोषण पुर्नवास केंद्र में अपने कुपोषित बच्चे को लेकर भर्ती आशिया के हुकुलगंज निवासी पति मुश्ताक बताते हैं कि " राबिया (05 साल), आलिया (04 ), आफरीन (07) और जैनब (3 साल) हमारे चार बच्चें हैं। आफरीन को छोड़ दें तो पात्र तीन अन्य बच्चों को कभी भी मानक के अनुरूप पोषण सामग्री नहीं मिला है। कभी मिलता है तो वह भी आधा-अधूरा। मैं मजदूरी करता हूं, महंगाई इतनी बढ़ गई है कि मजदूरी की कमाई से परिवार का पेट भरना मुश्किल हो रहा है।

आंगनबाड़ी केंद्र से उम्मीद रहती है कि सरकार हम जैसे गरीब लोगों के बच्चों को पोषण वाला राशन मिलता रहे, इसके लिए पोषक आहार बाटंती है, लेकिन इसकी हकीकत ये हैं कि आंगनबाड़ी केंद्र द्वारा चेहरा देखकर पोषण सामग्री दी जाती है। कई बार शिकायत करने के बाद भी एक बच्चे का नाम दर्ज किया जा सका है। जब पोषक पैकेट बांटे जाते हैं तब मेरे बच्चे को यह कहते हुए पैकेट नहीं दिए जाते कि आपके बच्चों का नाम सूची में दर्ज नहीं है। मैं थककर शिकायत करना छोड़ चुका है। अब लगता है सिस्टम में ईमानदारी नाम की कोई चीज बची नहीं है।"

वाराणसी स्मार्ट सिटी की बदनसीबी कहिये या इसके चमक-धमक पर काला धब्बा। बनारस मॉडल का प्रचार देश भर में करने वाली और आगामी लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारी में जुटे सियासी पार्टी के लिए ये आंकड़े मुंह की खाने पर विवश कर दिए हैं। उसने अमावसी दुःस्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उसके बनारस मॉडल इतना बुरा हश्र होगा। नौनिहाल, जिन्हें देश का भविष्य कहा जाता है। पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में नौनिहालों को एक के बाद एक कुपोषण अपना शिकार बना रहा है।

कुपोषित बच्चों के आंकड़ें चौंकाने वाले हैं तो दूसरी और विभागीय लापरवाही की कलाई भी खोल रहे हैं। रविवार यानी 15 मई 2022 तक कुल 12 कुपोषित मासूम पांडेयपुर स्थित दीनदयाल जिला अस्पताल के कुपोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती हैं, इनका इलाज चल रहा है। जिले में बढ़ते कुपोषण के ग्राफ का आलम है कि इधर बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग और स्वास्थ्य महकमे ने दूसरी लिस्ट भी तैयार कर रखी है।

वाराणसी के दीन दयाल उपाध्याय जिला चिकित्सालय स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में कुल दस बेड हैं। यहां पर कुपोषित बच्चों को भर्ती कर स्वस्थ एवं सुपोषित किया जाता है। बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) डीके सिंह ने "जनज्वार" से बताया कि 'वर्तमान में एनआरसी में कुल 12 बच्चे भर्ती हैं। इसमें से दो बच्चों के लिए दो अतिरिक्त बेड बढ़ाकर उन्हें भर्ती किया गया है। सभी का इलाज चल रहा है। बाल विकास परियोजना अधिकारी जिले में युद्धस्तर से जिले में अभियान चलाकर कुपोषित बच्चों को खोजने और इनकी सूची बनाने जुटे हुए हैं। अभी भर्ती हुए 12 कुपोषित बच्चों को इलाज के बाद सुपोषित होने पर घर जाने लौटने पर तैयार दूसरी सूची के कुपोषित बच्चों को एनआरसी में भर्ती कर ट्रीटमेंट दिया जाएगा।'

यह सवाल पूछे जाने पर कि आपके विभाग द्वारा तैयार की गई कुपोषित बच्चों की कितनी सूची है ? तो मायूश अंदाज में रुककर जवाब को टालते हुए कहते हैं कि "अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। विभागीय स्तर से जनपद में आंगनबाड़ी की मदद से कुपोषित बच्चों को चिन्हित किया जा रहा है. जो भी बच्चे कुपोषित मिलेंगे, उन्हें उचित इलाज दिया जाएगा। "

वाराणसी स्थित जिला अस्पताल के कुपोषण पुर्नवास केंद्र में भर्ती कुपोषित बच्चों के साथ उनकी माताएं।

एनआरसी के रियल्टी चेक में नदारत मिले डॉक्टर और नर्स

बात दीगर है कि कुपोषण के मामले को उजागर होते ही 'जनज्वार' की टीम तत्काल दोपहर तीन बजे जिला अस्पताल में रियल्टी चेक करने एनआरसी वार्ड में भर्ती कुपोषित बच्चों की स्थित जानने पहुंचती है तो नर्स चेयर से नर्स मनीषा किसी काम से बाजार गई थीं और आसपास तक के वार्ड और केबिनों में डॉक्टर-नर्स नहीं मिली। अपने पोते को लेकर भर्ती तीमारदार हुकुलगंज की प्रेमा देवी कहती हैं कि नर्स मैडम लगभग ढाई बजे से कहीं गई हैं, यह कुर्सी कई घंटे से खाली है। डॉक्टर साहब आए थे मासूम को देखकर जा चुके हैं। यह पूछे जाने पर कि अभी कोई एमरजेंसी होगी तो कौन बच्चों का इलाज करेगा ? तो प्रेमा देवी की आंखें छलक जाती हैं और गला रुंध जाने वह कोई जवाब नहीं दे सकीं। यह सवाल सुन, अपने बीमार बच्चों को लेकर भर्ती कई महिलाओं के चहरे पर मायूशी तैर गई। कुपोषण वार्ड में चार दिन से बेटे को लेकर भर्ती प्रेमा देवी कि बेटी कहती हैं कि 'सर पहले से स्थिति बिगड़ गई है। परिवार में सबका खानपान बिगड़ रहा है। महंगाई हर ताने-बाने को बिखरने पर तुली हुई है। बच्चें तो थोड़ा लापरवाह होते हैं, उस स्तर का खानपान नहीं मिल रहा है। इससे बच्चों की यह हालत हुई है। सरकार, रोजगार क्यों नहीं दे रही है ? महंगाई को रोकती क्यों नहीं ? हमलोग बहुत परेशान हैं'?

जिला अस्पताल में भर्ती कई बच्चे कुपोषण के क्रिटिकल स्टेज में हैं तो कुछ में कुपोषण के सामान्य लक्षण हैं। एनआरसी प्रभारी डॉ सौरभ बताते हैं कि "सामान्य लक्षण के कुपोषित बच्चों का इलाज करने के बाद ये आम बच्चों की तरह हो जाएंगे।" बहरहाल, स्मार्ट सिटी वाराणसी में कुपोषण के आंकड़ों के उजागर होने से स्वास्थ्य महकमे खलबली मची हुई है। इधर, कुपोषण जैसे गंभीर विषय को संबधित विभाग द्वारा हलके में लिए जाने डीएम कौशल राज शर्मा ने अधिकारियों की बैठककर जमकर लताड़ लगाई है और अब सूटेड-बूटेड अधिकारियों की ताबड़तोड़ बैठकों का दौर शुरू हो गया है। देखना दिलचस्प होगा कि कुपोषण को जड़ से उखड़ फेंकने के स्लोगन लेकर चलने वाली राज्य और केंद्र के स्वास्थ्य अमले के कारिंदे फाइलों में लीपापोती कर सब कुछ 'मैनेज' करते हैं या ईमानदारी से कुपोषण उन्मूलन के लिए जमीन पर काम भी करते हैं ?

हुकुलगंज बनारस के माथे पर कलंक ?

वरुणा नदी, हुकुलगंज को काटकर उत्तर दिशा में और पूर्वी सीमा विस्तार को खड़े करारों से सील कर देती है। पश्चिम में हुकुलगंज-पांडेयपुर रोड और उत्तर में पांडेयपुर-पहाड़िया रोड की पुलिस चौकी को सुरक्षा की जिम्मेदारी है। मतलब यह कि हुकुलगंज पुराना और घनी आबादी वाला इलाका है। बहुत तंग और उबड़-खाबड़ गालियां है। अधिकांश गलियों में कूड़े-कचरे के ढेर लगे हुए हैं। चारों तरफ से घिरे इस इलाके में सांस लेने में फेफड़े हो छटपटाहट महसूस हो रही थी। जिला अस्पताल के एनआरसी वार्ड में भर्ती कुल 12 कुपोषित बच्चों में से 05 बच्चे जिला अस्पताल से महज 02 किमी पड़ोस में स्थित हुकुलगंज इलाके के हैं और दो को क्रिटिकल कुपोषण है।

हुकुलगंज में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र, जो किराए के माकन में चलता है। यह आंगनबाड़ी केंद्र मानक के अनुरूप नहीं है।

हुकुलगंज से तीमारदार आशिया, कविता, सुमन, दुर्गा देवी और प्रेमा देवी अपने बच्चे को इलाज के लिए जिला अस्पताल पहुंची हैं। शेष शिवपुर से संध्या, गिलट बाजार से आरती और हरहुआ से प्रीति पटेल समेत अन्य भी अपने बीमार बच्चों की देखभाल करती बेड पर मिलीं। बेड पर लेटे बच्चे को अपने गोद में लेते हुए हुकुलगंज की आशिया कहती हैं कि "उनके बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र से मानक के अनुरूप पोषण आहार-राशन नहीं मिलता है। इसकी शिकायत करके हमलोग हार चुके हैं। आंगनबाड़ी सहायिका और आशा आती हैं और जाने क्या लिखा-पढ़ी कर ले जाती हैं ? कभी भी हमारे बच्चों को पूरा राशन नहीं मिला है। जबकि, इसकी शिकायत कई बार मेरे पति (मुस्ताक) ने आंगनबाड़ी सहायिका से की है। कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है? आज मेरे बेटे की ये हालत हो गई और भीषण गर्मी में अपने बच्चे को लेकर अस्पातल में भर्ती हूं।" प्रीति, सुमन और संध्या की भी कमोवेश यही समस्या है।

आधे-अधूरी मिल पा रही सुविधाएं

वाराणसी मंडल में विगत चार सालों में स्वास्थ्य सुधार पर काम करने वाले यूनिसेफ के अफसर अंजनी बताते है कि "शहरी इलाके में 990 आँगनबाडी सेंटर संचालित हैं। आंगनबाड़ी और आशा कार्यकत्री नौनिहालों को पोषक आदि की मॉनिटरिंग करती रहती है। कुपोषण के लक्षण मिलने पर अभिभावकों को कुपोषण पुर्नवास केंद्र लाकर इलाज के लिए कहा जाता है। देखा गया है कि कई मामलों में जागरूकता के अभाव माता-पिता अपने बच्चों का समुचित इलाज में लापरवाही बरतते हैं। फिर भी हमलोग जुटे हुए हैं और जनपद वाराणसी समेत चंदौली, गाजीपुर व जौनपुर में युद्धस्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। यह अच्छी बात है कि समय पर इलाज के अभिक से अधिक कुपोषित बच्चों को इलाज अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है। वैसे भी अभी स्लम और पिछड़े इलाके में रहने वाले आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों में कुपोषण के बारे अधिक जागरूकता नहीं है।" बहरहाल, सरकार, केंद्रीय स्वास्थ्य, महिला और बाल विकास विभाग समेत आधा कार्य दर्जन से अधिक महकमा देख को कुपोषण मुक्त करने में जुटा हुआ है। इन कार्यों पर सरकार करोड़ों-अरबों रूपए पानी की तरह बहाती है, लेकिन इनके प्रयासों की जमीनी हकीकत सबके सामने है। वाराणसी में बढ़ते कुपोषण के आंकड़े सभी को डरा रहे हैं।

जिला अस्पताल के एनआरसी वार्ड में अपने कुपोषित बच्चे को गोद में ली हुई हुकुलगंज निवासी आशिया।

सूचना के बाद भी विभाग उदासीन

वाराणसी के हुकुलगंज इलाके के आंगनबाड़ी सेंटर की सहायिका शर्मीला ने बताया कि "मेरे आंगनबाड़ी सेंटर में कुल 65 बच्चे पंजीकृत हैं। इनके राज्य और केंद्र सरकार द्वारा मिलने वाला पोषण आहार सिर्फ 35 बच्चों के लिए आता है। कभी-कभार इसमें से पोषण आहार के पैकेट और मात्रा कम मिलती है। लिहाजा, बच्चों को तो खाली हाथ लौटाया नहीं जा सकता है। इसलिए कम-ज्यादा कर सभी को को कुछ न कुछ मात्र में पोषण आहार देने की कोशिश की जाती है। कई बार तो कम पोषण आहार मिलने से नाराज अभिभावक केंद्र पर आकर विवाद करते हैं। काम राशन और बच्चों की संख्या में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया गया है। फिर भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। सुधार और मानक के अनुरूप पोषण आहार के नहीं मिलने से हमलोगों को भी वितरण में बहुत परेशानी होती है। "

आंगनबाड़ी केंद्र पर बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं को टोटा

वाराणसी के हुकुलगंज में चलने वाले कई आंगनबाड़ी केंद्र किराए के भवन में चलते हैं। इन्हें अपना भवन और पर्याप्य मात्रा में बच्चों के खेलने-कूदने और ग्राउंड नहीं है। ग्राउंड है भी एकदम निर्जन है और दहकते आसमान के नीचे बना हुआ है। स्थानीय लालजी महंथ ने अपने घर के आधे हिस्से और घर के सामने के परती भू भाग को किराए पर आंगनबाड़ी सेंटर चलाने के लिए दिया हुआ है। इस आंगनबाड़ी केंद्र पर इनके ही परिवार की शर्मिला आंगनबाड़ी सहायिका के रूप में तैनात हैं। यहां कुल 65 बच्चें पंजीकृत हैं। इनके खेलने, शौच और अन्य अभ्यास के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई है। इससे बच्चों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहां की दीवारों पर आंगनबाड़ी का पता नाम, डाइट, अधिकारियों के मोबाइल नंबर, बच्चों के अधिकार और अन्य आवश्यक सूचनाओं की नहीं लिखवाया गया है। अव्यवस्थित तरीके और लापरवाही में आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन कई सवालों को जन्म देते हैं।

पीड़ित महिलाओं को सता रही बालकों के भविष्य की चिंता

शिवपुर के कोलवा से अपने कुपोषित बच्चे को लेकर भर्ती स्नेहा कहती हैं कि "राशन और आंगनबाड़ी से मिलने वाले राशन कभी भी पूरी मात्र में नहीं मिला है। घर में जो है उसे बच्चे को खिलते-पिलाते हैं। अभी गर्मी और उमस बढ़ी है। ऐसे में पहले से ही कमजोर बच्चा बीमार हो गया है। हरहुआ की प्रीति पटेल को भी पोषण पदार्थ तय समय और मानक के अनुरूप पूरा पोषक पदार्थ नहीं मिलता है। जैसे-तैसे परिवार का भरण-पोषण हो रहा है।" मसलन, ये केसेज जनपद में चलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकत को बयान करती हैं. इधर, एनआरसी वार्ड में भर्ती कुपोषित बच्चों की सेहत और स्वास्थ्य भविष्य को लेकर सभी महिलाएं के माथे पर चिंता लकीरें उभरी हुई हैं।

12 कुपोषित बच्चों डिस्चार्ज होते ही दूसरी सूची के बच्चें होंगे भर्ती

बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) डीके सिंह ने बताया कि बाल विकास परियोजना अधिकारियों (सीडीपीओ) द्वारा किए गए प्रयास से बच्चों को एनआरसी तक लाया जा रहा है. इसके साथ ही अति कुपोषित बच्चों के अभिभावकों को एनआरसी में भर्ती करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इन बच्चों को 14 दिन तक चिकित्सक एवं समस्त स्टाफ की देखरेख में पूरी देखभाल की जाएगी। पूरी तरह से स्वस्थ होने के बाद उन्हें एनआरसी से डिस्चार्ज किया जाएगा। इन सभी बच्चों के डिस्चार्ज होने बाद कुपोषित बच्चों की दूसरी सूची भर्ती कराने के लिए तैयार है ।" गौरतलब है कि पिछले माह यानी अप्रैल में 20 बच्चों के सापेक्ष केवल 14 बच्चे भर्ती हुए थे. इस लापरवाही को देखते हुए जिलाधिकारी कौशल शर्मा ने नाराजगी व्यक्त जिम्मेदार अधिकारीयों को फटकार भी लगाईं थी।

दावा बच्चों को सुपोषित करने का

जिला अस्पताल के एनआरसी प्रभारी डॉ सौरभ सिंह ने "जनज्वार" को बताते हैं कि पोषण पुनर्वास केंद्र एक ऐसी सुविधा है, जहां 06 माह से 05 वर्ष तक के गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे, जिनमें चिकित्सकीय जटिलताएं होती हैं। इनको चिकित्सकीय सुविधाएं मुफ्त में प्रदान की जाती हैं। इसके अलावा बच्चों की माताओं को बच्चों के समग्र विकास के लिए आवश्यक देखभाल तथा खान-पान संबंधित कौशल का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस केंद्र में छह माह से पांच साल तक के कुपोषित बच्चों का इलाज किया जाता है । यहां शुरुआती दौर में 14 दिन रखकर बच्चों का इलाज व पोषक तत्वों से युक्त आहार दिया जाता है। यह भोजन शुरुआती दौर में बच्चे को दो-दो घंटे बाद दिया जाता है। यह प्रक्रिया रात में भी चलती है। इसके अलावा बच्चे के साथ आने वाली बच्चे की मां या अन्य परिजन को भोजन के अलावा पचास रुपये रोजाना भत्ता भी दिया जाता है। इस दौरान 100 फीसदी बच्चे इस वार्ड से स्वस्थ होकर निकले हैं। इसके अलावा इलाज कराकर गए बच्चों का पुन: जांच के लिए लेकर आने पर भी उनको भत्ता दिया जाता है। यदि वह 15 दिन में इलाज का फॉलो अप कराने आते हैं तो उन्हें 140 रुपये मिलते हैं. यह भत्ता उन्हें दो महीने तक मिलता है।"

आंकड़ों से खेल रही सरकार

जनपद में बढ़ते कुपोषित बच्चों के सवाल पर राजीव कुमार सिंह कहते हैं कि 'सरकार, ज्वलंत मुद्दों जैसे गरीबी, भुखमरी, महंगाई, कुपोषण, सुरक्षित प्रसव, रोजगार समेत कई विषयों पर काम करने वाले संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने में अड़ंगा लगा रही है। वह अपने मन माफिक आंकड़े चाहती है और नहीं चाहती कि ज्वलंत मुद्दों के आंकड़े उजागर हों और इनपर बितण्डा और सियासी तूफ़ान उठे. एक अच्छी सरकार और जनप्रतिनिध का काम होता है वह अपने सामने मिलने वाली समस्याओं को चुनौती के रूप में ले और ईमानदारी से काम करें। बेशक सबमें खूबी और खामियां होती हैं। सरकार और स्वास्थ्य महकमे को बड़ी गंभीरता से कुपोषण के मुद्दे पर काम करना चाहिए। वैसे भी शरर में बेलगाम अपराध, कूड़ा समस्या, बिजली की कटौती, सीवर का लगातार गंगा में मिलना, सड़कों की बदहाली और रेंगती यातायात व्यवस्था से नागरिकों को कड़ी नाराजगी है। विकास के नाम पर रोड के डिवाइडर में खड़े पोल पर रंगीन झालर लपेट भर देने से स्मार्ट सिटी का खिताब बनारस की नहीं दिया जा सकता है। हकीकत, सरकारी आंकड़ों से जुदा और हिला कर रख देने वाले हैं।'

धन उगाही होने वालों पर हो कार्रवाई

मानवाधिकारी जन निगरानी समिति के लेलिन रघुवंशी बताते हैं कि 'शहरी या ग्रामीण इलाके में कुपोषण के लिए सीधे तौर पर आंगनबाड़ी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य महमका जिम्मेदार है। यदि सही और सुव्यवस्थित रूप से तीनों विभाग काम करें तो चार से छह महीनों में ही कुपोषण को कंट्रोल किया जा सकता है। साथ धन उगाही के नियत से गरीबी, कुपोषण और बीमारी पर काम करने वाले फर्जी स्वयं सेवी संस्थाओं पर कार्रवाई भी की जानी चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली लापरवाही बरत रही है। जिनके माकन हैं, इन अपात्रों को कार्ड बनाएं गए हैं। इसकी जांच कराकर पात्रों को लाभ दिया जाए।

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