उत्तर प्रदेश

सरजू नदी के तटवर्ती इलाकों के हजारों किसान-पशुपालक बाढ़ और सरकारी उपेक्षा से हलकान

Janjwar Desk
16 Aug 2020 9:25 AM GMT
सरजू नदी के तटवर्ती इलाकों के हजारों किसान-पशुपालक बाढ़ और सरकारी उपेक्षा से हलकान
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पीड़ित किसान बेलास कहते हैं कि 'किसानों का कोई हितैषी नहीं है, सरकार की तरफ से कहीं कोई सहायता नहीं मिली, यहां तक कि कोई अधिकारी या नेता हम लोगों का हालचाल तक पूछने भी नही आया...'

सरयू नदी के बाढ़ग्रस्त इलाके से लौटकर प्रसेनजीत सिंह की रिपोर्ट

देवरिया। जिला मुख्यालय से लगभग 60 किमी दूर सलेमपुर क्षेत्र के भागलपुर से लेकर पिंडी, चुरिया एवं मेहरौना इत्यादि तक सरयू नदी के किनारे रहने वाले लोग जहाँ सामान्य दिनों में सरयू मां के सहारे अपने बाल बच्चों के रोजी रोटी की व्यवस्था करते हैं वहीं दूसरी तरफ सरयू के उफान से इन पर रोजी-रोटी और जीवन यापन पर संकट आ जाता है।

आजकल सरयू नदी का जलस्तर बढ़ने से इस क्षेत्र के पशुपालक और किसान दोनों हलकान हैं क्योंकि एक ओर जहां बाढ़ के कारण धान की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी है, वहीं दूसरी तरफ पशुओं के हरे चारे से लेकर भूसा इत्यादि की समस्या इतनी उत्पन्न हो गयी है कि इनके दुग्ध व्यवसाय पर भी संकट खड़ा हो गया है और रोजी रोटी की भीषण समस्या हो गयी है। इनकी संख्या लगभग 40 से 50 हजार है लेकिन यह स्थिति लगभग देश में बसे हुए सभी किसानों और पशुपालकों की है जो करोड़ो लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जनज्वार के संवाददाता ने जब इस दियारा क्षेत्र में जाकर सबकी समस्याएं सुनी तो सबका दुःख दर्द लगभग एक सा ही लगा। यह बलिया और देवरिया का दोआबा क्षेत्र होने के कारण बहुत ही विषम परिस्थितियों वाला क्षेत्र है जहां सरयू तट पर बने बंधे के दक्षिणी छोर पर सामान्य दिनों में एक डेढ़ किमी पैदल जाने के बाद केवल नाव द्वारा ही पहुंचा जा सकता है।

बाढ़ के समय इस क्षेत्र में पहुंचना नामुमकिन है क्योंकि नाव पलटने से कई बार बहुत से लोगों की मौत के बाद सरकार ने मुआवजा देकर नाव संचालन पर सख्त रोक लगा दी लेकिन मुवावजा भर से ही किसी व्यक्ति की जान की कीमत को नहीं तौला जा सकता है। अतः ये पशुपालक डर के मारे अपने पशुओं को किसी तरह रातों-रात नदी पार कराके सुरक्षित स्थान पर आ गए।

यहां पहुंचने के बाद जो दृश्य दिखा वह शाइनिंग इंडिया की पोल खोलता नजर आ रहा है क्योंकि बाढ़ के समय यहां के अधिकांश लोग ख़ानाबदोशों की तरह जीवन-यापन कर रहे है। जब मैं यहां पहुंचा तो लोगों की आंखों में एक चमक सी आ गयी कि सरकार का शायद कोई अधिकारी या कर्मचारी होगा और हमें मुवावजा मिलेगा, पर जैसे ही मैंने उन लोगों को बताया कि मैं एक पत्रकार हूं और आप लोग की समस्याएं सुनने आया हूं तो वे लोग फिर से मायूस हो गए। हालांकि उन्होंने मुझे बैठने के लिए एक प्लास्टिक की कुर्सी दी और चाय पानी के बारे में पूछा तो मैं मना कर दिया।

उनमें सबसे वयोवृद्ध किसान रामसुभग ने बताया, 'अब तो साहब हम लोगों की आदत सी हो गयी है। हर साल सरयू मईया कुछ न कुछ धान, तिलहन, दलहन इत्यादि की फसल लेकर चली ही जाती थी परंतु इस साल तो हम पर मानिए कि वज्रपात ही हो गया क्योंकि फसल के साथ साथ चारा भी सड़ गया और कोरोना एवम लॉकडाउन की वजह से तीन तीन बेटवा सब बेरोजगार हो गये। एक बेटा बाहर से आकर के अंडा बेचता है जिससे कुछ मिल जाता है और साथ ही सरकार द्वारा पेंशन मिलने से गृहस्थी खींचखांच कर चल रही है लेकिन यह केवल ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। इससे क्या होने वाला है साहब।'


इसी गांव के अन्य किसान बेलास कहते हैं, 'किसानों का कोई हितैषी नहीं है। हमारी मड़ई की दीवार तक ढह गई, उसमें रखा हुआ सारा भूंसा सड़ गया है लेकिन सरकार के तरफ से कहीं कोई सहायता नहीं मिली, यहां तक कि कोई अधिकारी या नेता हम लोगों का हालचाल तक पूछने भी नही आया। सब सरकारें एक जैसे ही हैं। चुनाव जीतने के बाद सबके सुर बदल जाते हैं। हम नाले के पास बसे है जिसे ग्राम प्रधान के शह पर गांव के कुछ दंबग लोगों ने नाले को पाटकर खेत बना लिया है जिससे बाढ़ एवं बरसात का पानी खेतों में जमा होने के साथ-साथ मड़ई में भी पानी घुस जा रहा है। गरीब का बाबू कोई सुनने वाला नहीं है। क्या करें बाबू? अब तो बस ऊपर वाले का ही भरोसा है।'

इस क्षेत्र में कुछ आगे बढ़ने पर एक शरीर से ह्ष्ट-पुष्ट और वाणी से दबंग पशुपालक कमलेश यादव से मुलाकात हुई। जैसे ही बातचीत शुरू हुई तो उन्होंने खैनी की पेशकश की जिसे मैं आदतन मना कर दिया और उनकी स्थिति के बारे में पूछा तो वो सरकार के ऊपर पिल पड़े। कहे- 'देखिए साहब यह अब तक की सबसे नकारा सरकार है जो केवल पूंजीपतियों को ही संरक्षण दे रही है और इसमें लूट-खसोट तो पहले की सरकारों से भी अधिक है। अभी कुछ दिन पहले हमारे चाचा के लड़के को एक ठेकेदार नोएडा लेकर गया और वहां मंदी एवं महामारी का हवाला देकर शोषण करने लगा। हमारा क्या है हम तो कहीं भी खटकर (मेहनतकर) खा सकते है लेकिन इस कोरोना और बाढ़ ने सब चौपट कर दिया है। तीन खोप भूसा सड़ गया है। करीब 35 हजार का नुक़सान हुआ।'

'शहर में जाकर घर घर दूध बेचते थे लेकिन कोरोना के डर से अब आधे लोग लेते ही नहीं है तो क्या करें भाई दुकान पर औने पौने भाव किसी तरह बेचकर चले आते हैं। क्या करें पूंजी जो निकालनी है। इस सरकार में ना कोई अधिकारियों को डर है और ना कर्मचारियों को। कोई जांच करने भी नहीं आता है। हमारी सरकार रहती तो हम कंप्लेन भी करते ऊपर तक।' सरकार का नाम पूछने पर मना कर दिए। कुल मिलाकर एक मस्तमौला टाइप आदमी लगे और मैं राम राम करके आगे बढ़ गया क्योंकि कुछ दूरी पर हाथ के इशारे से कोई मुझे बुला रहा था। पूछने पर पता चला कि ये यहां के वार्ड मेंबर (सभासद) हैं।

यहां जाना भी हमारे लिए बड़ा मुश्किल था और वार्ड मेंबर महोदय हमें बार बार रास्ते की बदहाली का वीडियो बनाने के लिए इशारा कर रहे थे जो बाढ़ के पानी के कारण हरी काई और जलजमाव के कारण पैदल चलने लायक भी नहीं रह गई थी। मैं किसी तरह उनके पास गया और जैसे ही बात चित प्रारंभ किया तो वे बोले 'जब भाई साहब हमारे दरवाजे पर ही आने के लिए रास्ता नहीं है तो आप दूसरे लोगो के लिए खुद ही अनुमान लगा सकते हैं। यहां तो सब अंधेरे राज है। कोई किसी की सुनता ही नहीं है। मैं चार वार्ड से मेंबर हूं और रास्ते तथा शौचालय के लिए ग्रामप्रधान से कहते-कहते थक गया तो हम कुछ पीड़ित सदस्यों ने मिलकर डीपीआरओ को अपना इस्तीफा सौंप दिया।'

ये मामला मुझे बहुत ही झकझोरने वाला लगा इसलिए मैंने बात को बीच में ही काटकर पूछा इस्तीफा डीपीआरओ को क्यों बीडीओ को क्यों नहीं तो उन्होंने फिर बताना शुरू किया, 'भाई साहब ये सब चोर के चोर मौसेरे भाई है। बीडीओ ने ब्लाक पर इस्तीफा लेने से मना कर दिया और कहा कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर का मामला है। फिर हमलोग 8 सदस्य पचास किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय पर इस्तीफा सौंपने गये। इस्तीफा तो ले लिया गया लेकिन हमसे कहा गया कि सभी लोग 40-40 रूपये के स्टांप पेपर पर हलफनामा दाखिल कर इस्तीफा दे। क्या करें भाईसाहब मरता क्या ना करता, हम लोग नोटरी बयान हलफी बनवाकर इस्तीफा आज 15 दिन पहले सौंपे किंतु उस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई'।

'एक और सदस्य हमारे साथ आ गया जिसको शौचालय देने में ग्रामप्रधान ने दो हजार रुपए काट लिया और उसका शौचालय आजतक निर्माणाधीन हैं। हम 13 में से 9 सदस्य इस्तीफा दे चुके हैं लेकिन ग्रामप्रधान की की शासन प्रशासन एवं नेताओं में गहरी पैठ के कारण कोई उसका बाल बांका तक नहीं कर पाया,और आज भी वह सारे कार्य पहले की ही भांति कर रहा है।'

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