उत्तर प्रदेश

UP Election 2022: राजभर पहले से दूर, निषाद अगर रूठे तो भाजपा का बिगड़ सकता है पूर्वांचल के सीटों का समीकरण

Janjwar Desk
28 Dec 2021 5:36 AM GMT
UP Election 2022: राजभर पहले से दूर, निषाद अगर रूठे तो भाजपा का बिगड़ सकता है पूर्वांचल के सीटों का समीकरण
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UP Election 2022: राजभर पहले से दूर, निषाद अगर रूठे तो भाजपा का बिगड़ सकता है पूर्वांचल के सीटों का समीकरण

UP Election 2022: यूपी के विधान सभा चुनाव में अपना विजय का पताका लहराने के लिए पूर्वांचल के सीटों पर सभी की निगाहें टिकी हैं। यह माना जाता है कि यहां की सीटों पर कब्जा जमाने वालों के हाथ ही सत्ता की चाभी रहती है।

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

UP Election 2022: यूपी के विधान सभा चुनाव में अपना विजय का पताका लहराने के लिए पूर्वांचल के सीटों पर सभी की निगाहें टिकी हैं। यह माना जाता है कि यहां की सीटों पर कब्जा जमाने वालों के हाथ ही सत्ता की चाभी रहती है। पिछले चुनाव में सपा के गढ़ को ध्वस्त करते हुए पूर्वांचल से भाजपा को शानदार कामयाबी मिली थी। लेकिन इस बार बदले हुए हालात इस कदर रहे तो एक बार फिर पाशा पलट सकता है। सता के समीकरण में पिछड़ों में राजभर व निषाद जातियां यहां निर्णायक मानी जाति है। राजनीतिक अटकलों के मुताबिक ओमप्रकाश राजभर के सपा के साथ गठबंधन के चलते राजभर भाजपा से पहले ही दूर जा चुका है। इस बीच भाजपा को नए साथी मिले डा.संजय निषाद से एक उम्मीद जगी है,पर निषाद जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने के वादे को पूरा न करने से इनकी कतारों में नाराजगी पैदा हुई है। ऐसे में अगर निषाद रूठ गए तो भाजपा का सत्ता का समीकरण बिगड़ सकता है।

भाजपा विकास के तमाम दावे हो या प्रमुख विपक्षी दलों के अपने शासनकाल के उपलब्धियों का पुलिंदा। चुनाव का माहौल बनते ही सभी दलों के लिए विकास का मुददा कमजोर पड़ने के साथ ही सबकी नजर सोशल इंजीनियरिंग पर जा टिकी है। ऐसे में पूर्वांचल की सीटों पर उम्मीद लगाए भाजपा व सपा समेत अन्य दल पिछड़ों की रहनुमाई करने का आगे बढ़कर दावा करने में लगे हैं। लिहाजा एक बार फिर राजभर व निषाद जाति के वोट बैंक को लेकर प्रमुख दलों में खिंचतान तेज हो गई है।

बीजेपी यूपी में 15 साल के सियासी वनवास को खत्म करने के लिए 2017 के चुनाव में अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के साथ हाथ मिलाया था। इस तरह बीजेपी पिछड़ी जातियों में प्रभावशाली माने जाने वाले पटेल व राजभर को साथ लेकर 325 सीटों के साथ प्रचंड जीत हासिल थी। सूबे में योगी सरकार में ओम प्रकाश राजभर को कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गए और एनडीए से बाहर हो गए।

पूर्वांचल में राजभर वोटर को अहम माना जाता है। पूर्वांचल के कई जिलों में राजभर समुदाय का वोट राजनीतिक समीकरण बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है। यूपी में राजभर समुदाय की आबादी करीब 3 फीसदी है, लेकिन पूर्वांचल के जिलों में राजभर मतदाताओं की संख्या 12 से 22 फीसदी है। गाजीपुर, चंदौली, मऊ, बलिया, देवरिया, आजमगढ़, लालगंज, अंबेडकरनगर, मछलीशहर, जौनपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और भदोही में इनकी अच्छी खासी आबादी है, जो यूपी की चार दर्जन विधानसभा सीटों पर असर रखते हैं।

पिछड़ों के वोट बैंक के लिहाज से अहमियत की बात करें तो वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव के हालात व नतीजों का आकलन करना जरूरी हो जाता है। 2017 में ओमप्रकाश राजभर बीजेपी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़़ने का सियासी फायदा दोनों पार्टियों को मिला था। बीजेपी ने ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को 8 और अपना दल (एस) को 11 सीटें दी थी जबकि खुद 384 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। राजभर की पार्टी को चार सीटों पर जीत मिली थी जबकि अपना दल 9 सीटें जीती थी। यूपी की लगभग 22 सीटों पर बीजीपी की जीत में राजभर वोटबैंक बड़ा कारण था।

गौरतलब है कि 2017 विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल और आसपास के जिलों की कुल 164 सीटों में से बीजेपी को 115 पर फतह मिली थी। सपा को 17, बीएसपी को 14 और कांग्रेस को मात्र 2 सीटें मिली थीं। इसी तरह 2012 चुनाव में सपा को इस क्षेत्र में 102 सीटें, बीजेपी को 17, बीएसपी को 22 और कांग्रेस को 15 सीटें मिली थीं। 2007 में जब मायावती यूपी में पूर्ण बहुमत के साथ आईं तो पूर्वांचल में उनकी पार्टी 85 सीटें जीतने में कामयाब रही। सपा को 48, बीजेपी को 13, कांग्रेस को 9 और अन्य को 4 सीटें मिली थीं।

वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव से पांच वर्ष बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। उधर निषादों की रहनुमाई करनेवाले निषाद पार्टी के अध्यक्ष डा. संजय निषाद पिछले चुनाव में कोई सफलता न मिलने से इस बार भाजपा के साथ हैं। ऐसे में सोशल इंजीनियरिंग को अपने पक्ष में बैठाने की कोशिश में सपा व भाजपा दोनों बराबरी पर दिख रही है।लेकिन खास बात यह है कि निषाद पार्टी का भाजपा से बने रिश्तों के मूल शर्त इस बात के रहे कि निषाद जाति को अनुसूचित जाति में शामिल किया जाएगा। राज्य में विधान सभा चुनाव को लेकर अधिसूचना जारी होने में चंद दिन रह गए हैं। इस बाीच 17 दिसंबर को लखनऊ के रमाबाई अंबेडकर रैली मैदान में निषाद समाज की रैली आयोजित की गई थी। बीजेपी के साथ गठबंधन के बाद पहली चुनावी रैली में गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीरनगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद, फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर से हजारों लोग लखनऊ पहुंचे। जिसमें सरकार के नुमाइंदों के तरफ से निषादों के साथ किए गए वादे को पूरा करने का एलान करने की उम्मीद लगाए अच्छी संख्या में लोग पहुंचे थे। लेकिन इसकी घोषणा नही हुई। लिहाजा रैली स्थल पर ही बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने नाराजगी जताई। बीजेपी, अमित शाह और योगी के खिलाफ नारेबाजी भी हुई।

रैली के बाद निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद ने नाराजगी जाहिर करते हुए 18 दिसंबर की सुबह सीएम योगी को चिट्ठी लिखी। निषाद और 17 उपजातियों के 18 प्रतिशत वोटर्स का प्रतिनिधित्व करने वाले संजय निषाद ने लिख दिया कि पहले आरक्षण, फिर वोट। मेरे कार्यकर्ता मुझ पर भरोसा करके रैली में आए थे। इसलिए मैंने मंच पर कहा था कि बीजेपी हमारे मुद्दों की वकालत करती आई है। अब वही बीजेपी हमारी जज बन गई है।

उन्होंने लिखा कि गृहमंत्री को आरक्षण के विषय पर कुछ न कुछ तो कहना ही चाहिए था। सिर्फ इतना कहने से काम नहीं चलेगा कि सरकार आने पर मसला हल करेंगे। पूरा निषाद समाज अमित शाह, सीएम योगी और मुझसे खुश था। अगर आरक्षण की घोषणा होती, तो निश्चत ही 2022 में बीजेपी को समाज का पूरा समर्थन मिलता। मगर, ऐसा नहीं हुआ। इसलिए अब समाज के लोग कह रहे हैं कि आरक्षण नहीं तो वोट नहीं। हमारे कुछ लोग बीजेपी का साथ छोड़ने के लिए भी कह रहे हैं। यूपी विधानसभा की 160 सीटों पर निषाद जगे हुए हैं। इन लोगों का ख्याल रखते हुए आरक्षण की घोषणा जरूरी है।

इसके बाद शाम से लेकर देर रात तक बैक-टू-बैक बैठकों का दौर चला। इनका मुख्य एजेंडा निषाद आरक्षण ही रहा। सीएम योगी और कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह से दो टूक कह दिया कि आरक्षण की घोषणा नहीं, तो समर्थन भी नहीं। एक ही दिन में 3 बैठकें की गईं। 2 बैठक सीएम योगी के साथ हुईं। बात नहीं बनी तो फिर तीसरी बैठक कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह के साथ की गई। सूत्रों की मानें तो मंत्री सिद्धार्थ ही इस पूरे गठबंधन के बीच की कड़ी हैं। संजय निषाद का दबाव है कि चुनाव से पहले आरक्षण की घोषणा की जाए।

हालांकि कुछ दिन बाद ही एक बार फिर डा. संजय निषाद का सूर बदल गया। उन्होंने एक चैनल से बातचीत में कहा कि पिछली सरकारों ने निषाद समाज को आरक्षण नहीं दिया था। 70 साल से आरक्षण नहीं दिया। दिल्ली और उत्तर प्रदेश में आरक्षण भाजपा ही दे सकती है। हम उससे अलग होकर कहां जाएंगे। कौन आरक्षण देगा। हम साथ रहेंगे तभी तो आरक्षण मिलेगा। हमें उम्मीद है कि मछुआ समाज को आरक्षण मिलेगा। पिछली सरकारों ने हमारे लोगों की बुद्धिमत्ता ही छीन ली। एक भी आईएएस या पीसीएस नहीं बनाया। पिछली सरकारों को शर्म आनी चाहिए कि एक बड़ा समाज जिसका वोट लेते रहे उन्हें बुद्धिमत्ता से कोसों दूर रखा। हाथी (बहुजन समाज पार्टी) और साइकिल (समाजवादी पार्टी) के एजेंट जगह-जगह भड़काने के लिए बैठे हुए हैं। वो चाहते हैं कि जल्दी से निषाद हमारे साथ आ जाए फिर हम लूटपाट मचाएं। चुनाव में निषाद समाज नैया पार लगाएगा। हम लोग भारतीय जनता पार्टी के साथ मजबूती से आज भी खड़े हैं।

गठबंधन का नारा था सरकार बनाओ, अधिकार पाओ

प्रदेश में लंबे समय से निषाद समाज को अनुसूचित जाति में शामिल कर आरक्षण देने की मांग उठ रही है। दिसंबर 2016 को तत्कालीन सपा सरकार ने केवट, बिंद, मल्लाह, नोनिया, मांझी, गौंड, निषाद, धीवर, कहार, कश्यप, भर और राजभर सहित 17 जातियों को ओबीसी की श्रेणी से एससी में शामिल करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था। हालांकि, बसपा ने इस प्रस्ताव को कोर्ट में चुनौती दे दी। जिसके कारण यह मुद्दा आज तक हल नहीं हो पाया है। इसी मुद्दे को हल करने के लिए निषाद पार्टी ने बीजेपी से गठबंधन कर सरकार बनाओ, अधिकार पाओ का नारा दिया था। 5 साल बीत जाने के बाद भी निषाद समाज के हाथ अभी भी खाली हैं।

सूबे में 20 लोकसभा सीटें और तकरीबन 60 के करीब विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां निषाद वोटरों की संख्या अच्छी खासी है। गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद ,फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जिले में निषाद वोटरों की संख्या अधिक है. ऐसे में बीजेपी ने संजय निषाद को साथ मिलाकर राजभर समाज की नाराजगी से संभावित नुकसान से बचने के लिए की कवायद की है, लेकिन सूबे में निषाद समाज अलग-अलग खेमों में बटे हैं और सभी खेमों के अलग-अलग नेता हैं। बिहार में निषाद समुदाय के मंत्री और वीआईपी पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी भी यूपी में चुनाव लड़ने का दम भर रहे हैं।

निषाद वोटों पर विपक्ष की नजर

सपा से लेकर कांग्रेस तक की नजर सूबे में निषाद समुदाय के वोटों पर है। सपा निषाद समुदाय से आने वाली फूलनदेवी की मूर्ती को गोरखपुर में लगाने का ऐलान किया है। इतना ही नहीं अखिलेश यादव ने सपा के पिछड़ा वर्ग के मोर्चा की कमान डा राजपाल कश्यप को सौंप रखी है तो विशंभर प्रसाद निषाद जैसे नेता पार्टी के राज्यसभा सदस्य हैं। वहीं, कांग्रेस भी निषादों को साधने के लिए बोट यात्रा यूपी में निकाल चुकी हैं। ऐसे में देखना है कि निषाद समुदाय 2022 के चुनाव में किसकी नैया पार लगाते हैं।

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