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भाजपा नेता की आलोचना करने पर फिल्म निर्माता आयशा सुल्ताना पर राजद्रोह का केस दर्ज

Janjwar Desk
12 Jun 2021 7:29 AM GMT
भाजपा नेता की आलोचना करने पर फिल्म निर्माता आयशा सुल्ताना पर राजद्रोह का केस दर्ज
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(आयशा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए (राजद्रोह) और 153 बी (अभद्र भाषा) के तहत मामला दर्ज किया है।)

सुल्ताना हाल ही में लक्षद्वीप में प्रस्तावित कानून और विवादास्पद सुधार उपायों के खिलाफ अभियान में सबसे आगे रही हैं। भाजपा के इन कदमों से स्थानीय लोगों में व्यापक गुस्सा पैदा हो गया है....

वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कुमार की रिपोर्ट

जनज्वार। प्रधानमंत्री मोदी सहित भाजपा के तमाम छोटे-बड़े नेता खुद को जनसेवक नहीं मानते, बल्कि वे खुद को मध्ययुग के राजतंत्र के शासक के समकक्ष समझते हैं। उनका वश चले तो अपनी आलोचना करने वाले को तुरंत सूली पर लटका दें। सूली की जगह वे जरा जरा सी बात पर किसी के भी खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज करवा देते हैं। वे लोकतंत्र में नागरिकों को मिली हुई अभिव्यक्ति की आजादी को कुचल देना चाहते हैं। ताजा उदाहरण लक्षदीप की फ़िल्मकार आयशा सुल्ताना का सामने आया है।

केंद्र शासित प्रदेश लक्षदीप के प्रशासक प्रफुल्ल के पटेल को "जैव हथियार" कहने के लिए स्थानीय निवासी, कार्यकर्ता और फिल्म निर्माता आयशा सुल्ताना के खिलाफ 10 जून को लक्षद्वीप पुलिस द्वारा राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है। यह मामला भाजपा लक्षद्वीप इकाई के अध्यक्ष सी अब्दुल खादर हाजी द्वारा उठाई गई शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया, जिन्होंने आरोप लगाया कि सुल्ताना ने लक्षद्वीप में चल रहे राजनीतिक संकट के बारे में एक मलयालम समाचार चैनल पर एक बहस के दौरान केंद्र की मोदी सरकार और पटेल की आलोचना की थी।

भाजपा नेता का आरोप है कि यह सुल्ताना का राष्ट्रविरोधी कृत्य था, जिसने केंद्र सरकार की 'देशभक्ति की छवि' को धूमिल किया। साथ ही उन्होंने इसके खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की है। बता दें कि इससे पहले भाजपा ने फिल्म निर्माता के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए द्वीप में विरोध प्रदर्शन किया था।

हाल ही में एक फेसबुक पोस्ट में अपने बयान को सही ठहराते हुए सुल्ताना ने लिखा, "मैंने टीवी चैनल डिबेट में बायो-वेपन शब्द का इस्तेमाल किया। मैंने महसूस किया है कि पटेल और उनकी नीतियों ने एक जैव-हथियार के रूप में काम किया है। पटेल और उनके दल के माध्यम से ही लक्षद्वीप में कोविड-19 फैला। मैंने पटेल की तुलना सरकार या देश से नहीं, बल्कि एक जैव हथियार के रूप में की है... आपको समझना चाहिए। मैं उन्हें और क्या कहूं..."

सुल्ताना हाल ही में लक्षद्वीप में प्रस्तावित कानून और विवादास्पद सुधार उपायों के खिलाफ अभियान में सबसे आगे रही है। भाजपा के इन कदमों से स्थानीय लोगों में व्यापक गुस्सा पैदा हो गया है।

लक्षद्वीप के चेतलाट द्वीप की मूल निवासी आयशा सुल्ताना एक अभिनेत्री, मॉडल और निर्देशक हैं। आयशा इससे पहले मलयालम फिल्म 'केट्टीओलानु एंटे मालाखा' के सेट पर एक सहयोगी निर्देशक के रूप में काम कर चुकी हैं। उन्होंने अपने निर्देशन की शुरुआत 2020 में स्वतंत्र मलयालम फिल्म 'फ्लश' से की।

सुल्ताना के खिलाफ अपनी शिकायत में, हाजी ने कहा कि फिल्म निर्माता ने पटेल को एक "जैव-हथियार" कहा, जिसे मलयालम चैनल 'मीडियाऑन टीवी' पर एक समाचार बहस के दौरान प्रसारित किया गया। इस टिप्पणी का भाजपा की लक्षद्वीप इकाई ने विरोध किया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने केरल में भी आयशा के खिलाफ शिकायत की है।

सुल्ताना के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए, लक्षद्वीप साहित्य प्रवर्तक संगम ने उनके खिलाफ राजद्रोह के आरोपों की निंदा की है। संगठन के प्रवक्ता के बहिर ने कहा, 'उन्हें देशद्रोही के रूप में चित्रित करना उचित नहीं है। उन्होंने प्रशासक के अमानवीय रवैये के खिलाफ प्रतिक्रिया दी थी। पटेल के हस्तक्षेप ने ही लक्षद्वीप को कोविड प्रभावित क्षेत्र बना दिया। लक्षद्वीप में सांस्कृतिक समुदाय उनके साथ खड़ा होगा।"

सुल्ताना के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज किए जाने के विरोध में कई अन्य राजनेताओं और कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त किए हैं। आयशा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए (राजद्रोह) और 153 बी (अभद्र भाषा) के तहत मामला दर्ज किया है।

आयशा सुल्ताना का जन्म सन 1984 में बांग्लादेश के जेस्सोर में हुआ था। वह 37 साल की हैं। आयशा की शुरू से ही कला क्षेत्र में रूचि रही है। हाल ही में उन्होंने गैसवर्क्स, लंदन प्रदर्शनी में अपनी क्यूरेटोरियल रिसर्च रेजीडेंसी पूरी की है। ये फिल्ममेकर बिट्रो आर्ट्स ट्रस्ट का भी हिस्सा है, जिसका संगठन और संचालन ढाका स्थित कलाकारों के द्वारा किया गया है। साल 2014 में उन्हें समदानी कला पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उन्हें नवोदित फिल्म निर्माता आयशा सुल्ताना के रूप में भी जाना जाता है।

आयशा सुल्ताना ने साल 2020 में बतौर इंडिपेंडेंट निर्देशक अपनी शुरुआत की थी। उन्होंने 'फ्लश' फिल्म बनाई थी, जोकि मलयाली भाषा में थी। शुरुआत से ही कला के क्षेत्र में रूचि रखने वाली सुल्ताना ने मलयालम फिल्म निर्माता लाल जोस के साथ भी काम किया। उन्होंने अभिनेता आसिफ अली की फिल्म 'केत्योलानु एंते मालाख' में असोसिएट डायरेक्टर के रूप में काम किया। आयशा न सिर्फ अभिनेत्री, मॉडल और निर्देशक हैं बल्कि लेखक भी हैं। अपनी इंडिपेंडेंट फिल्म 'फ्लश' की कहानी उन्होंने खुद ही लिखी थी।

गौरतलब है कि 70 हजार की आबादी वाला लक्षद्वीप इन दिनों उबल रहा है। हर जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। सोमवार को यहां लगभग हर कोई हाथों में पोस्टर लिए खड़ा दिखा। चाहे चमकीली रेत हो, पानी के भीतर, घरों के बाहर, फिरोजा लगून के किनारों पर, फिशिंग बोट्स पर, या फिर बीच हाउस हो। हर जगह बस एक ही मंजर नजर आया। हाथों में पोस्टर लिए लोग, जिन पर लिखा था- सेव लक्षद्वीप। बड़ी बात ये है कि इस प्रदर्शन में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की स्थानीय यूनिट भी शामिल हुई।

इस प्रदर्शन के पीछे बड़ी वजह है- हाल के महीनों में लक्षद्वीप प्रशासन की तरफ से किए गए बदलाव। दरअसल, केंद्र सरकार यहां ग्लोबल टूरिज्म और डेवलपमेंट को बढ़ावा देना चाहती है। इसका मतलब है, यहां बाहरी लोगों की दखल और पहुंच बढ़ जाएगी। स्थानीय लोग इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान रहे हैं।

लक्षद्वीप दुनिया के ऐसे चुनिंदा इलाकों में है, जहां दिसंबर 2020 तक कोरोना संक्रमण नहीं पहुंचा था। जब वैक्सीन आई भी नहीं थी, लक्षद्वीप कोरोना मुक्त इलाका था। दिसंबर 2020 में लक्षद्वीप के प्रशासक दिनेश्वर शर्मा का निधन हो गया। जिसके बाद प्रफुल्ल पटेल को इस यूनियन टेरिटरी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। प्रभार संभालते ही पटेल ने कोविड को लेकर नए प्रोटोकॉल बनाए और लक्षद्वीप में दाखिल होने के लिए 7 दिन के अनिवार्य क्वारैंटाइन नियम को हटा दिया। जिससे लोग कोरोना निगेटिव रिपोर्ट के आधार पर बिना क्वारैंटाइन हुए यहां दाखिल होने लगे। इससे यहां भी संक्रमण फैल गया। अब तक यहां संक्रमण के 8 हजार से अधिक मामले सामने आ चुके हैं।

जनवरी में लक्षद्वीप प्रशासन ने विरोध को रोकने के लिए प्रिवेंशन ऑफ एंटी सोशल एक्टीविटीज एक्ट (जिसे लक्षद्वीप में गुंडा एक्ट भी कहा जा रहा है) प्रस्तावित किया। जिसके तहत सरकार का विरोध करने पर किसी को भी एक साल तक बिना जमानत के जेल में रखा जा सकता है।

फरवरी में लक्षद्वीप प्रशासन ने पंचायत कानून में बदलाव लाने की बात की। लक्षद्वीप में कोई विधानसभा नहीं है। यहां एक संसद सदस्य है और पंचायत के सदस्य निर्वाचित होते हैं। पंचायत की शक्तियां लक्षद्वीप के लोगों के लिए बहुत अहम हैं। फरवरी में प्रस्तावित कानून के तहत उन लोगों को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया, जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। साथ ही कई अहम विभागों में पंचायत की शक्तियों को सीमित करने की बात कही गई है।

इसके बाद प्रशासन ने एक और नया कानून प्रस्तावित कर दिया। इसका नाम है लक्षद्वीप डेवलपमेंट अथॉरिटी रेजोल्यूशन (एलडीएआर)। प्रशासन का तर्क है कि ये लक्षद्वीप के विकास के लिए हैं, लेकिन लक्षद्वीप के लोग इसे अपनी जमीन के लिए खतरा मान रहे हैं।

इस एक्ट के तहत प्रशासन को ये शक्ति दी गई है कि वो लक्षद्वीप के किसी भी इलाके को डेवलपमेंट एरिया घोषित कर सकता है। डेवलपमेंट कैसे होगा, ये प्रशासन तय करेगा। जमीन के मालिकों के क्या अधिकार होंगे, ये नहीं बताया गया है। लोगों में ये डर है कि उन्हें उनकी जमीन से हटा दिया जाएगा। लक्षद्वीप में सबसे ज्यादा विरोध इसी एक्ट का हो रहा है।

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