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पारिवारिक उपेक्षा के कारण भारत में होती है 22 फीसदी छोटी बच्चियों की मौत

Prema Negi
22 July 2019 7:58 AM GMT
पारिवारिक उपेक्षा के कारण भारत में होती है 22 फीसदी छोटी बच्चियों की मौत
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हमारे देश में प्रतिवर्ष पांच वर्ष से कम उम्र में 2,40,000 लड़कियों की मृत्यु केवल इसलिए होती है क्योंकि लड़कियां होने के कारण उनके परवरिश में लापरवाही बरती जाती है। यह संख्या गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग निर्धारण के बाद की जाने वाली भ्रूण हत्या के अतिरिक्त है....

जेंडर इंडेक्स में सबसे नीचे के देशों में किस तरह शुमार है भारत आंकड़ों के साथ बता रहे हैं महेंद्र पाण्डेय

क्वल मीजर्स 2030 नामक एक गैर-सरकारी संस्था ने सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स जेंडर इंडेक्स नामक रिपोर्ट को जून, 2019 में प्रकाशित किया है। संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स में लैंगिक समानता भी शामिल है और 193 देशों ने, जिसमें भारत भी शामिल है, इस पर हस्ताक्षर किये हैं।

सके अनुसार वर्ष 2030 तक हरेक देश को अपने यहाँ लैंगिक असमानता समाप्त करनी है। इक्वल मीजर्स 2030 ने इसी सन्दर्भ में वर्ष 2018 के दौरान 129 देशों में लैंगिक समानता के आकलन के आधार पर एक इंडेक्स तैयार किया है। इसमें लैंगिक समानता की स्थिति के आधार पर देशों को 0 से 100 के बीच अंक दिए गए हैं – 100 अंक सबसे अधिक समानता और 0 कोई समानता नहीं दर्शाता है।

स इंडेक्स के अनुसार 129 देशों की सूची में भारत 95वें स्थान पर है और इसे 56.2 अंक दिए गए हैं। यहाँ यह जानना आवश्यक है की 59 तक अंक पाने वाले कुल 60 देश लैंगिक समानता के सबसे निचले सिरे पर हैं। अंक के अनुसार भारत तो 129 देशों के औसत अंक, 65.7 के आसपास भी नहीं पहुंचता है। चीन, श्रीलंका और भूटान क्रमशः 74, 80 और 90वें स्थान पर हैं, यानी भारत से अच्छी स्थिति में हैं। म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान भारत से भी नीचे हैं और इनका स्थान क्रमशः 98, 102, 110 और 113 है।

स इंडेक्स में पहले दस स्थानों पर जो देश हैं, उनके नाम हैं – डेनमार्क, फ़िनलैंड, स्वीडन, नीदरलैंड, स्लोवेनिया, जर्मनी, कनाडा, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया। इंडेक्स में इंग्लैंड 17वें, जापान 21वें, अमेरिका 28वें, रूस 59वें, दक्षिण अफ्रीका 71वें और ब्राज़ील 77वें स्थान पर है। लैंगिक असमानता से सम्बंधित मामलों में सऊदी अरब को लगातार कोसा जाता है, पर वह भी हमारे देश से तीन स्थान ऊपर यानी 92वें स्थान पर है।

इंडेक्स में 60 से 69 तक अंक वाले कुल 24 देशों में कुछ हद तक लैंगिक समानता है, 70 से 90 अंक तक सामान्य समानता है पर 90 के बाद पूरी तरह समानता है। इंडेक्स में किसी भी देश को 90 या इससे ऊपर अंक नहीं दिये गए हैं। डेनमार्क पहले स्थान पर है, पर इसे भी कुल 89.3 अंक ही मिले हैं। इंडेक्स के अंतिम दस देश हैं – सिएरा लियॉन, लाइबेरिया, नाइजीरिया, माली, मॉरिटानिया, नाइजर, येमन, कांगो, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो और चाड।

क्वल मीजर्स 2030 की निदेशक एलिसन होल्डर के अनुसार वर्ष 2030 तक दुनिया का कोई भी देश सही मायने में लैंगिक समानता पाने की स्थिति में नहीं है। जिन 129 देशों को इंडेक्स में शामिल किया गया है, उनमें दुनिया की 95 प्रतिशत से अधिक महिलायें रहती हैं।

दुनिया की लगभग 1.4 अरब महिलायें भारत जैसे उन देशों में रहती हैं, जहां लैंगिक समानता नहीं है और लगभग इतनी ही महिलायें उन देशों में रहती हैं, जहां नाममात्र की लैंगिक समानता है। एलिसन होल्डर के अनुसार इस इंडेक्स को तैयार करने में महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, महिलाओं पर हिंसा और संसद में भागीदारी को भी शामिल किया गया है। बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की मेलिंडा गेट्स ने इस इंडेक्स को देशों को सतर्क करने वाला बताया है।

मारे देश की ऐसी हालत तब है, जब प्रधानमंत्री अपने आप को लगातार महिलाओं का मसीहा साबित करते हैं, लगभग हरेक भाषण में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला योजना और तीन तलाक बिल की चर्चा करना नहीं भूलते।

फ्रीका में एक देश है, टोंगा। टोंगा दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में शुमार है। दूसरी तरफ भारत है, जहां की बढ़ती अर्थव्यवस्था के चर्चे दुनिया में हैं। पर हैरान करने वाला तथ्य यह है कि दुनिया में भारत और टोंगा, दो ही ऐसे देश हैं, जहां पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सन्दर्भ में लड़कियों की मृत्यु दर लड़कों की तुलना में अधिक है। इसका सीधा सा मतलब है कि 5 वर्ष से कम उम्र में लड़कियों की मौत लड़कों से अधिक होती है। इस विश्लेषण को लन्दन के क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ने दुनिया के 195 देशों के आंकड़ों के आधार पर किया है।

इंस्टीट्यूट वैक्सीन एक्सेस सेंटर के रिपोर्ट, न्यूमोनिया एंड डायरिया प्रोग्रेस रिपोर्ट 2018, के अनुसार विश्व में किसी भी देश के तुलना में न्यूमोनिया एंड डायरिया से बच्चों की मौत के मामले में भारत सबसे आगे है। दुनिया में न्यूमोनिया एंड डायरिया से जितने बच्चों की मृत्यु होती है, उसमें से 70 प्रतिशत से अधिक मौतें केवल 15 देशों में होती हैं और भारत भी उनमें से एक है। शेष 14 देश हैं – नाइजीरिया, पाकिस्तान, कांगो, इथियोपिया, चाड, अंगोला, सोमालिया, इंडोनेशिया, तंज़ानिया, चीन, नाइजर, बांग्लादेश, यूगांडा और कोटे द आइवरी।

न्यूमोनिया एंड डायरिया से बच्चों की मृत्यु के सन्दर्भ में भी लिंग की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारे देश में ऐसी मृत्यु के सन्दर्भ में लडकियां लड़कों की तुलना में बहुत आगे हैं। वर्ष 2016 के दौरान देश में 2.6 करोड़ बच्चे पैदा हुए और लगभग 2.61 लाख बच्चों की मृत्यु हो गयी। हमारे देश में तो टीकाकरण के मामले में भी लड़के और लड़कियों में भेद किया जाता है। औसतन 100 में से 78 बच्चों का पूर्ण टीकाकरण किया जाता है, जिसमें से 41 लड़के होते हैं और 37 लड़कियां।

लांसेट मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में प्रतिवर्ष पांच वर्ष से कम उम्र में 2,40,000 लड़कियों की मृत्यु केवल इसलिए होती है क्योंकि लड़कियां होने के कारण उनके परवरिश में लापरवाही बरती जाती है। यह संख्या गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग निर्धारण के बाद की जाने वाली भ्रूण हत्या के अतिरिक्त है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि हरेक 10 वर्ष के बाद की जनगणना में 24 लाख लड़कियों की कमी केवल उनके लडकी होने के कारण हो जाती है।

स्ट्रिया के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एप्लाइड सिस्टम्स द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम उम्र की जितनी लड़कियां मरतीं हैं, उनमें से 22 प्रतिशत मौतें केवल इसलिए होतीं हैं कि वे लड़कियां थीं, इसलिए घर-परिवार और समाज ने उन्हें पूरी तरह से उपेक्षित किया।

जाहिर है, पूरी दुनिया में किये गए तमाम अध्ययन यही बताते हैं कि हमारे देश में लड़कियों की उपेक्षा इस हद तक की जाती है कि वे जिन्दा भी नहीं रह पातीं। इन सबके बाद भी समाज का और सरकार का रवैया नहीं बदल रहा है।

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