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कोरोना टेस्टिंग किट में बड़ा घोटाला, एयरपोर्ट पर 2 कंपनियों के मुलाजिमों के झगड़े से हुआ खुलासा

Prema Negi
30 April 2020 7:39 AM GMT
कोरोना टेस्टिंग किट में बड़ा घोटाला, एयरपोर्ट पर 2 कंपनियों के मुलाजिमों के झगड़े से हुआ खुलासा
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इन दो आदमियों के बीच चला वाद-विवाद आगे चलकर नाटकीय घटनाओं की ऐसी शृंखला को अंजाम देने वाला था, जो भारत में हंगामा खड़ा करने वाली थी....

संध्या रविशंकर की रिपोर्ट

जनज्वार। 17 अप्रैल की आधी रात का वक़्त था। दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर एक व्यक्ति तेज कदमों से इधर-उधर चल रहा था। वह एक सामान तमिलनाडु भेजने के लिए तेजी से काम कर रहा था।

भी एक दूसरा आदमी आता है। ये दिल्ली से है। जब उसने पहले वाले व्यक्ति को ज़्यादा ही शीघ्रता से काम करते हुए देखा तो वो गुस्से से आग बबूला हो गया। इसके बाद तो हवाई अड्डे पर वाद-विवाद शुरू हो गया। दिल्ली वाला आदमी गुस्से में चला गया और तमिलनाडु भेजा जाने वाला सामान चेन्नई के कामराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मैक के लिए चल पड़ा।

न दो आदमियों के बीच चला वाद-विवाद आगे चलकर नाटकीय घटनाओं की ऐसी शृंखला को अंजाम देने वाला था, जो भारत में हंगामा खड़ा करने वाली थी, क्योंकि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाने थे, जिसको लेकर लाखों सवाल किये जा सकते थे। और अंत में ये घटनाएं भारत और चीन के राजनयिक संबंधों में खटास ले आएंगी।

भेजा जाने वाला सामान का पैकेट

आखिर वे दो आदमी किस बात पर झगड़े थे? इसका जवाब है 24,000 रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट (रैट) किट्स जिन्हें चीन की निर्माता कंपनी गुआंगझाऊ वॉन्डफो ने भेजा था।

जो आदमी सामान का पैकेट तमिलनाडु भेजना चाह रहा था, वो चेन्नई की निर्यातक कंपनी मैट्रिक्स लैब्स का मुलाजिम था। दिल्ली वाला आदमी एक वितरक कंपनी रेयर मेटाबॉलिक्स का मुलाजिम था। मैट्रिक्स लैब्स द्वारा आयात किये गए किट्स के वितरण का एकाधिकार इस कम्पनी को था।

तो फिर उन दो आदमियों के बीच वाद-विवाद क्यों हो रहा था? क्योंकि मैट्रिक्स लैब्स ने शान बायोटेक नामक एक अन्य वितरक को वॉन्डफो द्वारा भेजे गए रैट किट्स में से 50,000 किट्स देने का वायदा कर दिया था। गौरतलब है कि शान बायोटेक तमिलनाडु सरकार का एक वेंडर है।

रेयर मेटाबॉलिक्स के अनुसार यह उस समझौते का उल्लंघन था जो उसके और मैट्रिक्स लैब्स के बीच हुआ था।

पृष्ठभूमि देखें

25 मार्च के आस-पास इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने चीन की कंपनी गुआंगझाऊ वॉन्डफो के रैट किट्स को हरी झंडी दिखाई।

ईसीएमआर ने 27 अप्रैल को एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बताया कि शुरुआत में इसने सीधे निर्माता कंपनी से किट्स खरीदने की कोशिश की थी लेकिन दो दिक्कतों के चलते आईसीएमआर ने टेंडर जारी करने का फैसला लिया। इन दिक्कतों में से एक यह थी कि रेट डॉलर में कोट करने थे और दूसरी थी कि जहाज से माल सही हालत में पहुंचने की हमारे पास कोई गारंटी नहीं थी।

दूसरे न्यूज़ माध्यमों में जो छपा है उसके इतर तथ्य ये है कि मैट्रिक्स लैब भारत में वॉन्डफो का अकेला वितरक नहीं था। कम से कम तीन अन्य कंपनियां भी हैं जो भारत में वॉन्डफो के उत्पाद वितरित करती हैं। ये कंपनियां हैं- अबॉट फार्मा, कैडिला और माईलें। दूसरी अन्य भी हो सकती हैं।

ईसीएमआर की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार टेंडर के माध्यम से चार बोलियां प्राप्त हुयी थीं। प्रति किट 1204 रुपए, 1200 रुपये, 844 रुपये और 600 रुपये। इन कंपनियों को नज़दीक से जानने वालों ने दी लीड को बताया कि 30 करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनी मैट्रिक्स लैब्स अग्रिम किट्स आयात करने के लिए ज़रूरी पैसे का जुगाड़ नहीं कर पाई इसलिए इसने सहायता के लिए दिल्ली स्थित वितरक रेयर मेटाबॉलिक्स की ओर रूख किया।

स क्षेत्र में काम कर रहे एक व्यक्ति ने ज़ोर देकर यह कहा, "इस समय बैंक से भी कोई सहायता नहीं मिल पा रही है तो यह अनुबंध तो होना ही था। लोगों का समूह एक साथ आएगा और पैसा मिलाएगा, आयात करेगा और मुनाफे में बेचेगा। अग्रिम आयात करने लायक ज़रूरी पैसा अनेक कंपनियों के पास नहीं है।"

रेयर मेटाबॉलिक्स ने दी लीड द्वारा मांगी गयी जानकारियों का अभी तक जवाब नहीं दिया है इसलिए हमारे पास उनका पक्ष नहीं है। जब भी कंपनी जवाब देती है हम उसे इस रिपोर्ट में शामिल कर लेंगे।

हालाँकि अंत में बात भागीदारी पर बनी। रेयर मेटाबॉलिक्स पैसे का जुगाड़ करेगी और मैट्रिक्स लैब्स रैट किट्स का आयात करेगी क्योंकि एक तो इसके पास आयात लाइसेंस था और दूसरा इसकी बोली स्वीकार कर ली गयी थी।

किट्स के भारत आ जाने के बाद उनका वितरण रेयर मेटाबॉलिक्स द्वारा गाज़ियाबाद की कंपनी अरक फार्मास्यूटिकल के माध्यम से करना था।

काम बिगाड़ना

लेकिन यह सुखी गठबंधन ज़्यादा दिन नहीं चलने वाला था। इसी बीच तमिलनाडु सरकार की तरफ से शान बायोटेक कंपनी इस दृश्य में प्रवेश करती है। शान बायोटेक 50,000 टेस्टिंग किट्स मैट्रिक्स लैब्स से खरीदना चाहती थी।

मेट्रिक्स लैब्स ने अपने भागीदार रेयर मेटाबॉलिक्स से बात की, लेकिन उसने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि वो आपूर्ति केवल आईसीएमआर को ही करेगी।

लेकिन मेट्रिक्स लैब्स के मुलाजिम को गुस्सा आ गया। उसे लगा कि उसका अपना राज्य इन किट्स की मांग कर रहा है तो भला उसे कैसे मना किया जा सकता है?

मेट्रिक्स ने तय कर लिया और 24,000 किट्स की पहली खेप आते ही उसे शान बायोटेक को दे दिया। इस तरह रेयर मेटाबॉलिक्स के साथ किये गए अनुबंध को संकट में डाल दिया।

रेयर मेटाबॉलिक्स ने दिल्ली उच्च न्यायालय जाने का निर्णय लिया और इस तरह घोटाले से पर्दा उठा।

दिल्ली उच्च न्यायालय में

24 अप्रैल को दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह आदेश जारी किया कि वॉन्डफो की प्रत्येक किट का दाम 600 की बजाय 400 रुपये होगा। यह बात भी उभरकर सामने आयी कि मैट्रिक्स लैब्स ने किट्स 245 रुपये प्रति किट के हिसाब से आयात किये थे। इसके बाद अरक फार्मास्यूटिकल के माध्यम से रेयर मेटाबॉलिक्स ने इन्हें आईसीएमआर को ६०० रुपये प्रति किट के हिसाब से बेचा।

दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के हिसाब से कुल आंकड़ा इस प्रकार है :

मैट्रिक्स लैब्स द्वारा किये गए आयात का मूल्य (5लाख किट्स के लिए) : 12.25 करोड़ रुपये

रेयर मेटाबॉलिक्स द्वारा खरीदने में खर्च की गयी कुल रकम : 21 करोड़ रुपये

आईसीएमआर द्वारा खरीद में किये गए भुगतान की रकम : 30 करोड़ रुपये

"युद्ध से मुनाफ़ा कमाने" वालों की भरमार थी। हमारे एक स्त्रोत ने नाम ना बताने की शर्त पर यह कहा- "लेकिन यह एक सामान्य चलन है। इसी तरह से हर दवा, हर उत्पाद आयात किया जाता है। हर कंपनी को तनख्वाह और दूसरे भत्तों का भुगतान करना होता है, हैं कि नहीं?"

सने आगे कहा- "दूसरी उन कंपनियों के बारे में ज़रा सोचिये जिन्होंने मैट्रिक्स से दुगना रेट कोट किया था। अगर उनकी बोली स्वीकार कर ली गयी होती तो वे कितना ज़्यादा मुनाफा कमा रहे होते।

स बीच आईसीएमआर ने 2 लाख रैट किट्स का एक अन्य ऑर्डर चीन की कंपनी लिव्ज़ों को दे दिया। यह ऑर्डर गुड़गांव की कंपनी जीन्स टू मी के माध्यम से दिया गया था। इन किट्स का ऑर्डर 7 अप्रैल को दिया गया था और जीएसटी में 5 फीसद कटौती के बावजूद इनकी कीमत 795 रुपये प्रति किट रखी गयी।

आंध्र प्रदेश ने दक्षिणी कोरिया की एक कंपनी से किट्स 730 रुपये प्रति किट्स के हिसाब से खरीदीं, वहीं केरल ने 699 रुपये प्रति किट के हिसाब से ऑर्डर दिया तो कर्नाटक ने 700 रुपये प्रति किट के हिसाब से ऑर्डर जारी किया। यह स्पष्ट नहीं है कि केरल और कर्नाटक सरकारों ने किस कंपनी से रैट्स किट्स खरीदे हैं।

त्तीसगढ़ ने 337 रूपए प्रति किट के हिसाब से दक्षिणी कोरिया की एक कंपनी को ऑर्डर दिया, जबकि किट्स पर केंद्र सरकार ने कस्टम ड्यूटी और स्वास्थ्य कर में कटौती कर दी थी। ना तो आईसीएमआर और ना ही राज्य सरकारों ने अभी तक रैट किट्स का भुगतान किया है।

गड़बड़ी किसमें है?

रैट किट्स RT-PCR किट्स से बहुत अलग तरह के होते हैं और प्रत्येक का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्य के लिए होता है। रैट किट्स एक तरह की खून की जांच है जिसमें एन्टी बॉडीज़ को परखा जाता है। एन्टी बॉडीज़ के ज़्यादा मात्रा में होने का मतलब शरीर में संक्रमण होना होता है और कम मात्रा का मतलब उल्टा है।

दूसरी तरफ आरटी-पीसीआर टेस्ट कोविड-१९ वायरस के जेनेटिक पदार्थ को अलग-थलग कर देता है और इसके परिणाम ज़्यादा विशवास करने लायक होते हैं।

तो फिर हमें रैट किट्स की ज़रुरत ही क्यों है? अगर बीमारी नियंत्रण से बाहर चली जाती है तो इसका इस्तेमाल हर्ड इम्यूनिटी की मात्रा का पता लगाने के लिए और सामुदायिक संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।

दुनियाभर के वैज्ञानिकों और सरकारों ने ज़ोर दे कर कहा भी है कि रैट किट्स संकेतक मात्र हैं। इन्हें किसी व्यक्ति में वायरस होने या ना होने के प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता है।

ईसीएमआर ने 27 अप्रैल को एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से राज्यों को रैट किट्स वापिस करने को कहा। लेकिन बहुत से प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं।

1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से "गड़बड़ किट्स" और "ज़्यादा उतार-चढ़ाव" से क्या मतलब है?

2. क्या आईसीएमआर ने इस बात की जांच की है कि राज्यों ने रैट किट्स का इस्तेमाल केवल निगरानी बनाये रखने के लिए किया है?

3. क्या आईसीएमआर ने इस बात की जांच की है कि राज्य सरकारों के अधिकारियों ने रैट किट्स का इस्तेमाल ठीक ढंग से किया है?

4. महत्वपूर्ण सवाल है कि पुणे स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी ने इन किट्स को हरी झंडी दिखाई कैसे?

-मेल से आईसीएमआर को भेजी गयी प्रश्नावली का जवाब नहीं आया है। जब कभी भी जवाब आता है तो लीड उसे शामिल कर इस रिपोर्ट को तरोताजा बना देगा।

चूंकि लॉकडाउन को धीरे-धीरे हटाया जा सकता है, इसलिए जानकारों का कहना है कि राज्यों को बड़े स्तर पर टेस्ट करने चाहिए। रैट किट्स का इस्तेमाल इसी उद्देश्य के लिए होना था। आईसीएमआर द्वारा इन टेस्टिंग किट्स को वापिस मंगा लिए जाने के साथ ही इसे कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी जल्द से जल्द उपलब्ध करानी चाहिए।

(संध्या रविशंकर की the lede में प्रकाशित इस खबर का अंग्रेज़ी से अनुवाद पीयूष पंत ने किया है।)

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