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सावधान! वायु प्रदूषण से हो रही युवाओं की ह​ड्डियां कमजोर : शोध में हुआ खुलासा

Prema Negi
5 Jan 2020 5:04 AM GMT
सावधान! वायु प्रदूषण से हो रही युवाओं की ह​ड्डियां कमजोर : शोध में हुआ खुलासा
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अब तक वायु प्रदूषण का असर मानसिक स्वास्थ्य, फेफड़े के कैंसर, एक्यूट लोअर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन, पक्षाघात, ह्रदय के रोगों, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पुलमोनरी डिजीज के तौर पर ही बताया जाता था, पर हड्डियों पर असर पहली बार सामने आया है...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

वायु प्रदूषण फैलाने के मामले में कोयला से चलने वाले तापबिजली घर अग्रणी भूमिका निभाते हैं। इनके उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मानक बनाए हैं, जिनका पालन शायद ही कोई तापबिजली घर करता हो।

कुछ वर्ष पहले इनके मानकों को पहले से अधिक सख्त किया गया था और इसे लागू करने की समय सीमा दिसम्बर 2017 थी। जाहिर है, तापबिजली घरों ने इन मानकों के अनुरूप अपने आप को तैयार नहीं किया और इन मानकों के अनुपालन के लिए और समय माँगा। इसके बाद केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

ने दो वर्ष का अतिरिक्त समय, यानी दिसम्बर 2019 तक का, समय बढ़ा दिया। अब यह समय सीमा भी समाप्त हो गयी है, पर तापबिजली घर पहले की तरह ही हवा में प्रदूषण फैला रहे हैं।

दिल्ली में जब भी वायु प्रदूषण की चर्चा होती है, दिल्ली-एनसीआर में चलने वाले तापबिजली घरों की चर्चा जरूर होती है। इसके बाद भी हालत यह है कि इस क्षेत्र में स्थापित कुल 11 बिजली घरों में से केवल एक बिजली घर ने नए मानक के अनुरूप प्रदूषण नियंत्रित करने के उपकरण को स्थापित किया है।

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मानकों से अधिक प्रदूषण फैलाने में सरकारी और निजी क्षेत्र के बिजलीघर शामिल हैं। एक अनुमान के अनुसार देश के आधे से अधिक तापबिजली घर मानकों से अधिक प्रदूषण का उत्सर्जन करते हैं, यही हालत देश में कोयले से चलने वाले 94 प्रतिशत उद्योगों का भी है। पर, प्रदूषण से बेहाल इस देश में तापबिजली घरों समेत कोयला पर आधारित उद्योग स्वतंत्र हैं।

वैसे भी अब देश को वायु प्रदूषण पर चर्चा बिल्कुल बंद कर देनी चाहिए, क्योंकि महान वैज्ञानिकों और विचारकों से भरी इस सरकार के पर्यावरण मंत्री ने दिसम्बर 2019 के पहले सप्ताह में संसद को यह ज्ञान दिया था कि वायु प्रदूषण से ना कोई बीमार होता है, ना किसी की उम्र घटती है और इससे मरने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है।

श्चर्य यह है कि यही मंत्री जी तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन, जिनका आधार ही वायु प्रदूषण है, के प्रभावों से सहमत हैं। जाहिर है, मंत्री जी के इस ज्ञान के बाद अधिक प्रदूषण फैलाने वाले बिजलीघरों पर और उद्योगों पर किसी कार्यवाही करने की कम से कम केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तो हिम्मत नहीं होगी।

प्रदूषण से लोग मरते रहें, पर मंत्री जी को प्रसन्न रखना सबसे जरूरी है। आज के दिन देश ऐसे ही चल रहा है, सरकारी विभाग मंत्रीजी को प्रसन्न रखने का काम करते हैं और मंत्री जी प्रधानमंत्री को खुश रखने का काम करते हैं।

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स मामले में तमाम युद्ध से घिरे अफ़ग़ानिस्तान की सरकार हमारे देश की तुलना में अधिक ईमानदार है। अफ़ग़ानिस्तान के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार दिसम्बर 2019 के अंतिम सप्ताह में काबुल में अत्यधिक वायु प्रदूषण के कारण 18 लोगों की मौत हो गयी।

सी अवधि में वहां के अस्पतालों में सांस से सम्बंधित बीमारियों के साथ लगभग 8800 लोग गए। अफ़ग़ानिस्तान के नेशनल एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी के अनुसार प्रदूषण से मरने का मुख्य कारण गरीबी और बिजली की कमी है। बिजली की कमी होने के कारण गरीब कोयले और दूसरे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों का उपयोग खाना बनाने या फिर सर्दी में कमरे को गर्म रखने के लिए करते हैं। इस कारण वायु प्रदूषण अत्यधिक हो जाता है। लगातार गृहयुद्ध की चपेट में रहने के कारण अफ़ग़ानिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर को बढावा नहीं मिला।

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जेएएमए नेटवर्क ओपन नामक जर्नल के नए अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार वायु प्रदूषण का असर हड्डियों पर भी पड़ता है, इससे इनके खनिजों की मात्रा में कमी आती है और हड्डी का घनत्व कम हो जाता है। अब तक वायु प्रदूषण का असर मानसिक स्वास्थ्य, फेफड़े के कैंसर, एक्यूट लोअर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन, पक्षाघात, ह्रदय के रोगों, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पुलमोनरी डिजीज के तौर पर ही बताया जाता था, पर हड्डियों पर असर पहली बार सामने आया है। इस अध्ययन को बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ के वैज्ञानिकों ने भारत में किया है।

स अध्ययन को हैदराबाद के 28 गाँव में रहने वाले औसतन 35 वर्ष की उम्र के 3717 लोगों पर वर्ष 2009 से 2012 के बीच किया गया है। इस अवधि के दौरान इस पूरे क्षेत्र में पीएम 2.5 की हवा में औसत सांद्रता 32.8 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर थी, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसकी सांद्रता 10 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए।

दिल्ली-एनसीआर में पीएम 2.5 की औसत सांद्रता 150 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर के लगभग रहती है। इस शोधपत्र के मुख्य लेखक ओतावियो रंजानी के अनुसार यदि हैदराबाद में पीएम 2.5 की अपेक्षाकृत कम सांद्रता के बाद भी हड्डियों पर असर स्पष्ट है तो फिर दिल्ली जैसे शहर में इसके व्यापक प्रभाव का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। वायु प्रदूषण का हड्डियों पर प्रभाव सबसे अधिक महिलाओं और 40 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों पर देखा गया है।

तावियो रंजानी के अनुसार एक वयस्क स्वास्थ्य व्यक्ति दिनभर में लगभग दस हजार लीटर हवा सांस के साथ लेता है, जाहिर है यदि इतनी हवा प्रदूषित हो तो इसका असर शरीर के हरेक हिस्से और अंग पर पड़ेगा।

वायु प्रदूषण के तमाम खतरों से आगाह करते अध्ययनों के बाद भी यदि मंत्री जी को लगता है कि इससे कुछ नहीं होता, तो जाहिर है प्रदूषण ऐसे ही बढ़ता रहेगा और प्रदूषण उगलते तापबिजली घर ऐसे ही चलते रहेंगे। संभव है कि प्रदूषण पर आवाज उठाने वाले राजद्रोही और देशद्रोही करार दिए जाएँ।

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