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पर्यावरण

कोरोना से जिन 5 शहरों में सबसे ज्यादा मौतें, वहां वायु प्रदूषण सर्वाधिक : रिसर्च में हुआ खुलासा

Prema Negi
28 April 2020 3:25 PM GMT
कोरोना से जिन 5 शहरों में सबसे ज्यादा मौतें, वहां वायु प्रदूषण सर्वाधिक : रिसर्च में हुआ खुलासा

कोरोना से होने वाली मौतों ने यह स्पष्ट कर दिया कि वायु प्रदूषण से महामारी के समय मृत्युदर भी बढ़ जाती है, पर हमारे देश के लिए इस नतीजे का कोई महत्त्व नहीं, हमारी सरकार लगातार बताती है कि वायु प्रदूषण से न तो कोई बीमार पड़ता है और ना ही कोई मरता है...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। कोरोनावायरस के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह केवल संक्रमित व्यक्ति के पास बिना सावधानी के जाने से ही फैलता है, पर अब नए शोध से पता चला है कि इनका प्रसार हवा, विशेष तौर पर प्रदूषित हवा के साथ भी हो सकता है।

कोई भी संक्रमित व्यक्ति जब छींकता है या खांसता है तो नाक या मुंह से निकलने वाली बड़ी बूंदें 1 मीटर से 2 मीटर के बीच की दूरी तक जमीन पर पहुँच जाती हैं, मगर वायरस से भरी जो बहुत छोटी बूँदें होतीं हैं वे लम्बे समय तक हवा में रहतीं हैं और पार्टिकुलेट मैटर, जिन्हें हम पीएम्10 और पीएम्2.5 के तौर पर जानते हैं, के साथ चिपककर हवा में मिलकर दूर तक जा सकती हैं। संक्रमित व्यक्ति के नाक या मुंह से जो बूँदें निकलती हैं, उनमें कोरोनावायरस भरे होते हैं।

टली की यूनिवर्सिटी ऑफ़ बोलोग्ना के वैज्ञानिकों के एक दल ने लेओनार्दो सेत्ती के नेतृत्व में हवा के नमूनों से कोरोना वायरस को खोज निकाला है। इस दल ने उत्तरी इटली के बेर्गामो प्रांत के एक आवासीय क्षेत्र और एक औद्योगिक क्षेत्र से हवा के अनेक नमूने एकत्रित कर उसमें वायरस का अध्ययन किया।

स दल को हवा के अनेक नमूनों में कोरोना वायरस के जीन और आरएनए मिले। जीन और आरएनए वायरस के अनुवांशिक पदार्थ होते हैं, जिनसे वायरस के प्रकार को पहचाना जा सकता है। जांच में कोई गलती ना हो इस कारण इस दल ने नमूनों की जांच एक स्वतंत्र प्रयोगशाला से भी करवाई।

ध्ययन के निष्कर्ष में कहा गया है कि वायरस की उपस्थिति निश्चित तौर पर हवा में है, पर अभी इसका अध्ययन किया जाना शेष है कि हवा में मिलने वाले वायरस संक्रमण की क्षमता रखते हैं या नहीं और क्या संक्रमण के लिए हवा में इनकी पर्याप्त संख्या है।

लेओनार्दो सेत्ती के दल के अनुसार उत्तरी इटली के क्षेत्रों की हवा में पार्टिकुलेट मैटर की सांद्रता हमेशा ही अधिक रहती है। पहले किये जा चुके अध्ययन के अनुसार बर्ड फ्लू, मीजल्स, फूट-एंड-माउथ डिजीज फैलाने वाले वायरस का संचारण हवा में बहुत दूर तक हो सकता है।

कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति की छींक या खांसी से जो बूंदें निकलती हैं, वे वायरस से भरी होती हैं। बड़ी बूँदें तो अधिकतम 2 मीटर दूरी तक जमीन पर पहुँच जाती है, पर 5 माइक्रोमीटर से छोटी बूँदें हवा में फ़ैल जाती हैं और हवा के बहाव के साथ आगे बढ़तीं हैं।

इंग्लैंड की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर जोनाथन रीड के अनुसार छोटी बूँदें हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर पर जम जाती हैं, इससे इसका घनत्व कम हो जाता है और ये हवा में दूर तक फ़ैल सकतीं हैं। जोनाथन रीड बताते हैं कि बूंदों के साथ पार्टिकुलेट मैटर एक हवाईजहाज जैसा व्यवहार करते हैं, जिसमें यात्री वायरस हैं।

हले के प्रयोगों में भी चीन में हवा में वायरस से भरी बहुत छोटी बूँदें मिली हैं, और यह भी पता चला था कि हवा में देर तक कोविड 19 के वायरस सक्रिय रहते हैं। आयरलैंड स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ कॉर्क के वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर जॉन सोदौ का मानना है कि कोविड 19 के वायरस हवा के साथ फैलें यह पूरी तरह संभव है, पर इनकी सक्रियता और संक्रामकता की विस्तृत जांच की जाने की जरूरत है। वर्ष 2003 के एक अध्ययन के अनुसार सार्स वायरस हवा से आसानी से फैलते हैं और हवा में सक्रिय भी रहते हैं।

टली में किये गए अध्ययन से इतना तो स्पष्ट है कि प्रदूषित हवा, जिसमें पार्टिकुलेट मैटर की सांद्रता अधिक हो, दूर तक कोरोना वायरस को फैलाने में सक्षम है। एक दूसरा तथ्य यह भी है कि कोविड 19 के प्रसार के बाद से दुनियाभर में लॉकडाउन के कारण वायु प्रदूषण का स्तर कम हो रहा है। ऐसा हरेक देश में देखा गया है।

दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी दिल्ली में भी इन दिनों वायु प्रदूषण कम है। पर, 17 से 26 अप्रैल के बीच के एयर क्वालिटी इंडेक्स से इतना स्पष्ट है की इंडेक्स अभी तक 100 से ऊपर ही है और इन दस दिनों में भी पीएम2.5 और पीएम्10 की सांद्रता निर्धारित मानक से अधिक रही है।

सके अतिरिक्त एक दिन कार्बन मोनोऑक्साइड, एक दिन नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और आठ दिन ओजोन की हवा में सांद्रता सामान्य से अधिक रही है। इन दस दिनों में एयर क्वालिटी इंडेक्स न्यूनतम 87 और अधिकतम 139 दर्ज किया गया है, जाहिर है वायु प्रदूषण कम तो है, पर अभी ख़त्म नहीं हुआ है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 21 अप्रैल को “इंपैक्ट ऑफ़ लॉकडाउन (25 मार्च टू 15 अप्रैल) ऑन एयर क्वालिटी” को अपने वेबसाइट पर प्रकाशित किया है। इसके अनुसार लॉकडाउन से पहले (16 से 21 मार्च) की तुलना में लॉकडाउन के बाद दिल्ली की हवा में पीएम2.5, पीएम10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, बेंजीन और सल्फर डाइऑक्साइड की सांद्रता में क्रमशः 46, 50, 50, 37, 47 और 19 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

बसे कम अंतर सल्फर डाइऑक्साइड में दर्ज किये जाने का कारण दिल्ली के आसपास बसे ताप बिजली घरों को बताया गया है, जो लॉकडाउन में भी चल रहे थे। टेरी की २०१८ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि दिल्ली की हवा में सल्फर डाइऑक्साइड की कुल सांद्रता में से 70 प्रतिशत से अधिक का जिम्मेदार आसपास बसे ताप बिजलीघर हैं।

र, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इस रिपोर्ट पर भरोसा करना कठिन है। इसके अनुसार लॉकडाउन के दौरान पीएम्10 की औसत सांद्रता 24 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रही जबकि पीएम2.5 की औसत सांद्रता 39 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर थी। पर, ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता, क्योंकि पीएम10 की सांद्रता किसी भी परिस्थिति में पीएम2.5 से कम नहीं हो सकती। इसी तरह दिल्ली में इन दिनों हवा में ओजोन की बढ़ती सांद्रता चिंता का विषय है, पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इसका जिक्र भी नहीं करता।

साइंस ऑफ़ द टोटल एनवायरनमेंट के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार इटली, स्पेन, फ्रांस और जर्मनी में जहां वायु प्रदूषण अधिक था, वहां कोविड 19 से मृत्यु भी अधिक दर्ज की गई है। जर्मनी स्थित मार्टिन लूथर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यारोन ओगेन की अगुवाई में इस अध्ययन को किया है।

स दल ने इटली, स्पेन, फ्रांस और जर्मनी के कुल 66 प्रशासकीय क्षेत्रों का अध्ययन किया। इस पूरे क्षेत्रों में कोविड 19 से जितनी मृत्यु दर्ज की गयी है, उसमें से 78 प्रतिशत से अधिक मृत्यु केवल 5 क्षेत्रों में हुई और ये पाँचों क्षेत्र वायु प्रदूषण की दृष्टि से सबसे अधिक प्रदूषित थे। इन पाँचों क्षेत्रों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की सांद्रता हमेशा अधिक रहती थी, जिसके दीर्घकालीन प्रभाव से फेफड़े प्रभावित होते हैं।

वायु प्रदूषण से होने वाले अनेक नुकसानों की चर्चा तो लगातार की जाती है, पर इस महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वायु प्रदूषण से महामारी के समय मृत्युदर भी बढ़ जाती है। पर हमारे देश के लिए इस नतीजे का कोई महत्त्व नहीं है, हमारी सरकार लगातार बताती है कि वायु प्रदूषण से न तो कोई बीमार पड़ता है और ना ही कोई मरता है।

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