जनज्वार विशेष

'जो 4 प्रतिशत कश्मीरी भारत सरकार पर करते थे विश्वास, वो भी 370 खत्म होने के बाद देश के साथ अपने जुड़ाव को मानते हैं ख़त्म'

Prema Negi
28 Nov 2019 10:09 AM GMT
जो 4 प्रतिशत कश्मीरी भारत सरकार पर करते थे विश्वास, वो भी 370 खत्म होने के बाद देश के साथ अपने जुड़ाव को मानते हैं ख़त्म
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कश्मीर की युवा लड़कियों, महिलाओं और बुजुर्गों ने उस तनाव को किया साझा जो वे हर बार अनुभव करते हैं, जब इनके भाई रात में पहरा देने जाते हैं, कहते हैं हम मुखबिरों से डरते हैं, हमने कभी इतना डर महसूस नहीं किया...

फ्रेनी मानेकशॉ की रिपोर्ट

"हम गयूर लोग हैं।” (स्वाभिमानी और इज़्ज़तदार लोग) "हम भीख नहीं माँगते। हम सिर्फ अपने अधिकारों की माँग कर रहे हैं, जिनको देने का वादा संसद में किया गया था। कहाँ है वो लोगों का जनादेश?"

म्मू-कश्मीर मुस्लिम लीग के नेता हयात अहमद बट्ट, जो कि आज़ादी का समर्थन करते हैं, ने एक बातचीत के दौरान मुझसे ये सवाल पूछे थे। हमारी बातचीत बुधवार, 16 अक्टूबर को पुलिस द्वारा उन्हें श्रीनगर स्थित सौरा से सटे आंचार नामक इलाके से उठा लिए जाने से करीब दो दिन पहले ही हुई थी।

भारत सरकार द्वारा 5 अगस्त से बड़े पैमाने पर की गयी तालाबंदी के ख़िलाफ़ श्रीनगर के इस बाहरी इलाके में लोगों को साहसी प्रदर्शन करने और निडर बयान देने के लिए बेहद आकर्षक व्यक्तित्व वाले बट्ट ही प्रेरित करते रहे हैं।

नुच्छेद 370 के निरस्त होने और राज्य के विभाजन के बाद से, भारत सरकार द्वारा थोपी गयी तालाबंदी के तहत लगभग दस लाख सैनिकों को घाटी में तैनात किया गया है; रात को छापेमारी की जाती है जिसमें युवकों को उठा लिया जाता है; सैकड़ों को अवैध रूप से हिरासत में रखा हुआ है या फिर आपराधिक प्रक्रिया संहिता के अनुच्छेद 107 या पब्लिक सेफ्टी एक्ट जैसे क्रूर कानूनों के तहत निवारक नज़रबंदी के नाम पर हिरासत में लिया गया है; लोगों के चलने-फिरने पर,आंदोलन और सभा करने पर प्रतिबंध लगे हुए हैं;और फोन और इंटरनेट की सुविधाओं पर भी रोक लगी हुई है।

फोटो ; फ्रेनी मानेकशॉ

स अभूतपूर्व खौफ़ और भय के बीच, आंचार और सौरा ने अपने लोगों के प्रतिरोध के कारण वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। वह कश्मीर में सामान्य स्थिति को लेकर चल रही बहस में भारतीय राज्य और बीबीसी के बीच उपजे विवाद का केंद्र बन गया। आखिरकार भारतीय राज्य को स्वीकार करना पड़ा जो बीबीसी और अल-जज़ीरा जैसे विदेशी मीडिया दोहरा रहे थे कि 10 अगस्त 2019 को विरोध प्रदर्शन हुए थे और सुरक्षा बलों ने भीड़ पर गोलियां व आंसू गैस का इस्तेमाल किया था।

ब से भारतीय मीडिया इस 'मीडिया फ्रेंडली' इलाके में भीड़ लगा रही है, जिससे इस जगह को लिटिल गाज़ा या छोटा पाकिस्तान की उपाधि मिल गयी है। अन्य लोगों ने इस जगह को हिंसक घोषित कर दिया है। और कुछ ने इस आरोप की खिल्ली उड़ाते हुए कि विरोध करने वालों पर पेलेट बंदूक चलाई गई, एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

विरोध की गौरवशाली विरासत

हालाँकि, जैसा कि बट्ट ने बताया कि इस इलाके का एक गौरवशाली इतिहास है, और साथ ही राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता और जागरूकता की विरासत। यहाँ के लोगों के संघर्षों की जड़ें डोगरा शासन के दिनों तक जाती हैं जब बेगार या जबरन मज़दूरी के ख़िलाफ़ आंदोलन किए गए थे।

सौरा शेख अब्दुल्ला का जन्म स्थान है। शेख अब्दुल्ला शॉल का व्यापार करने वाले एक परिवार में पैदा हुए थे। यहीं पर उन्होंने अपने काम को संवारा और कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी- मुस्लिम कॉन्फ्रेंस- और सामंतवाद से लड़ने के उसके इरादे को खड़ा किया। बाद में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस नेशनल कॉन्फ्रेंस में तब्दील हुआ। सौरा से ही रायशुमारी तहरीक या जनमत-संग्रह के लिए लड़ाई शुरू हुई।

1989 में आज़ादी के सशस्त्र संघर्ष के दौरान, नेशनल कॉन्फ्रेंस का यह गढ़ जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जे.के.एल.एफ) और उसके संस्थापक अशफाक मजीद वानी, हामिद शेख और यासीन मलिक का आधार क्षेत्र बन गया। 1996 में यासीन मलिक ने सशस्त्र संघर्ष को त्यागने की घोषणा की और जे.के.एल.एफ एक राजनीतिक पार्टी बन गई।

ट्ट बताते हैं, कि जिस प्रकार इस इलाके के लोगों ने 2008, 2009 और 2010 के एहतिजाज यानी विरोध—प्रदर्शनों में भाग लिया, उससे सशस्त्र संघर्ष से अवामी तहरीक (जन आन्दोलन) की तरफ का बदलाव झलकता है।

2014 में जब श्रीनगर में बाढ़ ने तबाही की थी, तो सौरा के ही युवा थे, जिन्होंने छोटी-छोटी नावों पर सवार हो कर शहर के विभिन्न हिस्सों में लोगों को बचाने का कम किया था। पास के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में एक सामुदायिक रसोईघर स्थापित किया गया, जहाँ डॉक्टरों, मरीज़ों, परिचारकों और अन्य चिकित्सा कर्मचारियों के लिए भोजन तैयार किया जाता था।

र्ष 2016 के बाद के एहतिजाज सामुदायिकता की इस मज़बूत भावना को दर्शाते हैं, जिसके तहत बुजुर्ग, महिलाएँ और बच्चे भी इच्छुक भागीदार बनते हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार संगठित तरीके से उन्होंने प्रतिरोध किया है और रास्तों को बाधित किया है, 2016 के बाद से पुलिस के लिए आंचार में प्रवेश करना असंभव हो गया है।

आंचार में सैन्य-बलों को इलाके में घुसने से रोकने के लिए सड़कों पर बनाए गए गड्ढे (फोटो : फ्रेनी मानेकशॉ)

(अब तक इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि कैसे 16 अक्टूबर को पुलिस ने इलाके में प्रवेश पाकर बट्ट को उठाया और क्या उस दौरान कोई झड़प हुईं थी।)

क अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षक ने मेरा ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया कि इस साल के आम चुनावों में सौरा में शून्य प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ था। उन्होंने कहा कि यह एक राजनीतिक रूप से परिपक्व इलाका है जिसमें विभिन्न राजनीतिक धाराओं के लोग साथ आकर प्रतिरोध के संबंध में एकसमान और एकजुट बात रखते हैं। यही कारण है कि भारतीय समझ असमंजस में पड़ गई है।

मज़दूरों के इस मोहल्ले में सड़क को जाम करने के लिए तत्काल इजाद किए गए तरीके

आंचार में टहलते हुए मैंने पाया कि वहाँ की तंग गलियों का इस इलाके में मज़दूर-वर्ग की आबादी ने बखूबी फ़ायदा उठाया है। पत्थरों, टिन की चादरों और तारों के उपयोग से सड़कों को जाम कर दिया है। गलियों में घुसने के लिए खड़े पुलिस और सीआरपीएफ के बख्तरबंद वाहनों को सड़कों-गलियों में गड्ढे खोद कर प्रवेश करने से रोका जा रहा है।

रात में पुरुष और युवा इन जगहों पर बारी-बारी से पहरा देते हैं, ताकि पुलिस के प्रयासों को विफल किया जा सके। स्थानीय लोगों ने बताया कि अगस्त में ईद की पूर्व संध्या पर, लाउडस्पीकरों से चेतावनी दी गयी थी और हेलीकॉप्टर व ड्रोन के ज़रिए खौफ़ पैदा करने के हत्कंडे अपनाये गए थे। लेकिन समुदाय की ताकत और उनके द्वारा अपनाई गयी रणनीति ने यह सुनिश्चित किया कि ऐतिहासिक मस्जिद जनाब साब, में नमाज़ अदा की जाएगी, जबकि अन्य मस्जिदों में नमाज़ अदा करने नहीं दी जा रही थी।

युवा लड़कियों, महिलाओं और एक बुजुर्ग महिला जिनसे बाद में भी मुलाकात हुई, ने उस तनाव के बारे में बताया जो ये हर बार अनुभव करते हैं, जब इनके भाई रात में पहरा देने जाते हैं। “हम मुखबिरों से डरते हैं। हमने कभी इतना डर महसूस नहीं किया। कैरम खेल रहे एक छोटे लड़के को सादे कपड़े पहने हुई पुलिस उठा कर ले गयी,” उन्होंने कहा।

गर फिर भी वे इस प्रतिरोध का अभिन्न हिस्सा बनने को उत्सुक थे। "हम विरोध प्रदर्शनों में शामिल होते हैं। हम नारे लगाते हैं। हम अपने हिस्से का काम करते हैं, टिन की चादरों को पीट कर पुरुषों को सुरक्षा बल के आने की चेतावनी देते हैं।"

जिस तरह से अपने बच्चों को उठाने के लिए आए सैन्य बालों के वाहनों को रोकने के लिए आंचार-सौरा की महिलाएं सड़कों पर लेट गई थीं, वो 2016 के विरोध प्रदर्शनों में एक उल्लेखनीय विशेषता थी।

स इलाके में मज़दूरों की बड़ी आबादी रहती है। रोज़ी-रोटी के लिए दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर होने के बावजूद लोगों ने संघर्ष की कीमत देना स्वीकारा है। बलिदान की भावना यहाँ स्पष्ट दिखती है। “हमारे पिता एक सूमो शेयर-टैक्सी चलाते हैं। हड़ताल के कारण वह काम नहीं कर पा रहे हैं। बैटरी लगभग ख़त्म हो चुकी है,” एक किशोर ने बताया।

फिलहाल अपने ननिहाल आए हुए गांदरबल के एक कॉलेज का छात्र बताता है कि उसने देखा कि कैसे एक युवती जब दवा खरीदने के लिए मुहल्ले से बाहर निकली, तो उसने हड़ताल तोड़ने के लिए एक विक्रेता को फटकारा। हड़तालें, विरोध दर्ज करने और स्तिथि सामान्य होने के आधिकारिक बयान की ख़िलाफ़त करने के लिए लोगों द्वारा ही लागू की जा रही हैं। पुलिस ने उस युवती को तुरंत गिरफ्तार कर लिया था, जिससे इस संदेह को और बल मिला कि शायद सुरक्षा बलों द्वारा उन विक्रेताओं को हड़ताल के घंटों के दौरान सामान बेचने के लिए प्रलोभन दिया जा रहा है। समुदाय से एक बड़ा प्रतिनिधि-मंडल सौरा पुलिस स्टेशन गया, जहाँ उस युवती को हिरासत में रखा था और यह सुनिश्चित किया कि वह छूट जाए।

सी अफवाहें कि इतनी लंबी अवधि की हड़ताल को चलाने के लिए पाकिस्तान से आर्थिक मदद मिल रही है, का मज़ाक उड़ाते हुए बट्ट ज़कात और बैतुलमाल की इस्लामी धारणा की ओर इशारा करते हैं। (बहुत व्यापक शब्दों में कहें तो, ज़कात धार्मिक दायित्व के रूप में देखा जाने वाला संपत्ति-टैक्स या कर है जो समुदाय के लिए दिया जाता है। बैतुलमाल का अर्थ है एक इस्लामिक अर्थव्यवस्था में एक तरह का राजकोष और संस्थान जिससे ज़रूरतमंद और गरीबों के लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है।)

फोटो ; फ्रेनी मानेकशॉ

"हम गोश्त खाते हैं। हम सुनिश्चित करते हैं कि शादियाँ हो सकें। हम विक्रेताओं और ठेलों पर सामान बेचने वालों की मदद कर रहे हैं। एक महिला, जो आगरा जेल में क़ैद अपने बेटे से मिलने जाना चाहती थी, उनकी हवाई टिकट हमने करवाई। हमने यहाँ एक व्यवस्था बनाई है। यह एक इन्सानी जज़्बा है।”

तालाबंदी के 110 से ऊपर दिन में जो बात उभर कर आई है, वो ये है कि किस तरह इस जज़्बे को आंचार से आने वाली छवियों से मज़बूती मिली है, जिन्हे बहुत कल्पनाशील रूप से रचा गया है। एक बैनर में लिखा है, 'इमरान खान आपका स्वागत है'. यह संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनके भाषण के बाद है। 'आज़ादी' या 'छोटा पाकिस्तान' के नारे दीवारों पर लिखे हुए हैं। बुरहान वानी, जिसकी हत्या के बाद 2016 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे, और शहीद के रूप में देखे जाने वाले अन्य मिलिटेंटों की तस्वीरें बंद पड़ी दुकानों के शटर पर चिपकी हुई हैं। शुक्रवार को हुए विरोध प्रदर्शन में, एक युवक अपने सिर के चारों ओर कांटेदार तार लगा कर निकला। वहाँ की स्थिति की यह एक बेहद शक्तिशाली नुमाइंदगी थी जो वायरल हो गई।

विदा लेते वक़्त बट्ट ने जो कहा था, वह मुझे याद आता है, "इसे लिख लीजिए। जो चार प्रतिशत लोग हुकूमत-ए-हिंद (भारतीय राज्य का शासन) में विश्वास करते भी थे, वो भी अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से भारत के साथ अपने जुड़ाव को ख़त्म मानते हैं। हम एक जनमत संग्रह चाहते हैं। हम इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम इसके लिए जेल भी जाएँगे। सभी से पूछ लीजिये, जो कठुआ में हैं, डोगरा लोगों से। हम कह रहे हैं कि इसके बाद जो फ़ैसला होगा उसे हम स्वीकारने को तैयार हैं।”

(फ्रेनी मानेकशॉ एक पत्रकार हैं। उनका यह लेख raiot.com पर 28 अक्टूबर 2019 को प्रकाशित हुआ था। उनकी अनुमति के साथ, इस लेख का अनुवाद कश्मीर ख़बर ने किया है।)

मूल लेख :ANCHAR’S PROUD LEGACY OF DEFIANCE

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