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शिक्षा

बिना कापी जांचे मेडिकल छात्र को अंबेडकर यूनिवर्सिटी ने कर दिया फेल

Prema Negi
23 May 2019 1:33 PM GMT
बिना कापी जांचे मेडिकल छात्र को अंबेडकर यूनिवर्सिटी ने कर दिया फेल
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गलत मूल्यांकन पर आगरा विश्वविद्यालय पर कोर्ट ने लगाया एक लाख रुपये का हर्जाना, आरटीआई में कॉपियां मांगने पर मनमाने तरीके से कॉपी जांचने का हुआ खुलासा, उत्तर पुस्तिका में जांचा गया था सिर्फ तीन प्रश्नों को और मेधावी मेडिकल छात्र को कर दिया गया था फेल...

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक मेधावी मेडिकल छात्र की उत्तरपुस्तिका को जांचे बिना मनमाने ढंग से नम्बर देकर फेल कर दिया गया, नहीं न, लेकिन यह हकीकत है। यह मामला डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा का है। याची छात्र देवेश गुप्ता के एसआर मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस का छात्र है। उसे एक एक सेमेस्टर की परीक्षा में फिजियोलॉजी विषय के पेपर में मात्र छह अंक देकर फेल कर दिया गया। उसने पुनर्मूल्यांकन की मांग की, जिसे विश्वविद्यालय ने खारिज कर दिया।

आरटीआई में कॉपियां मांगने पर पता चला कि उसकी उत्तर पुस्तिका में सिर्फ तीन प्रश्नों को जांचा गया, उनमें भी उसे मात्र दो दो अंक दिए गए। शेष प्रश्नों के उत्तर जांचे ही नहीं गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर उत्तर पुस्तिका की दो प्रतियों की जांच इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसरों और एक प्रति की किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर ने जांच की। देवेश को औसत 20 अंक मिले।

मेडिकल छात्र की कॉपी बिना जांचे उसे एक विषय में फेल कर देने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस राजेंद्र कुमार की पीठ ने ने डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा पर एक लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। पीठ ने कहा है कि हर्जाने की राशि पीड़ित छात्र को अदा की जाए तथा बाद में विश्वविद्यालय चाहे तो संबंधित परीक्षक के खिलाफ जांच कर उससे रकम वसूल सकता है।

लापरवाही पूर्वक मूल्यांकन कर होनहार छात्र के भविष्य से खिलवाड़ को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए विश्वविद्यालय पर कठोर टिप्पणी की है। पीठ ने देवेश की अंकतालिका और परिणाम को सही करने और उसके अनुसार आगे की परीक्षाओं में बैठने की अनुमति देने का आदेश भी दिया है।

मेडिकल छात्र देवेश कुमार गुप्ता की याचिका (रिट याचिका सिविल संख्या - 871/2019) पर फैसला सुनाते हुये जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस राजेंद्र कुमार की पीठ ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए हैरानी जताई कि इतने लापरवाह और अयोग्य परीक्षक की नियुक्ति कैसे कर दी गई, जिसने छात्र की कॉपी जांचे बिना ही उसे फेल कर दिया।

पीठ ने कहा कि ऐसे परीक्षक न तो ईमानदार हैं और न ही उनमें योग्यता है। पीठ का कहना था कि हमारी शिक्षा प्रणाली में छात्र की योग्यता उसे परीक्षा में प्राप्त अंकों से आंकी जाती है। पूरी पढ़ाई के दौरान उसने जो कुछ भी सीखा है उसे तीन घंटे की परीक्षा में दिखाना होता है। इसलिए छात्र का भविष्य उन परीक्षकों के हाथों में होता है जिनको मूल्यांकन का जिम्मा सौंपा जाता है।

पीठ ने कहा कि एक भी छात्र के भविष्य से किसी भी कारण से समझौता नहीं किया जा सकता है। सभी परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिका का उचित और प्रभावी मूल्यांकन करने के लिए विश्वविद्यालय का एक वैधानिक दायित्व भी है। प्रत्येक छात्र को ईमानदार, सक्षम और अच्छी तरह से प्रशिक्षित कुशल शिक्षकों के हाथों में अपने काम का आकलन करके अपने प्रदर्शन के स्तर के बारे में जानने का अधिकार है। प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान को इस मामले को देखना चाहिए और उचित और सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए ताकि इस तरह की घटनायें बिल्कुल न हो, अन्यथा सामान्य रूप से देश के लोग और विशेष रूप से छात्र समुदाय, सिस्टम में विश्वास खो सकते हैं और यह देश में संपूर्ण शिक्षा प्रणाली के लिए एक काला दिन होगा। इसके परिणाम कहर ढा सकते हैं।

पीठ ने यह निर्देश भी दिया है कि पिछले तीन वर्षों में विश्वविद्यालय की परीक्षा में सम्मिलित छात्र यदि पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं तो उनका मना नहीं किया जाए। विश्वविद्यालय इस आधार पर पुनर्मूल्यांकन से इंकार नहीं कर सकता कि उनके यहां ऐसा नियम नहीं है।

पीठ ने कहा कि विश्वविद्यालय से अपेक्षा है कि भविष्य में इस प्रकार के अयोग्य और गैरजिम्मेदार परीक्षक की नियुक्ति नहीं करे। किसी भी एक छात्र के भविष्य से किसी हालत में समझौता नहीं किया जा सकता है। हमें उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे गैरजिम्मेदार और अज्ञानी परीक्षक नियुक्त नहीं होगा।

प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा को भी फैसले की प्रतियां भेजने का निर्देश दिया है और उनसे अपेक्षा की है कि मूल्यांकन करने वाले परीक्षकों की नियुक्ति करने में सावधानी बरतें और योग्य परीक्षकों को ही यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपें।

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