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कैंपस में 'देवी' और सड़क पर 'माल' बन जाती हैं बीएचयू की लड़कियां

Janjwar Team
23 Sep 2017 5:52 PM GMT
कैंपस में देवी और सड़क पर माल बन जाती हैं बीएचयू की लड़कियां
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बीएचयू में स्त्रियां समग्र रूप में ‘देवी’ होती हैं। हॉस्टल के बाहर साइकिल से गुजर रही लड़की ‘माल’ होती है और लड़कों का प्रपोजल ठुकराने वाली लड़की ‘साली रंडी’ होती है...

उमाशंकर सिंह, युवा फिल्म लेखक

बीएचयू में लड़के-लड़की जब 12वीं पास करके आते हैं तब वे भी टीनएजर ही होते हैं। ठीक से युवा भी नहीं बने होते। वे अपने-अपने परिवेश और अपनी-अपनी सामाजिक बुराई के साथ आते। बीएचयू अपने छात्रों के कास्ट, जेंडर और दूसरे पूवग्रहों वाली उनकी बुराई से ठीक से डील नहीं करती, बल्कि उन्हें और बढ़ावा देती।

वे लड़कों को और लड़का (मर्द), लड़कियों को और लड़की (औरत), ब्राह्मणों को और ब्राह्मण और राजपूतों को और राजपूत बनाती है। दलितों को और दबा हुआ बनाने पर जोर देती। वहां छात्रों से लेकर अध्यापकों तक के हर जाति के अलग अलग गुट हैं।

अपनी खास जाति के वजह से, जिनसे आप मिले भी नहीं हो, आप उनके करीब होते हैं, उनकी सुरक्षा में होते हैं। जो इनसे बाहर ऑपरेट करते उन्हें तरह-तरह के व्यंग्य बाणों से घायल किया जाता है। निशाने पर लिया जाता है। बीएयच प्रशासन लड़कियों को लड़कों और लड़कों को लड़कियों से अलग रखने का पूरा इंतजाम रखता है। कुछ कोर्सों को छोड़ दें तो कोएड एजुकेशन बीए के लेवल पर बीएचयू में नहीं है।

बीएचयू के भीतर लड़कियों के अलग कॉलेज हैं। इसके बाहर लड़के-लड़कियों के जो कॉमन प्लेटफार्म हो सकते हैं वहां लड़के-लड़की अलग-अलग रो में एक सुरक्षित दूरी पर नजर आते। लड़के-लड़की का साथ होना आज भी बीएचयू में एक सहज दृश्य नहीं है। लेकिन लड़कियों को छेड़ना बीएयचू में एक स्वाभाविक बात है।

तीसेक हजार छात्रों वाले बीएचयू में आज भी सबसे ज्यादा झगड़ा लड़के लड़कियों के लिए करते हैं। किसी दूसरे शहर से आई लड़की के साथ यदि कोई लड़का घूमता पाया जाता है तो यह काफी है कि उस लड़की के शहर के दूसरे लड़के, जिसे वो लड़की जानती भी नहीं है, उसके साथ पाए जाने वाले लड़के का सर फोड़ दें।

बीएचयू में सामान्यतः स्त्रियां समग्र रूप में ‘देवी’ होती हैं। हॉस्टल के बाहर साइकिल से गुजर रही लड़की ‘माल’ होती है और लड़कों का प्रपोजल ठुकराने वाली लड़की ‘साली रंडी’ होती है। अव्वल तो बीएचयू में लड़कियां गर्लफ्रेंड बनती नहीं, बनती तो वह लड़कों के लिए एक दोस्त से ज्यादा शील्ड होतीं जिसे लड़के शान से चमकाते हैं।

बीएचयू का आधुनिकता से संघर्ष का रिश्ता है। 2000 के आसपास जब हम बीएचयू में बीए में थे तब क्लीन शेव वाले लड़कों को 'मकालू' कहने का चलन था। बीएचयू में लड़कियां छेड़ना कोई वैयक्तिक उद्यम नहीं, बल्कि सामूहिक कार्रवाई है। कलेक्टिव अफर्ट है। लड़के शाम को समूह बनाके, तैयार होके, कॉम्बिंग करके, डियो लगा के लड़कियां छेड़ने लंका निकलते हैं जिसे लंकेटिंग कहा जाता है।

इस तरह आप बीएचयू में सहमे हुए किशोर की तरह भले ही घुसते हों पर निकलते मादा भक्षी मर्द बनकर ही हैं। बीच में कुछ अच्छे अध्यापक, कुछ अच्छे साथी मिल जाएं तो आपको जीवन जीने की नई दृष्टि मिलती हैं, वर्ना बीएचयू मोटा मोटी आपको ऐसा सोशल प्रोडक्ट बना देता है जो सोसाइटी तो छोड़िये अपने घर वालों के लिए भी हानिकारक होता है।

इसलिए बीएचयू की लड़कियों का ये आंदोलन भले ही अपन सुरक्षा के लिए हो, पर ये लड़कियों से ज्यादा लड़को के हित का अांदोलन है। क्योंकि ये लड़कों को जानवर से इंसान बनाने का भी आंदोलन है और मेरा इस आंदोलन को इसलिए पुरजोर समर्थन है।

(बरास्ते पत्रकारिता फिल्मों में गए युवा फिल्म लेखक उमाशंकर सिंह बीएचयू के पूर्व छात्र रहे हैं। 2015 में आई सोनम कपूर अभिनीत 'डॉली की डोली' लिख चुके हैं और मुंबई में रहते हैं।)

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