दुनिया में जितने भी बड़बोले शासक वाले देश हैं, जिनमें अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, ब्राज़ील और भारत प्रमुख हैं, कोविड 19 लगभग एक ही जैसा तेजी से फ़ैल रहा है, ये सभी देश समस्या पर ध्यान देने के बदले जनता को गुमराह करने के रोज नए बहाने ढूँढते हैं…

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। अमेरिका में 15 लाख से अधिक व्यक्ति कोविड 19 की चपेट में हैं और इससे मरने वालों का आंकड़ा एक लाख पार कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति के पास कोविड 19 से निपटने का एक ही रास्ता है, विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन पर रोज बरसना, और वह यह काम पूरी मुस्तैदी से कर रहे हैं। इस समय दुनिया में जितने भी बड़बोले शासक वाले देश हैं, जिनमें अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, ब्राज़ील और भारत प्रमुख हैं, कोविड 19 लगभग एक ही जैसा तेजी से फ़ैल रहा है और ये सभी देश समस्या पर ध्यान देने के बदले जनता को गुमराह करने के रोज नए बहाने ढूँढते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की सालाना बैठक में (जिसमें सभी सदस्य देशों के प्रमुख शिरकत करते हैं) अमेरिकी राष्ट्रपति ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को धमकी दी है कि अपने कामकाज के तरीके में आमूल परिवर्तन करे और चीन की तरफदारी करना अगले 30 दिनों के भीतर बंद करे नहीं तो अमेरिका इस संगठन को हमेशा के लिए छोड़ सकता है। इस बार यह बैठक कोविड 19 के कारण वर्चुअल तरीके से आयोजित की गई है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक तेद्रोस अधनोम घेब्रेयेसुस के अनुसार चीन और अमेरिका में इस मुद्दे पर बढ़ाते तनाव को देखते हुए उन्होंने ट्रम्प और शी जिनपिंग दोनों को आमंत्रित किया था, जिससे आपस में बात कर तनाव कुछ कम हो सके, पर ट्रम्प ने अपना भाषण नहीं दिया। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने स्वयं भाषण देकर चीन का पक्ष दुनिया के सामने रखा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने तमाम आरोपों के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक को चार पृष्ठों का एक धमकी भरा पत्र भेजा है।

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क महीने पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन को सबसे अधिक आर्थिक सहायता देने वाला देश अमेरिका ने इसके अनुदान को रोक दिया है। यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग में स्वास्थ्य विशेषज्ञ देवी श्रीधर ने कहा है कि ऐसे समय जब पूरी दुनिया को विश्व स्वास्थ्य संगठन की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब इसके अनुदान को रोकना और इससे बाहर निकालने की धमकी देना ट्रम्प प्रशासन की अदूरदर्शिता ही दिखाता है। अधिकतर विशेषज्ञों के अनुसार ट्रम्प प्रशासन इन हरकतों से केवल अपनी नाकामियों पर पर्दा डाल रहा है, साथ ही विश्व को पहले से अधिक असुरक्षित भी बना रहा है।

राष्ट्रपति ट्रम्प की सोच के ठीक उल्टा अमेरिकी नागरिकों की सोच है। हाल में ही शिकागो यूनिवर्सिटी के डिविनिटी कॉलेज और एसोसिएटेड प्रेस के सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स ने संयुक्त तौर पर अमेरिकी नागरिकों के बीच एक सर्वेक्षण कराया। इसमें पूछा गया था कि उनके अनुसार कोविड 19 को किसने शुरू किया। इस सर्वेक्षण के अनुसार दो-तिहाई से अधिक अमेरिकियों ने कहा कि यह ईश्वर का सन्देश है। ईश्वर ने यह बताने के लिए सन्देश भेजा है कि हमें अपने रहन-सहन के तरीकों में आमूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। लगभग 31 प्रतिशत अमेरिकी तो केवल ईश्वर को ही इसकी उत्पत्ति का केंद्र मानते हैं – इसमें 43 प्रतिशत प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियन हैं तो 28 प्रतिशत कैथोलिक।

र्ण भेद के अनुसार अमेरिका में अश्वेत, लैटिनो (भूरे वर्ण के) और श्वेत हैं। अश्वेतों में ४७ प्रतिशत आबादी, लैटिनो में 37 प्रतिशत और श्वेतों में 27 प्रतिशत आबादी कोविड 19 को केवल ईश्वर की देन मानती है। पूरी आबादी में 2 प्रतिशत लोग ऐसे भी हैं, जो पहले ईश्वर पर विश्वास नहीं करते थे, पर अब करने लगे हैं।

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दूसरी तरफ एक प्रतिशत आबादी पहले ईश्वर में विश्वास करती थी, पर अब नहीं करती। कुल मिलाकर 82 प्रतिशत अमेरिकी ईश्वर में भरोसा करते हैं, और इसमें से 26 प्रतिशत का ईश्वर में भरोसा कोविड 19 के बाद अधिक दृढ हो गया है। अमेरिका की पूरी आबादी में से 55 प्रतिशत से अधिक का विश्वास है कि ईश्वर उन्हें कोविड 19 के संक्रमण से बचा लेगा। यदि ट्रम्प के बयानों और अमेरिकी नागरिकों के विश्वास को एक साथ देखें तो इतना तो स्पष्ट होता है कि अधिकतर नागरिक अपने राष्ट्रपति के बयानों पर ही भरोसा नहीं करते।


Edited By :- Janjwar Team