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राजनीति

देश की सर्वोच्च न्यायपालिका का फरमान जानवर की अहमियत है इंसान से ज्यादा

Prema Negi
24 Sep 2018 6:42 PM GMT
देश की सर्वोच्च न्यायपालिका का फरमान जानवर की अहमियत है इंसान से ज्यादा
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जिस समय बाघों के लिए कालागढ़ को ढहाया जा रहा था, उसी दौरान कालागढ़ से मात्र 7-8 किमी दूरी पर बाघ व तेंदुए ने अलग-अलग घटनाओं में उ.प्र जिला बिजनौर के गांव नारायणवाला, केहरीपुर व बनियावाला ने 3 किसानों पर उनके खेत में ही हमला कर घायल कर दिया था....

कालागढ़ से मुनीष कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट

भारत सरकार की बाघ संरक्षण परियोजना उत्तराखण्ड स्थित कार्बेट टाइगर रिजर्व की दक्षिणी सीमा पर स्थित कालागढ़ निवासियों के लिए कहर बनकर टूटी है। 60 के दशक में बिजली उत्पादन व खेतों की सिंचाई के लिए बनाए गये कालागढ़ डाम के लिए निर्मित रिहाईशी इलाके को देखकर लगता है कि यहां पर कोई भयंकर जलजला आया है, हर तरफ ध्वस्त भवनों के मलवे के ढेर दिखाई दे रहे हैं।

कालागढ़ को उजाड़ने के लिए सरकार ने अपने ही द्वारा बनाए गये कानून व नियमों को धता बता दिया है। सुप्रीम कोर्ट में कालागढ़वासियों को विस्थापित कर काशीपुर के पास खुरपिया फार्म में बसाए जाने व पुर्नवास के लिए 48.09 करोड़ रुपए खर्च किए जाने हलफनामे को भी ताक पर रख दिया गया।

वाइल्ड लाईफ प्रोटेक्शन सोसायटी की याचिका पर फैसला देने वाली राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण NGT ने एक वर्ष पूर्व दि. 21 सितम्बर, 2017 को अपने आदेश में कालागढ़ सिंचाई कालोनी को एक वर्ष के भीतर ध्वस्त करने का आदेश दिया था।

NGT के आदेश के अनुपालन में 13 सितम्बर 2018 को कालागढ़ में 346 हैक्टेयर में बसी सिंचाई कालोनी की भूमि को कार्बेट टाइगर रिजर्व में हस्तांरित करने की कार्यवाही शुरु की गयी। जनता के लिए अपने ही देश का प्रशासन, पुलिस व सरकार दुश्मन बन गयी। 24 घंटे के अल्टीमेटम के बाद लोगों को नोटिस देने की प्रक्रिया का ठीक से अनुपालन भी नहीं किया गया और 15 सितम्बर से जेसीबी ने विध्वंस शुरू कर दिया।

पुलिस थाना, सिंचाई विभाग का भवन, डाकघर को देखते ही देखते ढहा दिया गया। स्टेट बैंक को खाली करने के लिए 3 माह का समय दिया गया है। लोगों को आवास टूटने से बचाने व पुनर्वास का भरोसा देने वाले सत्ता पक्ष भाजपा व विपक्षी कांग्रेस के नेता मौके से नदारद हो गये। दुख की इस घड़ी में केवल बदकिस्मती ही उनके साथ थी।

मित्र पुलिस, प्रशासन व वन विभाग ने एक तरफ से कहर ढहाना शुरू कर दिया। औरतें—बच्चे बिलख कर रह गये। विकास की नई इबारत लिख दी गयी। देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने फरमान सुना दिया जानवर की अहमियत इंसान से ज्यादा है। देश के 50 टाइगर रिजर्व का 71 हजार वर्ग किलोमीटर का एरिया भी अब बाघों के लिए कम है, इसे बढ़ाया जाना चाहिए।

उत्तराखंड में कार्बेट टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल 1318 वर्ग किलोमीटर है। इतने बड़े क्षेत्रफल के वाबजूद भी बाघों को बचाने के लिए कालागढ़ सिंचाई कालोनी की मात्र 346 है। भूमि जरूरी है। बाघ बचने चाहिए, इंसान जाएं भाड़ में। इसके लिए सरकारी भवन, बैंक, आवास दुकाने सबकी बलि ली जाएगी।

उत्तर की तरफ बने आवासों की महिलाओं ने अपने आवासों को बचाने के लिए कुछ भी कर गुजरने का संकल्प लेकर, छतों पर लाठी-डंडे के साथ मोर्चा सम्भाल लिया। इनका आक्रोश देखकर पुलिस-प्रशासन पीछे हट गया और उनके आवास फिलहाल बच गये हैं।

देखें वीडियो :

समय बाघों के लिए कालागढ़ को ढहाया जा रहा था, उसी दौरान कालागढ़ से मात्र 7-8 किमी दूरी पर बाघ व तेंदुए ने अलग-अलग घटनाओं में उ.प्र जिला बिजनौर के गांव नारायणवाला, केहरीपुर व बनियावाला ने 3 किसानों पर उनके खेत में ही हमला कर घायल कर दिया था।

कालागढ़ बसने व उजड़ने की कहानी

60 के दशक में हरित क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा रामगंगा डाम का निर्माण प्रारम्भ किया गया। इसके लिए सरकार ने वन विभाग की 8998.15 हैक्टेअर भूमि सिंचाई विभाग को हस्तांरित की, जिसकी एवज में 2.26 करोड़ रु वन विभाग को दिये गये थे।

1974 में 127.5 मीटर ऊंचा मिट्टी व पत्थर से निर्मित बांध बनकर तैयार हुया, जिससे न केवल सहारनपुर से लेकर इलाहाबाद तक लाखों हैक्टेयर भूमि सिंचित हुयी बल्कि खाद्यान उत्पादन में भी भारी वृद्धि हुयी। इस बांध पर 3 टरबाईन वाला एक 198 मेगावाट उपादन क्षमता वाले विद्युत गृह का निर्माण किया गया, जिसमें लगभग 50 करोड़ यूनिट बिजली का सालाना उत्पादन होता है।

सिंचाई विभाग की उक्त 8998 हैक्टेयर भूमि में से 346 हैक्टेयर भूमि पर टाउनशिप बसाई गयी। डाम पर कार्यरत भारी मशीनों की कार्यशाला, व पुर्जो को रखने के लिए भंडार व बड़े पुर्जों के निर्माण की फेब्रिकेशन शाॅप भी इसी भूमि पर है। 1974 में जब कालागढ़ टाउनशिप बनकर तैयार हुयी तब वहां की आबादी 35-40 हजार के आसपास थी।

इस परियोजना की आयु 100 वर्ष है। जिसमें से अभी मात्र 44 वर्ष ही पूरे हुए हैं। उसकी अभी 56 वर्ष की आयु शेष है। इसके बावजूद भी बीच में ही 8998 हैक्टेयर भूमि में से मात्र 346 हैक्टेयर भूमि वन विभाग को हस्तारित कर दी गयी, जो कहीं से भी जायज नहीं है।

1974 में उक्त परियोजना के पूरा हो जाने के बाद कुछ कर्मचारियों की छंटनी कर दी गयी और कुछ कर्मचारी दूसरी जगहों के लिए ट्रांसफर कर दिये गये। इसके कारण कालागढ़ सिंचाई कालोनी के काफी आवास खाली हो गये। 1987 में खाली आवासों को वन विभाग को वापस दे दिया गया।

कालागढ़ निवासी वी.एन सिंह कहते हैं कि कानूनन इन मकानों को गिराकर वापस किया जाना चाहिए था, परन्तु इन्हें ऐसे ही वापस कर दिया गया। उनका कहना है कि उन मकानों का मलबा नीलाम कर प्राप्त धनराशि सरकारी खजाने मे जमा करने की जगह मकानों का मलबा वन अधिकारियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया।

एनजीओ और न्यायपालिका की भूमिका

कालागढ़ के लोग न्यायालयों में जनहित याचिका लगाने वाली गैर सरकारी संगठनों को ईस्ट इंडिया कम्पनी से भी ज्यादा खतरनाक मानते हैं। उनका कहना है कि सीबीआई कि रिपोर्ट भी है कि इन एनजीओ को विदेशों से धन मिलता है। कालागढ़ के लोगो की लड़ाई में शामिल विश्वनाथ यादव कहते हैं कि अर्जुन थापर व कुछ अन्य द्वारा 1994 में वाइल्ड लाईफ प्रोटक्शन सोसायटी आफ इंडिया का गठन किया गया, जिसका कार्यालय भी थापर हाउस में ही है।

1999 में उक्त एनजीओ द्वारा कालागढ़ बांध के डाउन स्ट्रीम में समस्त ढांचा ढहाने एवं भूमि वन विभाग को वापस किए जाने सम्बन्धी याचिका उ.प्र हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में डाली गयी। लखनऊ बेंच के आदेश पर वर्ष 1999 में 200 परिवारों को उनके आवास ध्वस्त कर हटा दिया गया।

उत्तराखंड राज्य बनने के पश्चात उक्त याचिका को उत्तराखंड हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दिया गया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा सेन्ट्रल एम्पावर्ड कमटी (सी.ई.सी) की स्थापना की गयी। इस कमेटी में एनजीओ प्रतिनिधियों का वाहुल्य है तथा इस कमेटी को असीमित अधिकार दिये गये हैं। इस कमेटी ने कालागढ़ को तबाह बर्बाद करने के लिए कानूनी व गैर कानूनी हथकंडे अपनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।

कालागढ़ निवासियों ने बताया कि सीईसी ने श्रीदेवी गोयनका को जांच अधिकारी नियुक्त किया। जांच अधिकारी ने कालागढ़ में आकर मात्र सिंचाई, बिजली व वन अधिकारियों का ही पक्ष सुना और प्रभावित लोगों से बात तक नहीं की।

सीईसी ने गोयनका की रिपोर्ट के आधार पर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को 30 अप्रैल, 2004 को प्रस्तुत कर दी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2 दिसम्बर 2013 को सुनवाई करते हुए कहा कि कार्बेट टाइगर रिजर्व में किसी को भी अतिक्रमण की अनुमति नहीं हो सकती है। कालागढ़ व्यापार मंडल के वकील के तर्क करने पर कि 40 वर्षों से रह रहे लागों का क्या होगा। न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार से 6 सप्ताह के भीतर जबाब मांगा कि वह उनका पुर्नवास करने की स्थिति में है अथवा नहीं।

दो वर्ष बाद उत्तराखंड सरकार ने शपथ पत्र प्रस्तुत किया कि सरकार द्वारा खुरपिया फार्म काशीपुर में भूमि तलाश ली गयी है तथा आवासों के निर्माण हेतु 48.09 करोड़ रु स्वीकृत किए गये हैं। चूंकि कालागढ़ का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2016 में NGT को ट्रांसफर कर दिया था तो पुर्नवास का शपथ पत्र सरकार द्वारा NGT में भी दाखिल किया गया। NGT ने आवासीय कालोनी में रह रहे लोगों के पुर्नवास के मामले को लेकर सुनवाई नहीं की तथा उत्तराखंड के मुख्य सचिव पर 3 लाख रुपए का जुर्माना भी लगा दिया।

इस बीच कार्बेट टाइगर रिजर्व की स्थापना सम्बन्धित अधिसूचना की वैधानिकता को चुनौती देते हुए, उसे निरस्त करने हेतु कालागढ़ भाजपा बौद्धिक प्रकोष्ठ के मंडल अध्यक्ष वी.एन.सिंह यादव द्वारा अप्रैल 2016 में उत्तराखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका प्रस्तुत की गयी, जिसका सरकार ने 2 वर्ष तक जवाब दाखिल नहीं किया।

12 जून 2018 को अचानक सरकार द्वारा जबाब दाखिल किया गया और मामला 14 जून को सुनवाई पर आ गया। याचिकाकर्ता को न्यायालय ने प्रत्युत्तर (रिजाइंडर) दाखिल करने का समय न देते हुए फैसला सुना दिया गया कि याचिकाकर्ता समेत सभी अवैध निवासियों को 3 सप्ताह के भीतर बाहर निकाल दिया जाए, याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका निजी लाभ के लिए डाली है जिससे न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होने के कारण 5 लाख के जुर्माने का आदेश दिया गया।

आदेश में कहा गया कि मुख्य सचिव कार्बेट टाइगर रिजर्व व राजाजी नेशनल पार्क में हुयी बाघों की मौत की मजिस्ट्रेट से जांच कराएं, निदेशक बाघों का बिसरा सुरक्षित रखें तथा कार्बेट टाइगर रिजर्व में ड्रोन व सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।

न्यायालय के आदेश से हक्के-बक्के याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने 5 लाख के जुर्माने को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि किसी अवैध निवासी को कानून के अनुसार ही निकाला जाएगा। न्यायालय की उक्त कार्यवाहियों में कार्बेट टाइगर रिजर्व की स्थापना सम्बन्धित अधिसूचना की वैधानिकता का मामला गुम होकर रह गया है।

नेताओं के भरोसा भी काम न आया

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से कांग्रेस व भाजपा की सरकारे सत्ता में रह चुकी हैं परन्तु किसी ने भी पुर्नवास की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाई। कालागढ़ निवासी अपनी लड़ाई न्यायालय के साथ सड़कों पर आगे बढ़ाने की जगह नेताओं के आगे-पीछे घूमने व कानूनी कार्यवाही तक ही सीमित रहे।

3 वर्ष पूर्व ईको सेंसिटिव जोन विरोधी संघर्ष समिति के संयोजक ललित उप्रेती व पीसी जोशी के नेतृत्व में एक दल ने कालागढ़ पहुंचकर जनता से संघर्ष आगे बढ़ाने का आह्वान किया था। तब कालागढ़ के निवासी कांग्रेस व भाजपा नेताओं के सम्पर्क में थे। उन्हें भरोसा था कि सरकार व नेता उन्हें उजड़ने नहीं देंगे और उन्हें बचा लेंगे। आज कालागढ़वासियों का भरोसा राजनीतिक दलों से टूट चुका है।

जनहित याचिकाओं के माध्यम से जनता को उजाड़ देने का मामला कालागढ़ से भी आगे बढ़ चुका है। भाजपा के राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी द्वारा उत्तराखंड उच्च न्यायालय में लगायी गयी जनहित याचिका पर, न्यायालय कार्बेट टाइगर रिजर्व से वन गूजरों व दलित भूमिहीनों के गांव सुन्दरखाल को हटाने का आदेश दे चुका है। वन गूजरों के मामले में तो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दे दिया है, परन्तु सुन्दरखाल के लोग संगठित होकर संघर्ष आगे बढ़ाने की जगह कांग्रेस भाजपा के नेताओं के भरोसे ही हैं।

यदि वे लोग कालागढ़ के मामले से सबक नहीं लेंगे तो आने वाला समय सुन्दरखाल के लोगों के लिए भी बहुत मुश्किलों से भरा हो सकता है, क्योंकि सुन्दरखाल की भूमि भी कार्बेट टाइगर रिजर्व को दिये जाने की कार्यवाही चल रही है।

(मुनीष कुमार समाजवादी लोक मंच के सहसंयोजक हैं।)

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