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राजनीति

डिजिटल इंडिया का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला मध्य प्रदेश में

Prema Negi
13 July 2018 2:43 PM GMT
डिजिटल इंडिया का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला मध्य प्रदेश में
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मोदी सरकार ने कहा था डिजिटल इंडिया के आने के बाद घोटाले नहीं होंगे, लेकिन मध्य प्रदेश से हो रहे खुलासे बताते हैं कि डिजिटल होना ही घोटाले का असल और आसान कारण बना है...

जावेद अनीस की रिपोर्ट

घोटालों के लिए बदनाम रहे मध्य प्रदेश की ताजा पेशकश ई-टेंडर घोटाला है, यह अपने तरह का अनोखा घोटाला है जिसमें भ्रष्टाचार रोकने के लिये बनायी गयी व्यवस्था को ही घोटाले का जरिया बना लिया गया।

जिस तरह से इस पूरे खेल को अंजाम दिया गया वह डिजिटल इंडिया पर ही गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। माना जा रहा है कि यह मध्य प्रदेश का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला हो सकता है जो “व्यापम” की व्यापकता को भी बौना करने वाला है।

अनुमान लगाया जा रहा है कि यह करीब 3 लाख करोड़ रूपये का घोटाला है, जिसमें अभी तक 1500 करोड़ रुपए का घपला पकड़ा जा चुका है। इस पूरे मामले के तार सत्ता के शीर्ष से जुड़े हुये दिखाई पड़ रहे हैं। इस पूरे खेल में जो पांच आईएएस अधिकारी शामिल बताये जा रहे हैं वो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाते हैं।

चुनाव से कुछ ही महीने पहले उजागर होने वाला यह घोटाला सूबे की सियासत में उबाल ला सकता है। विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल गया है और उसने इस मामले में सरकार की घेराबंदी तेज कर दी है,वहीं हर मामले पर बढ़-चढ़ पर बोलने वाले शिवराज सिंह चौहान इस घोटाले को लेकर पूरी तरह से खामोश हैं, उलटे उनकी सरकार द्वारा ई-टेंडरिंग के घपले को उजागर करने वाले अधिकारी मनीष रस्तोगी को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया है। साथ ही उन्हें संबंधित विभाग से भी हटा दिया गया है।

ई-टेंडरिंग में बड़े पैमाने पर होने वाले घपले का खुलासा सबसे पहले लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) में हुआ जहां एक सजग अधिकारी द्वारा पाया गया कि ई-प्रोक्योंरमेंट पोर्टल में टेम्परिंग करके 1000 करोड़ रुपए मूल्य के तीन टेंडरों के रेट बदल दिए गए थे, जिसके बाद इस मामले में गड़बड़ी को लेकर विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी द्वारा पीएचई प्रमुख सचिव प्रमोद अग्रवाल को एक पत्र लिखा गया था जिसके बाद तीनों टेंडर निरस्त कर दिये।

खास बात ये है कि इनमें से दो टेंडर उन पेयजल परियोजनाओं के हैं, जिनका शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 23 जून को करने वाले थे। दरअसल इस पूरे खेल में ई पोर्टल में टेंपरिंग से दरें संशोधित करके टेंडर प्रक्रिया में बाहर होने वाली कंपनियों को टेंडर दिलवा दिया जाता था, इस तरह से मनचाही कंपनियों को कांट्रेक्ट दिलवाने का काम बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जाता था।

इस खुलासे ने तो जैसे मध्य प्रदेश में ई-टेंडरिंग व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है और इसके बाद एक के बाद एक विभागों में ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम में हुये घपले के मामले सामने आ रहे हैं।

अभी तक अलग-अलग विभागों के 1500 करोड़ रुपए से ज्यादा के टेंडरों में गड़बड़ी सामने आ चुकी हैं जिसमें मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एमपीआरडीसी), लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, जल निगम, महिला बाल विकास, लोक निर्माण, नगरीय विकास एवं आवास विभाग, नर्मदा घाटी विकास जल संसाधन सहित कई अन्य विभाग शामिल हैं।

इस घोटालों को लेकर कई मुख्यमंत्री शिवराज के नजदीकी माने जाने वाले करीब आधा दर्जन आईएएस शक के दायरे में माने जा रहे हैं जिसमें पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव मोहम्मद सुलेमान का नाम प्रमुखता से उभर के सामने आ रहा है, जिनके बारे में कहा जाता है इन्होंने अपने लाबिंग से मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया को उद्योग मंत्रालय से बाहर करवा दिया था।

इन्हीं मोहम्मद सुलेमान को लेकर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने आरोप लगाया है कि मामला सामने आने के बाद वे पीडब्ल्यूडी मुख्यालय के परियोजना क्रियान्वयन यूनिट जाकर वहां संचालक की अनुपस्थिति में दो बस्ते बंधवाकर फाइलें ले गए थे जबकि फाइलों को लेने-लेजाने के लिये एक निर्धारित प्रक्रिया है और इसके लिये जिम्मेदारी तय है। अजय सिंह ने सवाल उठाया है कि आखिर फाइलों में ऐसा क्या था जो सुलेमान खुद अपने वल्लभ भवन से निकल कर निर्माण भवन गए और वे इन फाइलों को कहां ले गए?

दरअसल इस पूरे मामले में शिवराज सरकार का रवैया लीपापोती और किसी तरह से पर्दा डालने का है इसे मात्र तकनीकी खामी और वेबसाइट हैक होने की बात कहकर बच निकलने का प्रयास किया जा रहा है। जिससे खास अधिकारियों को बचाया जा सके। इस घोटाले को उजागर करने वाले अधिकारी मनीष रस्तोगी को उनके पद से हटाते हुये छुट्टी पर भेज दिया गया है, इससे उनके द्वारा जुटाये गये सबूतों से छेड़छाड़ करने की पूरी संभावना है।

एक तरफ तो मध्य प्रदेश सरकार के प्रवक्ता और जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम कहते हैं कि चवन्नी का घोटाला नहीं हुआ है वहीं दूसरी तरफ इसकी जांच आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्लू) को सौंप दिया जाता है, ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि बिना घोटाला के जांच किस बात की कराई जा रही है। विपक्ष ने इस पूरे मामले की जांच ईओडब्लू को सौपने को लेकर भी सवाल उठाये हैं। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने आरोप लगाया है कि व्यापम की तरह इस मामले में भी जांच के नाम पर तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर रही है।

दरअसल मप्र में ईओडब्ल्यू किसी भी जांच प्रक्रिया को अत्यंत धीमी कर देने और ठंडे बस्ते में डाल देने के लिए बदनाम रहा है। शिवराज सरकार द्वारा इस घोटाले को उजागर करने वाले अधिकारी को छुट्टी पर भेजना और आनन-फानन में इसकी की जांच ईओडब्ल्यू को सौंपना उनकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़ा करते हैं।

भाजपा के पंद्रह सालों के शासन काल में मध्य प्रदेश घोटाला प्रदेश बनता जा रहा है, पिछले साल नवंबर में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव ने 12 सालों में हुए 156 प्रमुख घोटालों की सूची भी जारी की थी इन सब में सबसे कुख्यात व्यापमं घोटाला है, व्यापमं घोटाले को देश के सबसे बड़ा भर्ती घोटाला माना जाता है।

जानकार इसे केवल एक घोटाले के रूप में नहीं बल्कि राज्य समर्थित नकल उद्योग के रूप में देखते हैं जिसने हजारों नौजवानों का कैरियर खराब कर दिया है। कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में व्यापमं की कार्यप्रणाली को लेकर मध्य प्रदेश सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए बताया था कि कैसे इसकी पूरी प्रक्रिया अपारदर्शी थी और बहुत ही सुनियोजित तरीके से नियमों को ताक पर रख दिया था।

व्यापमं घोटाले का खुलासा 2013 में तब हुआ, जब पुलिस ने एमबीबीएस की भर्ती परीक्षा में बैठे कुछ फर्जी छात्रों को गिरफ्तार किया। ये छात्र दूसरे छात्रों के नाम पर परीक्षा दे रहे थे, बाद में पता चला कि प्रदेश में सालों से एक बड़ा रैकेट चल रहा है, जिसके अंतर्गत फर्जीवाड़ा करके सरकारी नौकरियों रेवड़ियों की तरह बांटी गयी हैं। मामला उजागर होने के बाद व्यापमं मामले से जुड़े 50 से ज्यादा अभियुक्तों और गवाहों की रहस्यमय ढंग से मौत हो गयी थी जो इसकी भयावहता को दर्शाता है।

इस मामले में जो गिरफ्तारियां हुई थीं उनमें ज्यादातर या तो छात्र शामिल हैं या उनके अभिभावक या बिचौलिये बड़ी मछलियाँ तो बची ही रह गयीं। हालांकि 2014 में मध्य प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा जरूर गिरफ्तार हुए थे, जिन पर व्यापमं के मुखिया के तौर पर इस पूरे खेल में सीधे तौर पर शामिल होने का आरोप था लेकिन दिसम्बर 2015 में वे रिहा भी हो गये थे। तमाम हंगामे के बावजूद अभी तक इस महाघोटाले के पीछे के असली ताकतों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है।

बहरहाल एक के बाद एक कई विभागों के टेंडरों में टेंपरिंग उजागर होने के बाद से मध्य प्रदेश की राजनीति में वो उबाल नहीं है जो चुनावी साल में होनी चाहिये। कांग्रेस का रवैया बहुत ढीला ढाला सा है, अजय सिंह जैसे एक-आध नेता इस मामले को लेकर शिवराज सरकार पर राजनैतिक हमला करते हुये नजर आ रहे हैं, जबकि कुछ ही महीने के बाद होने वाले चुनाव में कांग्रेस इसे बड़ा मुद्दा बना सकती थी।

अजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर ई-टेंडर घोटाले की जांच कराने की मांग की है और साथ ही इस बात की आशंका भी जताई है कि अगर जल्द ही इसकी जांच नहीं कराई गई तो सबूतों को नष्ट कर दिया जाएगा।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह इस मामले में मौनी मामा बने हुये हैं जबकि यह मामला बहुत गंभीर है जिस ई-टेंडर व्यवस्था को भ्रष्टाचार खत्म करने के लिये लाया गया था उसे ही घपलेबाजी का हथियार बना लिया गया। यह एक नही बल्कि कई विभागों का मामला है जो बताता है कि किस तरह से मध्य प्रदेश में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार की एक इस्पाती व्यवस्था बन चुकी है, जो इसे ख़त्म करने के किसी भी उपाय को दीमक की तरह निगल जाती है।

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