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आंदोलन

दबंग जाति और पुलिस गठजोड़ के कारण हुआ अस्थौला में दलितों पर अत्याचार

Janjwar Team
25 May 2018 9:42 AM GMT
दबंग जाति और पुलिस गठजोड़ के कारण हुआ अस्थौला में दलितों पर अत्याचार
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दलित उत्पीड़न की घटना पर गोरखपुर डीएम विजयेन्द्र पांडियन से मिली जांच टीम तो पहले किया बात करने से मना, फिर धमकाया तुम लोग कर रहे हो मेरा समय बर्बाद और गलत तथ्य पेश, प्रशासन करेगा तुम लोगों पर कार्रवाई

गोरखपुर के अस्थौला गांव और गगहा थाने में दलितों पर हुए पुलिसिया उत्पीड़न पर फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट

जनज्वार, गोरखपुर। योगीराज में दलित, महिला उत्पीड़न और जुर्म की संगीन घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, वह बहुत चिंताजनक है। दलितों के साथ तो अत्याचार की घटनाओं में बेशुमार वृद्धि हुई है और वह भी शासन—प्रशासन की शह पर।

हालिया मामले में 15 मई को गोरखपुर के गगहा थाने के अस्थौला गाँव के दलितों द्वारा ग्राम समाज की ज़मीन पर दबंगों द्वारा अवैध कब्जा करवाने का विरोध किया गया था। अगले दिन जब दोनों पार्टियों को थाने पर बुलाया गया तो वहां पर पहले एक दबंग द्वारा पुलिस की मौजूदगी में दलित की पिटाई की गयी तथा विरोध करने पर पुलिस द्वारा भी दलितों की ही पिटाई की गयी। इस सूचना पर जब गाँव के लोगों ने मिलकर थाने पर पिटाई का विरोध किया, पुलिस ने गोलीबारी कर दी, जिसमें तीन दलित घायल हो गये जिनका मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में इलाज चल रहा है।

पुलिस तीन दलितों को गोली मारने की घटना पर ही नहीं थमी, बल्कि उसने भारी संख्या में दलित बस्ती पर चढ़ाई की और वहां पर मौजूद औरतों, बच्चों तथा बूढ़ों को बुरी तरह से मारा पीटा तथा घरों में तोड़फोड़ की। इस घटना में पुलिस संगीन धाराओं में 29 दलितों को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है, जिसमें दो औरतें भी हैं। पुलिस के डर से से दलित घर छोड़ कर भागे हुए हैं।

इस मामले की जांच के लिए 22 मई को एक फैक्ट फाइंडिंग ने गांव का दौरा किया। 15 मई की घटना की जांच के लिए पूर्व आईएएस हरिश्चन्द्रा के नेतृत्व में फैक्ट फाइंडिंग टीम ने गाँव का भ्रमण किया, जिसमें पूर्व आईपीएस एसआर दारापुरी, डायनमिक एक्शन ग्रुप के निदेशक राजकुमार, भारतीय जनसेवा आश्रम के निदेशक दौलत राम, एक्शन एड के अरविन्द कुमार, एसकेवीएस की सचिव रीता कौशिक, आल इण्डिया दलित महिला अधिकार मंच की राज्य संयोजिका उप्र शोभना स्मृति, प्रदेश संयोजक राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान रामदुलार, आदर्श कुमार- संयोजक नेटिव एजुकेशनल एण्ड वेलफेयर सोसायटी गोरखपुर शामिल रहे।

इस टीम ने अस्थौला में घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा गांव में मौजूद दलित महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों से बातचीत की। पीड़ित पक्ष के लोगों ने जो बताया उसके मुताबिक 14 मई को लालचन्द द्वारा बिरेन्द्र चन्द एवं अन्य के सहयोग से खलिहान की जमीन पर निर्माण करके कब्जा करने का प्रयास किया गया, जिसका दलितों ने विरोध किया। बात बढ़ गई तो पुलिस को सूचित किया गया और 100 नम्बर की गाड़ी वहां पहुंची तथा निर्माण कार्य को रोकवाकर चली गयी। इसके पश्चात थाना गगहा से दो सिपाही गांव में आये तथा उन्होंने दोनों पक्षों को अगले दिन प्रातः 10 बजे थाने पर आने के लिए कहा।

15 मई को दलित पक्ष के 10 से 15 महिलाएं तथा पुरुष थाने पर गये तथा दूसरे पक्ष के बिरेन्द्र चन्द, गुड्डू चन्द पुत्रगण कमलाचन्द रणधीर चन्द तथा इन्दर चन्द थाने पर पहले से ही मौजूद थे। जैसे ही बातचीत शुरू हुयी बिरेन्द्र चन्द ने जातिसूचक गालियां देनी शुरू कर दीं और राम उगान पुत्र बलिराज को पहले अपनी बन्दूक के कुंदे से और बाद में पुलिस के डंडे से मारना शुरू कर दिया।

इस पर दलितों ने आपत्ति जताई तो थानाध्यक्ष सुनील कुमा सिंह व अन्य पुलिस कर्मचारियों ने भी उन्हें मारना पीटना शुरू कर दिया तथा राम उगान को हवालात में बंद कर दिया। औरतों को थाने से भगाने के इरादे से पीटना शुरू कर दिया। जब इसकी सूचना गाँव में पहुंची तो वहां से दलित बस्ती के 25-30 लोग थाने पर पहुंचे। उन्होंने मारपीट करने पर आपत्ति की तो पुलिस वालों ने उन पर लाठीचार्ज किया तथा उसके बाद अकारण फायरिंग भी कर दी, जिससे जीतू पुत्र सुखारी, भोलू पुत्र उमेश तथा दीपक पुत्र गोपाल को गोली लगी एवं काफी लोगों को लाठी डंडे की चोटें भी आयीं। थाने में उपस्थित रही औरतों ने यह भी बताया कि फायरिंग के दौरान बिरेंदर चंद ने भी अपनी निजी बन्दूक से उन पर गोलियां चलाई थीं।

15 मई को गगहा थाने में घटी इस घटना के बाद पुलिस ने 16 मई को थाने पर 31 दलितों को नामज़द करते हुए मुकदमा दर्ज किया गया, जिसमें संपत्ति को नुकसान, आगजनी, हत्या का प्रयास सहित संगीन धारायों का उपयोग किया गया।

उसी दिन पुलिस द्वारा बड़ी संख्या में ग्राम अस्थौला की दलित बस्ती पर चढ़ाई की गयी तथा 27 दलितों को दो औरतों सहित गिरफ्तार कर लिया गया। दलित बस्ती पर हमले के दौरान पुलिस द्वारा गाँव में उपस्थित महिलायों, बच्चों तथा वृद्धों की निर्मम पिटाई एवं घरों में तोड़फोड़ की गयी।

इस घटना के दौरान अजोरा देवी पत्नी निवास, शांति पत्नी राम गोविन्द, लालमती पत्नी निर्मल,राजमती पत्नी जगदीश, पानमती पत्नी घूरन, सीमा पत्नी अनिल, ज्ञानमती पत्नी हरीश चंद, साधना देवी पत्नी राजेश, किस्मती पत्नी पुरुषोतम, हंसी पत्नी प्रभु, विमला पत्नी उदय, मन्नू पत्नी अमित, राम मिलन पुत्र जोखन, अमित पुत्र सुभाष तथा कुछ अन्य को पुलिस की मारपीट से गंभीर चोटें आयीं। इसमें अजोरा देवी का दाहिना हाथ टूट गया है। पानमती पत्नी घूरन राम के कान और गले का मंगल सूत्र भी छीन लिया गया।

पुलिस द्वारा राजकुमारी पत्नी रामसकल, पान्मती पत्नी घूरन एवं सीमा देवी पत्नी अनिल के घरों के दरवाजे तोड़े गये तथा घर के अन्दर नहाती हुयी महिलायों और बच्चियों के साथसाथ छेड़छाड़ की गयी। जब महिलाओं के साथ ज्यादती की गई उस समय पुलिस के साथ कोई भी महिला पुलिस कर्मचारी नहीं थी। यह भी आश्चर्य की बात है कि उस समय पुलिस के साथ बिरेन्द्र चंद तथा उसके सहयोगी भी मौजूद थे।

फैक्ट फाइडिंग टीम की जांच के दौरान अधिकतर दलितों के घरों में ताले लगे हुए थे और लोग पुलिस के डर से भागे हुए थे। इन बातों से साफ होता है कि गगहा पुलिस द्वारा खलिहान की ज़मीन पर कब्ज़ा करने वाले पक्ष के साथ मिल कर थाने पर दलितों की पिटाई की गयी तथा अन्य करवाई गयी। इसके बाद गाँव में दलित महिलायों, बच्चों तथा बुजुर्गों के साथ मारपीट की गयी एवं महिलायों के साथ छेड़छाड़ की गयी।

फैक्ट फाइंडिंग टीम ने मांग की है कि हालांकि खलिहान पर कब्जे का मामला राजस्व विभाग से सम्बंधित था, परन्तु इसमें थानाध्यक्ष गगहा द्वारा बिना किसी अधिकार क्षेत्र तथा कब्ज़ा करने वाले पक्ष की सहायता करने के इरादे से अवैधानिक कार्यवाही की गयी, जिसके लिए उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए।

थाने पर अवैध कब्ज़ा करने वाले पक्ष के सहयोगी वीरेन्द्र चन्द द्वारा अनधिकृत ढंग से राम उगान की थाने पर पिटाई की गयी तथा बाद में अपनी निजी बन्दूक से दलितों पर फायरिंग भी की गयी परन्तु थानाध्यक्ष द्वारा उसे ऐसा करने से रोकने हेतु कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी, जिससे यह स्पष्ट है कि इस कार्य में उसकी पूर्ण सहमति थी। इसी कारण दलितों में आक्रोश पैदा हुआ तथा उन्होंने इसका विरोध विरोध जताया। यदि थानाध्यक्ष ने थाने पर ऐसा न होने दिया होता तो संभवतः थाने पर टकराव की कोई घटना घटित ही नहीं होती। अतः इस परिघटना की उच्चस्तरीय जाँच कर थानाध्यक्ष को त्वरित निलंबित कर थाने से हटाया दण्डित किया जाय।

थानाध्यक्ष के विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के अंतर्गत अभियोग चलाया जाय, साथ ही बिरेन्द्र चंद द्वारा थाने पर पिटाई करने तथा अपनी निजी बन्दूक सर फायरिंग करने क लिए भी एस/एसटी एक्ट के अंतर्गत केस दर्ज करके कार्रवाही की जाये।

थाने पर टकराव की घटना के बाद पुलिस द्वारा उसी दिन दलित बस्ती पर बड़ी संख्या में हमला किया गया, जिसमें महिलाओं, बच्चियों, बुजुर्गों को चोटें आईं, लूटपाट की गयी तथा उनकी बेइज्जती की गयी जिसके लिए दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर जाँच कर कानूनी कार्यवाही की जाय।

थाना गगहा पर पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 152/18 की प्रथम सूचना रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि थाने पर घटना तथा गाँव से दलितों की गिरफ्तारी दिनांक 15/5/18 को ही कर ली गयी थी परन्तु थानाध्यक्ष द्वारा थाने पर दिनांक 16/5/18 को प्रथम सूचना दर्ज करायी गयी। इससे स्पष्ट है कि पुलिस द्वारा जानबूझ कर प्रथम सूचना दर्ज करने में विलंब किया गया। 27 दलितों को थाने पर एक दिन अवैध अभिरक्षा में रखा गया तथा उनके साथ मारपीट की गयी जो कि दंडनीय अपराध है।

जांच में यह भी सामने आया कि 29 मई को चन्द्रावती की पुत्री की शादी है, परन्तु उसे वीरेंदर चन्द और उसके साथियों की तरफ से धमकियाँ दी जा रही हैं। इसलिए चन्द्रावती को शादी के दौरान सभी प्रकार की सुरक्षा मुहैया कराई जाय।

थानाध्यक्ष द्वारा लिखी गयी प्रथम सूचना रिपोर्ट से स्पष्ट है कि 31 दलितों को प्रथम सूचना रिपोर्ट में नामजद किया गया है जिनमें से 27 गिरफ्तार किये जा चुके हैं और 250 अज्ञात दलितों के विरुद्ध मुक़दमा दर्ज किया गया है, पुलिस की यह कार्यवाही साफ तौर पर दलित उत्पीड़न की कार्यवाही है।

जिन दलितों की गांव तथा थाने पर पिटाई की गयी थी, उनके शरीर पर जेल में दाखिले के समय कोई भी चोट नहीं दिखाई गयी है, इसके लिए दलितों की चोटों जो कि थाने पर पिटाई के कारण आई हैं, की मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच करायी जाये तथा मारपीट के दोषी पुलिस कर्चारियों को दण्डित किया जाये। गांव वालों ने बताया कि पुलिस गांव में बराबर दबिश दे रही है। अतः पुलिस के इस आतंक को तुरंत समाप्त किया जाय ताकि लोग अपने घरों में वापस लौट सकें।

पुलिस द्वारा थाने पर घटना के दिन अस्थौला गांव की दलित बस्ती पर बड़ी संख्या में पुलिस बल आया, जिसने महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों की निर्ममता की पिटाई की। इसमें एक दर्जन से अधिक लोगों को चोटें आईं। पुलिस द्वारा उन्हें न तो डाक्टरी सहायता के लिए अस्पताल भेजा गया और न ही उनकी तरफ से कोई रिपोर्ट लिखी गयी।

शिवहरी पुत्र जीतू द्वारा इस सम्बन्ध में 17 मई को पुलिस अधीक्षक/जिला अधिकारी/आयुक्त गोरखपुर/ डीआईजी गोरखपुर को दिए गए प्रार्थना पत्र के आधार पर प्रथम सूचना ही दर्ज की गयी। अतः इसके आधार पर तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाये।

यह भी उल्लेखनीय है की जिस समय पुलिस ने गाँव में दबिश दी तो उनके साथ कोई भी महिला पुलिस नहीं थी। अतः इस लापरवाही के लिए दोषी अधिकारियों/कर्मचारियों को दण्डित किया जाए। इस मामले में पुलिस द्वारा घोर गैर कानूनी एवं पक्षपातपूर्ण कार्रवाही की गयी, अतः इस मामले से सम्बंधित मुकदमे की विवेचना सीबीसीआईडी द्वारा की जाये तथा इस घटना की जांच मजिस्ट्रेट द्वारा करवाई जाये।

जब फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य इस मामले में जिलाधिकारी गोरखपुर विजयेन्द्र पांडियन से उनके कार्यालय में मिलने के लिए गए तो उन्होंने कोई भी बात सुनने से मना कर दिया और कहा कि आप लोग मेरा समय बर्बाद कर रहे हैं और गलत तथ्य पेश कर रहे हैं। इतना ही नहीं विजयेन्द्र पांडियन ने इसके लिए टीम के सदस्य एसआर दारापुरी को धमकी दी कि उनके विरुद्ध कार्रवाही की जाएगी। जिलाधिकारी का यह रवैया तानाशाहीपूर्ण एवं अमर्यादित था, जिसके लिए जिलाधिकारी के विरुद्ध मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश से शिकायत कर पांडियन को गोरखपुर से हटाने की मांग की जाएगी।

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