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विमर्श

हम हैं अपनी मातृभूमि की अयोग्य संतानें

Prema Negi
10 May 2019 4:49 PM GMT
हम हैं अपनी मातृभूमि की अयोग्य संतानें
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जब मैं यह सोचता हूं कि भारत में आज क्या हो रहा है तब मुझे आवश्यक लगता है कि हम राजनीतिक हत्याओं और राजनीतिक डकैतियों के संबंध में अपने विचारों के बारे में कुछ कहें। मुझे तो लगता है कि ये सब इस देश में जड़ नहीं पकड़ सकतीं। लेकिन विद्यार्थियों को इस संबंध में सावधान रहना चाहिए कि मानसिक अथवा नैतिक दृष्टि से इस प्रकार की आतंकपूर्ण कार्रवाइयों का भूल से भी समर्थन न कर डालें....

हेमंत, वरिष्ठ पत्रकार

(नीचे दिया गया ‘समाचार’ सौ साल पहले की घटना का छोटा-सा अंश है। आज की ‘घटना’ नहीं। ‘वंदेमातरम्’ से जुड़ी इस ‘पहली’ घटना और उसके ‘इतिहास’ से हमारे देश के प्रधानमंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री कितने अवगत हैं, यह सवाल शायद आपमें से कई लोगों को निरर्थक लगेगा। लेकिन हमारे देश के लाखों युवा वोटरों से, जो ‘वंदेमातरम्’ को चुनाव का मुख्य राष्ट्रीय मुद्दा मानते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग करने निकले हैं, यह पूछना क्या सर्वथा अनुचित होगा कि वे वंदेमातरम् की इस पहली घटना और बाद के इतिहास के बारे में कितना और क्या-कुछ जानते हैं?)

सभा में युवाओं की भारी भीड़ थी! सब उस व्यक्ति की जय के गगनभेदी नारे लगा रहे थे, जो ‘इतिहास-पुरुष’ ‘ऑन मेकिंग’ था। समारोह की कार्यवाही ‘वंदेमातरम्’ के गायन से प्रारम्भ हुई। जो समूह गा रहा था वह माइक के सामने खड़ा था। मंच पर कुर्सियों पर बैठे इतिहास-पुरुष और उसके साथी-सहयोगी कुछ ऐतिहासिक एवं अनैतिहासिक पात्र और नीचे की भीड़ में जो लोग जमीन पर बैठे थे, वे सब खड़े हो गए और जो, बैठने की जगह होने के बावजूद पहले से खड़े थे, वे कुछ अतिरिक्त जोश की मुद्रा में आ गए।

गायन समाप्त होने के बाद जो खड़े हुए थे वे आराम से बैठ गये। जो पहले भी खड़े थे वे, माइक से अनुरोध किये जाने के बावजूद, खड़े ही रहे। उन्हें संभवतः जमीन पर बैठना मंजूर नहीं था! इतिहास-पुरुष ऑन मेकिंग ने माइक के सामने खड़े होकर अपना भाषण शुरू किया :

सभापति महोदय तथा प्यारे मित्रो, मेरे... गुणों का उल्लेख करते हुए आपकी नगरी ने ...शब्द-कोश के प्राय: समस्त विशेषणों का प्रयोग कर डाला है और यदि मुझसे यह बतलाने के लिए कहा जाये कि वह कौन-सा स्थान है, जिसने मुझे कृपा, प्रेम तथा शालीनता के व्यवहार से अभिभूत कर दिया है, तो मुझे कहना पड़ेगा कि वह स्थान यही है (करतल ध्वनि)। लेकिन मैंने अनेक बार कहा है कि इस नगर के संबंध में मेरा यही विचार है। अत: आप लोग मुझ पर अनुपम सुजनता से जो अनुग्रह की वर्षा कर रहे हैं वह मेरे लिए कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है।

और, अब जिस संगठन की अधीनता में मैं आजकल अपना परीक्षा-काल बिता रहा हूं, उसके सभापति ने, यदि मैं कह सकूं तो, इस माला में सुमेरू ही लगा दिया है। क्या मैं इन सब बातों के योग्य हूं? मेरे हृदय के अंतरतम भाग से उत्तर निकलता है-“नहीं”। किंतु आप मेरे लिए जिन विशेषणों का भी उपयोग करें, उन सबके योग्य बनने के लिए और यदि मैं एक योग्य सेवक बनना चाहूं तो निश्चय ही उसके लिए मुझे अपना सारा जीवन अपने आपको उन विशेषणों के योग्य सिद्ध करने में उत्सर्ग कर देना पड़ेगा।

और, अब उस मनोहर राष्ट्रीय गीत की बात लें, जिसे सुनते ही हम सब श्रद्धावश उठ खड़े हुए। उसमें कवि ने उन समस्त विशेषणों का उपयोग कर डाला है, जिनका उपयोग ‘भारतमाता’ के लिए सम्भव है। उन्होंने भारतमाता को सुहासिनी, सुमधुर भाषिणी, सुवासिनी, सर्वशक्तिमती, सर्वसद्गुणवती, सत्यवती, सुजला, सुफला, शस्यश्यामला औरमहान् स्वर्णयुग में ही सम्भव हो ऐसी मानव-जाति से बसी हुई बताया है। क्या हमें यह गीत गाने का अधिकार है? मैं अपने आपसे पूछता हूं, क्या मुझे उस गीत को सुनकर तुरंत उठ खड़े होने का कोई अधिकार है?

मैं अपने आपसे पूछता हूँ कि यह गीत हमारे लिए वास्तव में क्या अर्थ रखता है? क्या हमें इस तरह गाने का अधिकार है? हम भारतमाता को नमन करते हैं और उससे सुरक्षा की मांग करते हैं। लेकिन आज भारत किस अवस्था में पड़ा हुआ है? उसकी लाखों संतानों को सिर्फ एक ही समय भोजन मिलता है, और सो भी नमक और रोटी के अलावा और कुछ नहीं। उसके साथ खाने के लिए सब्जी वगैरह कुछ भी उन्हें मयस्सर नहीं। क्या हम ईमानदारी के साथ ऐसा कह सकते हैं कि हमारी मातृभूमि हमें सुरक्षा देती है? हम अपनी मातृभूमि की अयोग्य संतान हैं।

नि:संदेह कवि ने हमारे सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया, जिसके शब्द किसी भविष्य-द्रष्टा के शब्द-मात्र हैं, और हमारी इस मातृभूमि का वर्णन करते हुए उन्होंने जो शब्द कहे हैं, उनमें से प्रत्येक को चरितार्थ करना आप लोगों का -जो भारत की आशा हैं -काम है। इस समय तो मैं यही समझता हूं कि मातृभूमि के वर्णन में इन विशेषणों का प्रयोग बहुत ही ‘अतिश्योक्तिपूर्ण’है, और कवि ने मातृभूमि की ओर से जो दावे किये हैं, उन्हें आपको और मुझे सिद्ध करना है।

अब आपसे, इस नगरी के विद्यार्थियों से और समस्त भारत के विद्यार्थियों से, मैं पूछता हूं कि क्या आप लोग ऐसी शिक्षा पा रहे हैं जो आप लोगों को उस आदर्श को चरितार्थ करने के योग्य बना सके और जो आपके सर्वोत्तम गुणों को निखार सके? या कि यह शिक्षा एक ऐसा कारखाना बन गई है जो सरकार के लिए नौकर अथवा व्यापारिक कार्यालयों के लिए क्लर्क तैयार करे?

जो शिक्षा आप लोग प्राप्त कर रहे हैं, उसका अंतिम उद्देश्य क्या यही है कि आप लोग सरकारी अथवा दूसरे विभागों में नौकरी प्राप्त करें? यदि आप लोगों की शिक्षा का अंतिम उद्देश्य यही है - यदि आप लोगों ने अपनेसामने यही उद्देश्य रखा है -तो मैं समझता हूं और मुझे इस बात की आशंका है कि कवि ने अपने लिए भारत माता का जो चित्र खींचा है, उसका साकार हो पाना बहुत दूर की बात है। जैसाकि आप लोगों ने मुझे कहते हुए सुना होगा अथवा कदाचित् आप लोगों ने पढ़ा भी होगा, मैं आधुनिक सभ्यता का कट्टर विरोधी हूं।

मैं चाहता हूं कि आप आजकल यूरोप में जो कुछ हो रहा है, जरा उस ओर नजर दौड़ा कर देखिए; और तब यदि आप इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि यूरोप आजकल आधुनिक सभ्यता के पैरों तले पड़ा हुआ कराह रहा है तो आपको और आपके गुरुजनों को अपनी इस मातृभूमि में उस सभ्यता की नकल करने से पहले कुछ सोच-विचार करना पड़ेगा। लेकिन लोगों ने मुझसे कहा है कि “ऐसी दशा में, जब तक हम देखते हैं कि हमारे शासक ही उस सभ्यता को हमारी मातृभूमि में ला रहे हैं तो, हम उसे कैसे रोक सकते हैं?”

लेकिन इस संबंध में किसी भ्रम में न रहें। मैं एक क्षण के लिए भी इस बात का विश्वास नहीं कर सकता कि जब तक आप लोग उस सभ्यता को ग्रहण करने के लिए तैयार न हों तब तक हमारे शासक हम पर वह सभ्यता लाद सकते हैं।

जब मैं यह सोचता हूं कि भारत में आज क्या हो रहा है तब मुझे आवश्यक लगता है कि हम राजनीतिक हत्याओं और राजनीतिक डकैतियों के संबंध में अपने विचारों के बारे में कुछ कहें। मुझे तो लगता है कि ये सब इस देश में जड़ नहीं पकड़ सकतीं। लेकिन आप विद्यार्थियों को इस संबंध में सावधान रहना चाहिए कि मानसिक अथवा नैतिक दृष्टि से आप इस प्रकार की आतंकपूर्ण कार्रवाइयों का भूल से भी समर्थन न कर डालें।

...मैं इसके बदले में आपको एक दूसरी बहुत काम की बात बतलाऊंगा। आप अपने आपको आतंकित कीजिए; अपने अंतर्मन को टटोलिए; जहां-कहीं आपको अत्याचार दिखाई पड़े वहां आप समस्त उपायों से उसका विरोध कीजिए; आपकी स्वतंत्रता पर कोई हाथ डाले तो आप हर तरह से उसका विरोध कीजिए। लेकिन अपने उत्पीड़क का खून बहा कर ऐसा मत कीजिए। हमारा धर्म हमें ऐसी शिक्षा नहीं देता। हमारे धर्म का आधार अहिंसा है, जोकार्य-रूप में प्यार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जब मैं प्यार शब्द कहता हूं तो उसका मतलब सिर्फ अपने पड़ोसी के प्रति, अपने मित्रों के प्रति प्यार ही नहीं होता। उस शब्द के भीतर तो वे भी आ जाते हैं, जो आपके शत्रु हैं।

इसी सम्बध में मैं एक बात और कहूंगा। मेरा विचार है, हमें अविलम्ब निर्भयता का पालन करना पड़ेगा। यदि हमारे शासक कोई ऐसा काम करते हों जो हमारी समझ में अनुचित हो और यदि हम यह समझते हों कि उन्हें अपना मत बतला देना हमारा कर्तव्य है, तो चाहे वह राजद्रोह ही क्यों न समझा जाये, मैं आप लोगों से आग्रहपूर्वक कहता हूं कि आप वह राजद्रोहपूर्ण बात भी कह डालिए; किंतु ऐसा आप अपने आपको खतरे में डालकर ही कर पायेंगे। और,आपको उसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब आप लोग परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जायेंगे और न्याय का मार्ग नहीं छोड़ेंगे तब मैं समझता हूं कि आप लोग इस बात के सच्चे अधिकारी भी हो जायेंगे कि सरकार आपकी सम्मति सुने।

मैं बराबरी का साझेदार होने का दावा करता हूं। मैं किसी अधीनस्थ जाति का नहीं हूं। मैं अपने आपको किसी अधीनस्थ जाति का सदस्य नहीं मानता। लेकिन इसमें एक बात है,वह यह कि ऐसी कोई चीज आपको शासक नहीं देंगे, बल्कि आपको अपने प्रयत्नों से उसे स्वयं ही प्राप्त करना है। मैं उस चीज को प्राप्त करना चाहता हूं और प्राप्त कर सकता हूं। और मैं उसे मात्र अपने कर्तव्यों के निर्वाह के बल पर प्राप्त करना चाहता हूं।

हमारे धर्म का मर्म ‘कर्तव्य’ शब्द में निहित है, न कि ‘अधिकार’ शब्द में। और यदि आप यह मानते हों कि हम जो कुछ चाहते हैं, वह हमें अपने कर्तव्य के और अधिक अच्छे निर्वाह से प्राप्त हो सकता है तो आप सदा अपने कर्तव्य के संबंध में ही सोचिए। इस ढंग से जूझते हुए आपको किसी मनुष्य का भय नहीं होगा, आप केवल ईश्वर से डरेंगे।

देश के राजनीतिक जीवन और राजनीतिक संस्थाओं में अध्यात्म का समावेश करने और इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए हमें तुरंत जुट जाना है। विद्यार्थी राजनीति से दूर नहीं रह सकते। उनके लिए राजनीति भी उतनी ही जरूरी है, जितना कि धर्म। राजनीति को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता। धर्म से विछिन्न राजनीति गिराने वाली चीज बन जाती है। आधुनिक सभ्यता ऐसी ही राजनीति है। सम्भव है, मेरे विचार आपको स्वीकार्य नहीं हों। फिर भी, मैं तो आपसे वही बात कह सकता हूं जो बात मेरे अंतरतम में उथल-पुथल मचाये हुए है।

मैं अपने अनुभवों के आधार पर दावा करता हूं किआपके जिन देशवासियों पर आधुनिक सभ्यता का रंग नहीं चढ़ा है, जिन्हें विरासत में पुरखों द्वारा सम्पादित तपश्चर्या प्राप्त हुई है, वे अपनी पूरी ऊंचाई तक उठने में समर्थ हैं।

(हेमंत वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं।)

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