जनज्वार विशेष

मानवजनित हैं बाढ़ और सूखे में आपदा जैसे बन रहे हालात

Prema Negi
14 Aug 2019 10:50 AM GMT
मानवजनित हैं बाढ़ और सूखे में आपदा जैसे बन रहे हालात
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हरेक साल बारिश के भी रिकॉर्ड टूट रहे हैं और गर्मी के भी। दूसरी तरफ हमने नदियों की जो हालत कर दी है, उसके कारण बाढ़ और सूखा दोनों ही आगे बड़ी आपदा साबित होने वाले हैं

महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट

स समय आधे से कुछ ज्यादा देश बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है और शेष में सूखा पड़ा है। जब चेन्नई में पानी की कमी हो गई थी तब जल प्रबंधन के बड़े-बड़े दावे प्रधानमंत्री समेत सरकार के अनेक स्त्रोतों ने किये थे। इसके पहले भी जब केरल में बाढ़ आयी थी तब केरल की सरकार ने भी कहा था कि अब बाढ़ न आये इसके लिए कदम उठाये जायेंगे, पर केरल फिर डूब रहा है। महाराष्ट्र के कुछ जिले बाढ़ की चपेट में हैं और अन्य जिलों में बारिश कराने के कृत्रिम उपाय किये जा रहे हैं। महाराष्ट्र का बीड जिला इस समय भी भयानक सूखे की चपेट में है।

स वर्ष अब तक देश में बाढ़ से 250 से अधिक लोग अपनी जान गवां चुके हैं और लाखों परिवार अपने घरों से बेदखल हो चुके हैं। इसके बाद भी ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, झारखण्ड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और छत्तीसगढ़ में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गयी है। जुलाई के अंतिम सप्ताह तक देश का 46 प्रतिशत भू-भाग सूखे का सामना कर था।

कुछ साल पहले से तापमान वृद्धि के प्रभावों में जलवायु का मिजाज बदलने की बात भी की जा रही है, और अब इसका असर सबके सामने है। हरेक साल बारिश के भी रिकॉर्ड टूट रहे हैं और गर्मी के भी। दूसरी तरफ हमने नदियों की जो हालत कर दी है, उसके कारण बाढ़ और सूखा दोनों ही आगे बड़ी आपदा साबित होने वाले हैं।

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रेक नदी पर हमने बड़े बाँध बना दिए हैं, जिससे सामान्य अवस्था में नदियों में पानी होता ही नहीं और जब बारिश आने लगती है तब नदियों में एकाएक बांधों से पानी छोड़ दिया जाता है। जिन नदियों पर अधिक बाँध हैं, उनमें अधिक बाढ़ आती है और इससे तबाही भी अधिक होती है। केरल का उदाहरण सबके सामने है।

बाढ़ से तबाही का दूसरा बड़ा कारण है नदियों के डूब क्षेत्र में अवैध खनन, अवैध निर्माण और खेती। इन सबके कारण डूब क्षेत्र में बड़ी आबादी बस जाती है और फिर एकाएक बाढ़ आने पर नुकसान अधिक होता है। सरकारों के पास भी बाढ़ या सूखा रोकने या इनके असर कम करने की कोई योजना नहीं होती, बस हरेक साल राहत और बचाव कार्य या फिर मुवावजा देने की एक परंपरा है।

देश में पानी की समस्या अब विकट होती जा रही है। 5 अगस्त को अमेरिका स्थित वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 17 ऐसे देश हैं जहां पानी का गंभीर संकट है, और भारत उनमें से एक है। जल संकट के सन्दर्भ में इन 17 देशों में भारत का स्थान 13वां है। इस सूची में अन्य कुछ देशों के नाम हैं – क़तर, इजराइल, लेबनान, सौदी अरबिया, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और बोट्सवाना। इस रिपोर्ट का आधार किसी देश या क्षेत्र में कुल उपलब्ध पानी और कुल खपत किये जाने वाले पानी की मात्रा का अनुपात है।

भारत के अधिकतर क्षेत्रों में कुल उपलब्ध पानी में से प्रतिवर्ष 80 प्रतिशत तक पानी का उपयोग कर लिया जाता है, और इसमें से 70 प्रतिशत का उपयोग कृषि में किया जाता है, लगभग 50 करोड़ की सम्मिलित आबादी वाले 10 राज्य लगातार सूखे की चपेट में रहते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़, गुजरात, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू और काश्मीर और हरयाणा में पानी की भयानक कमी है। पंजाब के कुछ क्षेत्रों में कुछ वर्ष पहले तक भूजल की गहराई 45 मीटर थी, जो अब बढ़कर 160 मीटर तक पहुँच गयी है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के वैज्ञानिक फिल्लिपस वेस्टर के अनुसार तापमान वृद्धि एक ऐसी भयानक आपदा है, जिसका कारण प्रकृति नहीं बल्कि मानव है, जिसके बारे में कभी विस्तार में चर्चा नहीं की जाती, पर इससे करोड़ों लोग प्रभावित होंगे।

स आपदा को गंभीरता से लेने की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि 1970 के दशक से अब तक हिन्दूकुश हिमालय के 15 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर ख़त्म हो चुके हैं। ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के कारण 100 वर्षों में जितनी भयंकर बाढ़ आती थी, उतनी अब 50 वर्षों में ही आ जाती है। ग्लेशियर ख़त्म होने का प्रभाव खेती के साथ-साथ पन-बिजली योजनाओं पर भी पड़ेगा, क्योंकि इस क्षेत्र में अधिकतर बिजली इससे ही उत्पन्न होती है।

रिपोर्ट के अनुसार ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के कारण वर्ष 2050 से 2060 के बीच यहाँ से उत्पन्न होने वाली नदियों में पानी का बहाव अधिक हो जाएगा, पर वर्ष 2060 के बाद बहाव कम होने लगेगा और पानी की किल्लत शुरू हो जायेगी।

पिछले महीने पूरा देश पानी की कमी से जूझ रहा था। चेन्नई में पानी के संकट से सम्बंधित समाचार लगातार प्रकाशित होते रहे। प्रधानमंत्री भी पानी की कमी पर चर्चा करते रहे और हवाई योजनायें बनाते रहे।

सके बाद देश के अधिकतर हिस्सों में मानसून की बारिश शुरू हो गयी, मुंबई डूबने लगी और अब पानी की समस्या पर कोई चर्चा नहीं की जा रही है। अगले वर्ष यह समस्या फिर उठ खड़ी होगी, तब फिर कुछ समय के लिए चर्चा होगी। हमारे देश में समस्याओं का ऐसा ही समाधान होता है।

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