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जनज्वार विशेष

पुलिस एनकाउंटर को इंसाफ मान जश्न मनाता देश और एनआरसी के नाम पर संविधान की सरेआम उड़तीं धज्जियां

Prema Negi
10 Dec 2019 7:57 AM GMT
पुलिस एनकाउंटर को इंसाफ मान जश्न मनाता देश और एनआरसी के नाम पर संविधान की सरेआम उड़तीं धज्जियां
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विश्व मानवाधिकार दिवस 10 दिसंबर पर विशेष

निर्भया कांड के बाद उन्नाव और हैदराबाद की वीभत्सता, हमारे नेता आपराधिक न्याय प्रणाली को चुस्त-फुर्तीला बनाने की वकालत करने के बजाय आरोपियों के लिंचिंग की कर रहे हैं खुली वकालत, समाज भी महिलाओं के प्रति नजरिये में बदलाव के बजाय इसका हल ढूंढ़ रहा फांसी या एनकाउंटर में...

जावेद अनीस का विश्लेषण

र्तमान समय में देश में जिस तरह का माहौल है उसे देखते हुये मानवाधिकार की चर्चा बहुत जरूरी हो जाती है। वर्तमान में भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जब यहां “जन” और “तंत्र” दोनों के द्वारा ही मानव अधिकारों की उपेक्षा और अवहेलना बढ़ी है। आज मानव अधिकारवादियों का मजाक उड़ाना और उन्हें ही देश के लिये खतरे के रूप में देखने का चलन तेजी से बढ़ा है।

हिलाओं के साथ क्रूरतम हिंसा, आश्रय ग्रहों में बच्चियों के साथ वीभत्सता, दलितों पर अत्याचार, मॉब लिंचिंग के दौर से हम पहले गुजर ही रहे थे, लेकिन इस बार मानवाधिकार दिवस मनाने की रस्म अदायगी हम ऐसे समय करने जा रहे हैं जब समाज पुलिस एनकाउंटर को इंसाफ मानते हुये इसका जश्न मना रहा है और राज्य नागरिकता (संशोधन) विधेयक के नाम पर ऐसा कानून लाने जा रहा है, जो सीधे भारतीय संविधान की आत्मा पर चोट साबित हो सकता है।

सैद्धांतिक तौर पर मानव अधिकार इस धरती के सभी इंसानों के लिये बराबर हैं, फिर वे चाहे किसी भी नस्ल, धर्म, लिंग या राष्ट्र के हों। वैश्विक तौर पर मानवाधिकार की अवधारणा को अपनाने की जरूरत दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही के बाद महसूस की गयी, जिसका मकसद था विभिन्न देशों, समाजों और इंसानों के बीच शांति और सह अस्तित्व के सम्बन्ध को कायम किया जा सके।

सी को ध्यान में रखते हुये साल 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वरा मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणापत्र को स्वीकार किया गया जोकि मानवता के सफ़र में महत्वपूर्ण कदम था। मानवाधिकार घोषणापत्र ने पूरी दुनिया में सदियों से दबे-कुचले इंसानों/समुदायों को अपने वजूद व अधिकारों को पहचानने और अधिकारों के लिए जारी हर लड़ाई को ताकत देने का काम किया है।

वैश्विक मानवाधिकार घोषणापत्र के काफी समय बाद 1993 में भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया जिसके बाद राज्यों में भी मानवाधिकार आयोगों का गठन किया गया है, जो एक तरह से आम नागरिकों को मानवाधिकारों के उल्लंघनों के मामलों को उठाने का मंच प्रदान करते हैं। परन्तु हमारे देश में मानवाधिकार आयोग की शक्तियां सीमित हैं क्योंकि केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें आयोग की सिफारिशें मानने के लिये बाध्य नहीं हैं।

मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम, 1993 के तहत मानवाधिकार हनन के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिये देश के हर जिले में एक मानवाधिकार अदालतों की गठन की जानी थी लेकिन करीब 25 सालों बाद भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है और ना ही वर्तमान में इस बारे में कोई बात कर रहा है।

भारत में दक्षिणपंथियों के सत्ता में आने के बाद से मानवाधिकार की बहस ना केवल धीमी हुई है बल्कि इसे उलटी दिशा में मोड़ा जा रहा है। पहले इस देश में मानव अधिकारों की बात करने वाले जो लोग हाशिये पर थे आज वे निशाने पर हैं। यूएपीए संशोधन बिल 2019 के पारित होने के बाद से अब सरकार बिना किसी सुनवाई या प्रक्रिया के किसी भी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी’ घोषित कर सकती है।

ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा जारी वर्ल्ड रिपोर्ट 2019 में कहा गया है कि पिछले साल भारत में सरकार के कार्यों या नीतियों की आलोचना करने वाले कार्यकर्ताओं /गैर-सरकारी संगठनों को निशाना बनाया गया है और कई मौकों पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की गयी है। इस दौरान धार्मिक अल्पसंख्यकों, हाशिए के समुदाय भी निशाने पर रहे हैं।

देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में ना केवल लगातार बढ़ोतरी हो रही है बल्कि इसकी वीभत्सता भी बढती जा रही है। एनसीआरबी द्वारा हाल ही में जारी किये आंकड़ों के अनुसार 2016 के मुकाबले 2017 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 6 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। निर्भया कांड के बाद आज हम उन्नाव और हैदराबाद की वीभत्सता से गुजर रहे हैं। लेकिन हमारे नेता आपराधिक न्याय प्रणाली को चुस्त-फुर्तीला बनाने की वकालत करने के बजाय आरोपियों के लिंचिंग की खुली वकालत कर रहे हैं। समाज भी महिलाओं/लड़कियों के प्रति अपने नजरिये में बदलाव के बजाय इसका हल फांसी या एनकाउंटर में ढूंढ़ रहा है।

वैश्विक मानवाधिकार घोषणा पत्र ने पूरी दुनिया में जुल्म और गैर-बराबरी के खिलाफ हर संघर्ष को बल देने का काम किया है। अभी तक दुनिया भर के अनगिनत आंदोलनों, संघर्षों, मुक्ति संग्रामों ने इस घोषणापत्र ने प्रेरणा लिया है, जिसकी वजह से उन्हें अपना मुकाम भी मिला है। यह आज भी दुनियाभर के मानव अधिकारवादियों के लिये संदर्भ बिन्दु की तरह है, लेकिन बदलती दुनिया में इसकी अवहेलना बढ़ती जा रही है।

ज दुनियाभर में कई मुल्कों की सरकारें खुद को लोकतांत्रिक तो कहती हैं, परन्तु वे सवाल करने और आलोचना सहने को तैयार नहीं है। दुर्भाग्य से भारत भी ऐसे ही देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां मानवधिकारों का दायरा तेजी से सिकुड़ता जा रहा है। लोकतान्त्रिक संस्थाए तेजी से कमजोर रही हैं और उनकी जगह कुछ “मजबूत व्यक्ति” लेते जा रहे हैं। एक लोकतान्त्रिक देश के भेष में हम “आदिम” बनते जा रहे हैं, जिसके लिये “लोक” और “तंत्र” दोनों जिम्मेदार हैं।

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