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कोर्ट ने कहा जजों का भयभीत संत नहीं, निडर उपदेशक की तरह होना लोकतंत्र के लिए जरूरी

Prema Negi
11 May 2019 1:44 PM GMT
कोर्ट ने कहा जजों का भयभीत संत नहीं, निडर उपदेशक की तरह होना लोकतंत्र के लिए जरूरी
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वकील द्वारा जज से दुर्व्यवहार पर फैसला सुनाते हुए दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि जज को किसी भी तरह डराया या अपमानित नहीं किया जा सकता, वह भयभीत संत नहीं हैं....

जेपी सिंह की रिपोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार 10 मई को कहा कि न्यायाधीश 'भयभीत संत' नहीं हैं और उन्हें डराया धमकाया नहीं जा सकता और न ही उनका अपमान किया जा सकता है। उन्हें न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बरकरार रखने के लिए निडर उपदेशकों की तरह होना होगा, जो लोकतंत्र के जीवित रहने के लिये अति आवश्यक है।

यह बात उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद के तत्कालीन मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) से दुर्व्यवहार करने और हमला करने के लिए आपराधिक अवमानना में एक वकील को दोषी ठहराने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने कहा कि न्यायपालिका लोकतंत्र के मुख्य स्तंभों में से एक है और यह समाज के शांतिपूर्ण और व्यवस्थित विकास के लिए आवश्यक है। न्यायाधीश को बेखौफ होकर और भेदभाव रहित तरीके से न्याय देना होता है। उसे किसी भी तरह से डराया या अपमानित नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश भयभीत संत नहीं हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरकरार रखने के लिए उन्हें 'निडर उपदेशकों' की तरह होना चाहिये, जो लोकतंत्र के जीवित रहने के लिये बेहद जरूरी है।

पीठ ने कहा कि समाज में दूसरों के लिए जो उचित हो सकता है वह एक वकील के लिए अनुचित हो सकता है, क्योंकि वकील समाज के एक बौद्धिक वर्ग से आता है और कुलीन पेशे के सदस्य के रूप में तदनुसार उससे अपेक्षाएं भी अधिक होती हैं। न्यायालय की गरिमा वास्तव में उस व्यवस्था की गरिमा है, जिसमें एक अधिवक्ता न्यायालय का अधिकारी होता है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन्हें आपराधिक अवमानना के लिए दोषी ठहराया और छह महीने के साधारण कारावास और 2000 रुपये के जुर्माना की सजा सुनाई। उन्हें छह महीने की अवधि के लिए जिला न्यायाधीश, इलाहाबाद के परिसर में प्रवेश नहीं करने का भी निर्देश दिया गया था। पीठ ने कहा कि उनका कृत्य न केवल अनुचित है, बल्कि निंदनीय है। यही नहीं संबंधित वकील ने अपने कृत्य के लिए माफी भी नहीं मांगी और अधीनस्थ अदालत को बदनाम किया।

उच्चतम न्यायालय ने 2012 में इलाहाबाद में एक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के साथ दुर्व्यवहार और हमले के प्रयास के लिए एक वकील के खिलाफ अदालत की आपराधिक अवमानना मामले में दिए गये अपने फैसले में राकेश त्रिपाठी को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गयी 6 माह के कारावास की सजा को आगे तीन वर्ष के लिए निलंबित कर दिया है उनसे अच्छे और उचित व्यवहार बनाये रखने की अपेक्षा की है।

इसके साथ ही आगे 3 वर्षों की की अवधि तक इलाहाबाद जिला कचहरी में राकेश त्रिपाठी प्रवेश नहीं करेंगे। यह अवधि एक जुलाई 2019 से शुरू होकर 30जून 2022 तक होगी। इसका अनुपालन करने और कोई उल्लंघन न करने पर उनको मिली 6 माह की सज़ा तीन साल बाद स्वत निरस्त हो जाएगी। लेकिन यदि राकेश त्रिपाठी ने इस आदेश का उल्लंघन किया तो उन्हें 6 माह के कारावास के दंड को भुगतना पड़ेगा।

राकेश त्रिपाठी को उच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए 2000 रुपये का जुर्माना जमा करना पड़ेगा। जुर्माना जमा करने में विफलता के कारण राकेश त्रिपाठी कचहरी परिसर में तीन महीने की अवधि के लिए प्रवेश नहीं कर सकेंगे।

जानकारी के मुताबिक इस मामले में 21 दिसंबर 2012 को इलाहाबाद के सीजेएम से अनुमति लिए के बिना दोपहर के भोजनावकाश के दौरान राकेश त्रिपाठी अधिवक्ता अपने 2-3 सहकर्मियों के साथ उनके चैंबर में घुसे और सीजेएम के साथ गली—गलौज करने लगे। बात यहीं खत्म नहीं हुई, उन्होंने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी को पीटने के लिए हाथ भी उठाया और उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी।

सीजेएम से राकेश त्रिपाठी ने सवाल किया कि उनके कहने पर सीजेएम ने एफआईआर दर्ज़ करने का आदेश क्यों नहीं पारित किया? राकेश त्रिपाठी का यह कृत्य न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 की धारा 2 (सी) के तहत आपराधिक अवमानना का मामला बनता है। राकेश त्रिपाठी के इस कृत्य से न केवल न्यायालय की अधिकारिता कम हुई बल्कि न्यायालय की बदनामी भी हुई। इस कृत्य से दैनंदिनी के न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिला।

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