जनज्वार विशेष

दिल्ली दंगों में सबसे ज्यादा प्रभावित हैं मजदूर, 5 दिन से नहीं है कोई काम

Prema Negi
29 Feb 2020 4:01 AM GMT
दिल्ली दंगों में सबसे ज्यादा प्रभावित हैं मजदूर, 5 दिन से नहीं है कोई काम
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दिल्ली हिंसा की आग में सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों और दिहाड़ी मजदूरी करने वालों को हुआ है, गरीबी और मजदूरी करने वाले बड़ी संख्या में ये मजदूर करावल नगर के उन इलाकों में रहते हैं, जहां पर हिंसा हुई थी, जनज्वार टीम इन मजदूरों के बीच पहुंची और जाना उनका हाल....

करावलनगर, शिवविहार के दंगाग्रस्त इलाकों से लौटकर विकास राणा की रिपोर्ट

जनज्वार। दिल्ली में हुई हिंसा और आगजनी से लाखों का समान जल कर खाक हो गया। हिंदू- मुस्लिम की आपसी नफरत के कारण दिल्ली का उत्तरी पूर्वी इलाका पूरी रात मारपीट, हत्याओं और सांप्रदायिकता के नफ़रत भरे नारों के साथ जलकर खाक हो गया।

से में कई लोगों ने अपनी उम्रभर की संपत्ति को तो खोया ही साथ ही कई लोगों ने अपने परिवार के कई सदस्यों को भी खो दिया। मगर सांप्रदायिकता की आग में सबसे ज्यादा नुकसान जिन्हें हुआ वो वह वर्ग है, जो दो वक्त की रोटी को चलाने के लिए करावल नगर की फैक्ट्रियों में काम करता था। हिंसा की आग में सबसे ज्यादा नुकसान इन गरीबों और दिहाड़ी मजदूरी करने वाले लोगों को हुआ हैं। गरीबी और मजदूरी करने वाले बड़ी संख्या में ये मजदूर करावल नगर के उन इलाकों में रहते हैं, जहां पर हिंसा हुई थी।

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हिंसा में तो इन मजदूरों को नुकसान हुआ ही, लेकिन स्थिति शांत होने के बाद भी इन दिहाड़ी मजदूरों के लिए कोई अच्छे हालात नहीं हो पाए हैं। इस दौरान जनज्वार टीम को कई मजदूर करावल नगर की सड़कों के आसपास बैठे हुए परेशान दिखे। हिंसा के बाद से ही काम ना मिल पाने के कारण कई मजदूरों के पास दो समय की रोटी खाने के लिए भी पैसा नहीं बचा था। कई मजदूरों को उम्मीद थी कि हिंसा की ये आग जब खत्म होगी तो हम लोग वापिस अपने काम पर जाकर काम कर पाएंगे, लेकिन अभी भी काम ना मिल पाने के कारण ये लोग सड़कों के किनारें काम की उम्मीद से बैठे हुए दिखे।

न्हीं दिहाड़ी मजदूरी करने वाली गौरी जो अपनी 15 साल की कमाई हिंसा में गवा चुकी थी बताते हुए फफक पड़ती है। कहती है, नफ़रत की इस हिंसा से हम लोगों को काफी ज्यादा नुकसान हुआ है। मेरी पिछले 15 सालों की कमाई जो मैंने अपन मेहनत से जोड़ी थी पूरी तरह खत्म हो गई। हम लोगों ने अपनी मेहनत से जो कुछ भी कमाया था वो पूरी तरह से जल कर राख बन गया। अब हम लोगों के सिर पर रहने को छत भी नहीं बची है।

आगे कहती है, हिंसा के समय में घर पर ही थी, लेकिन जब इलाके में तोड़फोड़ शुरू हुई तो मैं अपने बच्चों को लेकर घर से बाहर की ओर भागी। इस दौरान जो समान मुझे दिखा उसे मैंने उठा लिया। हिंसा के बाद हमारे पास एक बर्तन भी नहीं बचा है, जिससे हम अपने बच्चों का पेट भर सके। हिंसा के खत्म होने के बाद जब हम अपने घर की तरफ गए तो हमारी पूरी झोपड़ी को जलाया जा चुका था। हमें अभी तक कोई सरकारी मदद भी नहीं मिली है। लोगों से पैसे मांग कर हम लोग अपना गुजारा कर रहे हैं। हम लोग पहले से काफी गरीब थे अब हालात ऐसे हो गए हैं कि कूड़े में रहने को मजबूर हैं। अब तो ये लगता है कि बस जहर खाकर मर जायें।

शिव विहार चौराहे की सड़क के किनारे रहने वाले ब्रह्म सिंह जो लोहे के बर्तन बना कर अपनी रोजी रोटी को चलाते हैं, कहते हैं, 24 फरवरी को करीब 2 बजे के आसपास हिंदू-मुस्लिम आपस में झगड़ना शुरू हो गए। हिंसा शुरू होने के बाद से ही इलाके में लोग एक दूसरे को मारने के लिए तैयार बैठे थे। कई घरों की छत्तों से लोगों के ऊपर हमला किया जा रहा था। लोगों के घरों में आग लगाई जा रही थी, जिसके बाद में अपने बच्चों को पास के ही घर की छत पर भागता हुए ले गया। जब मुझे लगा कि अब हम यहां पर भी सुरक्षित नहीं है तो छत से उतरकर नाले के रास्ते से भागते हुए अपने बच्चों को नाले की पटरी पर जाकर छुप गए और माहौल शांत होने तक अंदर ही बैठे रहे।

दौरान हमारी सारी झुग्गियों को जला दिया गया था और जिन औजारों से हम लोग काम करते थे, उनका भी कुछ पता नहीं था। इससे पहले भी हम लोगों को पुलिस की ओर से काफी परेशानी होती थी, लेकिन हिंसा ने हमारी सारी रोजी रोटी को छीन लिया। हिंसा ने हमारी उम्रभर की कमाई को हमसे छीन लिया।

हिंसा के बाद पिछले 4 दिनों से काम ना मिलने से नाराज बैठे बंदायू से आए लक्ष्मण बताते हैं, हिंसा ने लोगों की जानों के साथ-साथ हमारी रोजी-रोटी को भी छीन लिया है। हम लोग पिछले 4 दिनों से बेरोजगार बैठे हुए हैं। रोजाना 200-300 रूपए कमा कर अपनी रोजी रोटी को चला लेते थे, लेकिन हिंसा के कारण पिछले 4 दिनों से कोई काम नहीं मिल पाया है। अब तो जो 100-200 रुपए बचे हुए थे वो भी खत्म हो गए हैं। काम ना मिलने के कारण दूसरों से उधार ले कर अपनी भूख को मिटा रहे है। दंगों के बाद काम वाली जगह पर भी धारा 144 लगा दी गई है। अब मुझे तो नहीं लगता एक महीने तक हमें कोई रोजगार मिल पाएगा।

लेबर चौक पर बैठे राजकुमार भी अपनी उम्रभर की कमाई दिल्ली हिंसा में खो चुके हैं। जिस समय हिंसा हुई उस वक्त राजकुमार काम पर गए हुए थे। कहते हैंं, दंगे की खबर मिलने के बाद मैं अपने घर की तरफ भागा मेर घर पर 4 बच्चे और मेरी बीबी थी, जिनको लेकर मुझे काफी ज्यादा चिंता हो रही थी। माहौल बिगड़ता देख और लोगों को एक—दूसरे का खून का प्यासा देखा तो अपने घर और उम्रभर की संपत्ति को छोड़कर बाहर की ओर भागा। माहौल शांत होने पर जब में वापिस घर की तरफ गया, तो मेरी पूरी झुग्गी जल चुकी थी। जो पैसे बचे हुए थे, उनका कुछ पता नहीं था।

सके बाद जो पैसे मेरे पास रह गए थे, उनसे 2 दिन का गुजारा ही चल पाया। लेकिन अब जब पूरे इलाके में सारी फैक्ट्रियों में काम बंद हो जाने से हम लोगों के पास खाने के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं। ऊपर से बच्चों के कपड़े उनकी किताबें कुछ नहीं बचा। हमारे पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि हम अपने बच्चों का पेट भर सकें। दिल्ली सरकार हो या केंद्र सरकार उनकी तरफ से भी अभी हमें कोई मदद नहीं मिल पाई हैं। मुझे तो समझ में भी नहीं आ रहा है कि आगे मेरे साथ क्या-क्या होगा।

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