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राजनीति

महागठबंधन में शामिल होती कांग्रेस तो यूपी में जुड़ जातीं दो दर्जन अधिक सीटें

Prema Negi
25 May 2019 5:12 AM GMT
महागठबंधन में शामिल होती कांग्रेस तो यूपी में जुड़ जातीं दो दर्जन अधिक सीटें
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फिरोजाबाद में सपा की हार का कारण बने शिवपाल तो राजा भैया के कारण गठबंधन-कांग्रेस ने गंवाई दो सीटें

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार। 23 मई को भारी बहुमत के साथ एक बार फिर मोदी सरकार केंद्र में सत्तासीन हो गयी है। मगर यह जीत अपने पीछे बहुत सवाल भी छोड़ गई है। उत्तर प्रदेश में तो तकरीबन दो दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां अगर कांग्रेस ने सपा—बसपा के साथ गठबंधन कर लिया होता और सपा से छिटककर कुंडा के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया ने जनसत्ता पार्टी बनाकर अलग चुनाव नहीं लड़ा होता, शिवपाल ने स्वयं चुनाव नहीं लडा होता तो परिणाम ऐसा नहीं होता और भाजपा 40 सीटों के आसपास सिमट जाती।

कुछ ऐसा ही हाल दिल्ली का भी है, जहां सातों सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि न सिर्फ दिल्ली, उत्तर प्रदेश बल्कि कई अन्य जगह भी अगर तालमेल अच्छा रहता तो चुनाव परिणाम बहुत हद तक यूपीए के पक्ष में हो सकते थे।

गौरतलब है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के खाते में 19.28 फीसद वोट आए। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) को 18 फीसद वोट मिले तथा अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के हिस्से (आरएलडी) सिर्फ 1.67 फीसद वोट मिले। इन तीनों पार्टियों को मिले कुल मत प्रतिशत को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 38.95 फीसद पर पहुंच पाता है, जबकि अकेले भाजपा ने 49.55 फीसद वोट हथिया लिया। यानी, एसपी, बीएसपी और आरएलडी को जोड़कर जितने प्रतिशत वोट आए उससे 10 फीसद से ज्यादा वोट अकेले बीजेपी ने हासिल किए।

एसपी-बीएसपी से बात नहीं बनने पर उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी ने 6.67 फीसद वोट हासिल किए। यानी, सीधी-सपाट गणना करें तो एसपी, बीएसपी और आरएलडी के गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को जोड़ने पर भी मत प्रतिशत के लिहाज से भाजपा अकेले आगे है। एसपी, बीएसपी, आरएलडी और कांग्रेस के मत प्रतिशत को जोड़ने पर आंकड़ा 45.42 फीसद तक पहुंचता है जो बीजेपी से 4.13 फीसद कम है। पहले कहा जा रहा था कि पहले कहा जा रहा था कि यूपी में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ मिल जाती है तो भाजपा 5 सीट पर सिमट जाएगी, बाकी की 75 सीटें बीएसपी, एसपी, आरएलडी और कांग्रेस के खाते में चली जाएंगी।

यह अंक गणित है, पर वास्तव में इन दलों को मिले वोटों से पता चलता है कि इस चुनाव में पहले तो कांग्रेस को गठबंधन में न लेकर सपा-बसपा ने गलती की, दूसरे सारी सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारे, फिर जिन सीटों पर नहीं लड़ी वहाँ खुलकर अपने समर्थकों से गठबंधन को समर्थन देने को नहीं कहा। नतीजतन खाली सीटों पर कांग्रेस के सवर्ण समर्थक भाजपा के पाले में चले गये और कई सीटों पर कांग्रेस को मिले वोटों ने गठबंधन को ही हरा दिया।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश का मछलीशहर एक ऐसा संसदीय क्षेत्र रहा, जहां भाजपा प्रत्याशी बीबी सरोज ने बसपा के टी राम को मात्र 181 मतों से पराजित किया। मछलीशहर में कांग्रेस का उम्मीदवार ही नही था। इसी तरह 10 हज़ार से कम के अंतर पर जीत वाली भी उत्तर प्रदेश में 3 सीटें रहीं। मेरठ में भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल ने बसपा प्रत्याशी याकूब कुरैशी को सिर्फ 4729 मतों से पराजित किया, कांग्रेस के हरेन्द्र अग्रवाल को 34479 मत मिले, जिसने बसपा को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वहीं मुजफ्फरनगर से भाजपा के संजय संजीव बालियान ने रालोद के चौधरी अजीत सिंह को मात्र 6526 मतों से जीत का सेहरा अपने माथे बांधा,यहाँ नोटा को 5110 वोट मिले जो अजीत सिंह के लिए पराजय का कारण बन गये ।

डिंपल यादव के लिए भी महागठबंधन का न होना हार का बड़ा कारण बना, क्योंकि उनकी हार का अंतर भी मात्र 11416 रहा। यहाँ भी नोटा को 8165 वोट मिले। कन्नौज से भाजपा के सुब्रत पाठक से समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव की यह हार सभी के लिए चौकाने वाली रही। कुछ ऐसी ही जीत भाजपा की मेनका गांधी ने भी दर्ज की है। इस बार अपनी सीट पीलीभीत को बेटे के लिए सुरक्षित कर सुल्तानपुर से चुनावी मैदान में उतरी मेनका को भी हार का सामना करना पड़ता, अगर यहां सपा—बसपा—कांग्रेस ने अपना संयुक्त प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारा होता। मेनका गांधी बसपा के चंद्र भद्र सिंह से मात्र 13260 मतों से जीत दर्ज कर पायीं।कांग्रेस के संजय सिंह को 41681 मत मिले

इसी तरह चंदौली में महेंद्र नाथ पांडे ने सपा के संजय चौहान को मात्र 13959 मतों से शिकस्त दी।यहाँ नोटा को 11218 मत मिले और जन अधिकार पार्टी की शिवकन्या कुशवाहा को 22291 मत मिले। बलिया में भी भाजपा के वीरेंद्र सिंह मस्त ने समाजवादी पार्टी के सनातन पांडे को सिर्फ 15519 मतों से हराया। यहाँ नोटा को 9615 मत मिले। इन दोनों सीटों पर कांग्रस का न तो कोई उम्मीदवार था न कांग्रेस ने गठबंधन को समर्थन दिया था। कुछ ऐसा ही बदायूं में देखने को मिला, जहां भाजपा की संघमित्रा मौर्य सपा के धर्मेंद्र यादव से सिर्फ 18384 मतों से जीते।यह कांग्रेस के सलीम शेरवानी को 51947 और नोटा को 8606 मत मिले।

बस्ती में भाजपा के हरीश द्विवेदी ने बसपा के रामप्रसाद को 30354 मतों से हराया। बस्ती में कांग्रेस के राज किशोर सिंह को 86920 वोट मिले। संत कबीर नगर में भाजपा के प्रवीण निषाद ने बसपा के भीष्म तिवारी को 35749 मतों से पराजित किया। यहाँ कांग्रेस के भाल चन्द्र यादव को 128506 मत और नोटा को 12631 मत मिले। इसी तरह कौशांबी में भाजपा के विनोद सोनकर ने सपा के इंद्रजीत सरोज को 39052 मतों से हराया, तो भदोही में भाजपा के रमेश बिंद ने बसपा के रंगनाथ मिश्र को 43615 मतों से हराया।

भदोही में कांग्रेस के रमाकांत यादव को 25604 तो नोटा को 9087 मत मिले। बागपत में भी भाजपा के सत्यपाल सिंह रालोद के जयंत चौधरी से 23128 मतों से जीते, तो फिरोजाबाद में भाजपा के चंद्र सेन जादौन सपा के अक्षय यादव से 28781 मतों के मामूली अंतर से जीते।फिरोजाबाद में सपा के बागी और अपनी पार्टी बनाने वाले शिवपाल सिंह यादव को 91869 मत मिले।

बाँदा में भाजपा के आरके सिंह पटेल को 477926 मत मिले और सपा के श्यामा चरण गुप्ता को 418988 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के बाल कुमार पटेल को 75438मत मिले और आरके सिंह पटेल जीत गये। बाराबंकी में भाजपा के उपेन्द्र सिंह रावत को 535917 वोट मिले, जबकि सपा के राम सागर रावत को 425777 मत तथा कांग्रेस के तनुज पुनिया को 159611 मत मिले। इस तरह भाजपा यहाँ जीत गयी। धौरहरा में भाजपा की रेखा वर्मा को 512905 मत मिले, जबकि बसपा के अरशद इलियास सिद्दीकी को 352294 मत तथा कांग्रेस के कुंवर प्रसाद को 162856 मत मिले। यहां भी गठबंधन न होने के कारण भाजपा जीत गयी।

कौशाम्बी और प्रतापगढ़ की कहानी भी इसी तरह है। कौशाम्बी से भाजपा के विनोद कुमार सोनकर को 383009 वोट मिले, जबकि सपा के इन्द्रजीत सरोज को 344287 वोट तो राजा भय्या के प्रत्याशी शैलेन्द्र कुमार को 156406 मत मिले और भाजपा जीत गयी। इसी तरह प्रतापगढ़ में भाजपा के संगम लाल गुप्ता को 436291 मत मिले, जबकि बसपा के अशोक त्रिपाठी को 318539 वोट तथा कांग्रेस की राजकुमारी रत्ना सिंह को 77096 मत तथा राजा भय्या कि पार्टी के अक्षय प्रताप सिंह उर्फ़ गोपालजी को 46963 मत मिले और भाजपा को विपक्ष के मत विभाजन का लाभ मिला और वह यहाँ जीत गयी।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी इस बार की हार अपचनीय है, क्योंकि उनकी हार का अंतर भी मात्र 55120 वोट रहा। इस हार को हालांकि अभी तक कई लोग पचा नहीं पा रहे हैं, ईवीएम को लेकर उठने वाले सवालों का दौर अभी भी जारी है। ऐसा ही कुछ रॉबर्ट्सगंज में भी देखने को मिला, जहां अपना दल के पकौड़ी लाल ने सपा के भाई लाल कोल को 54396 मतों से हराया। इतने कम अंतर से लगभग दो दर्जन सीटों पर हार ने निश्चित ही गठबंधन और कांग्रेस दोनों के चुनावी गणित गड़बड़ाकर रख दिया।

गौरतलब है कि चुनाव होने के बाद भी एग्जिट पोल में भाजपा को सभी राजनीतिक विश्लेषक और सर्वे 40 से ज्यादा सीटें नहीं दे रहे थे, जिसका मुख्य कारण इतनी भारी संख्या में हार का अंतर 50 हजार वोट से भी कम अंतर होना रहा।

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