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विमर्श

मूर्ख नहीं अति चालाक हैं मोदी, मीडिया को उलझाने के लिए हैं मूर्खतापूर्ण हरकतें

Prema Negi
19 May 2019 3:27 PM GMT
मूर्ख नहीं अति चालाक हैं मोदी, मीडिया को उलझाने के लिए हैं मूर्खतापूर्ण हरकतें
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पढ़िए क्यों कह रहे हैं स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मुनीष कुमार कि नरेंद्र मोदी हैं मीडिया के रिंग मास्टर...

मोदी के इशारे पर उनके भक्त ही नहीं नाचते हैं, बल्कि धुर विरोधी भी मोदी की ताल पर थिरकते हैं। वर्तमान लोकसभा चुनावों को मुद्दाविहीन बनाने में मोदी का कोई जवाब नहीं है। मोदी की खासियत है कि वह अपने धुर विरोधियों व आलोचकों को भी अपनी पिच पर खेलने के लिए मजबूर कर देते हैं तथा उनके एजेन्डे भी सैट कर देते हैं।

17 मई को लोकसभा चुनावों के अंतिम चरण के चुनाव प्रचार के समाप्त हो जाने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी लगातार मीडिया की सुर्खियां बने हुए हैं। केदारनाथ में लाल कार्पेट पर लद्दाखी लिबास पहनकर मंदिर की तरफ जाते हुए व गुफा में गेरुआ वस्त्र धारण कर साधना में लीन मोदी के फोटो सबसे ज्यादा उनके विरोधियों ने ही वायरल किए हैं। चुनाव प्रचार समाप्त हो जाने बाद भी सोशल मीडिया पर उन्हीं की चर्चा हो रही है।

‘बदनाम हुआ तो क्या नाम न होगा’ सूक्ति का भाजपा भरपूर इस्तेमाल कर रही है। सोशल मीडिया पर उनको लेकर दि लाई (झूठा) लामा जैसे कमेन्ट भी मोदी को ही स्थपित कर रहे हैं। दो दिन पूर्व पत्रकार वार्ता में पत्रकारों के सवालों के जवाब न देकर भी मोदी ने अपने आपको विरोधियों के बीच चर्चा में बनाए रखा।

पिछले सप्ताह बालाकोट एयर स्ट्राइक मामले में बादलों के कारण भारतीय विमान का पाकिस्तान के रडार में न आ पाने का बयान विरोधियों की फेसबुक बाॅल पर लगातार छाया रहा। डिजिटल कैमरे व ईमेल को लेकर दिया गया उनका बयान लोगों ने चटकारे लेकर खूब शेयर किया।

जो लोग समझते हैं कि मोदी मूर्ख हैं, यह उनके कौरे भ्रम के सिवाय कुछ नहीं है। मोदी मूर्ख नहीं, बल्कि बहुत चालाक हैं। वे नहीं चाहते कि चुनावों में उनकी सरकार के पिछले 5 वर्षों के कार्यकाल की उपलब्धियां देश में बहस का मुद्दा बने।

परिणाम सामने है नोटबंदी, महंगाई, बेरोजगारी, जीएसटी, किसानों मजदूरों व आम आदमी की समस्याएं इन चुनावों में मुद्दा नहीं हैं। मुद्दे हैं मोदी द्वारा जानबूझकर विभिन्न समयों पर दिये गये मूर्खतापूर्ण बयान।

विडम्बना यह है कि मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे विपक्ष के पास भी एक ही मुद्दा है मोदी हटाओ और कुर्सी उनके हाथों में सौंप दो। देश की जनता की समस्याओं को हल करने के लिए कोई ढंग भी ब्लू प्रिंट विपक्षी दलों के पास नहीं है।

मोदी ने पिछले 5 वर्षों में उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की जिन नीतियों को आगे बढ़ाया है, उनकी जनक कांग्रेस ही है। देश को गर्त तक पहुंचाने व जनता को तबाह करने में कांग्रेस व विपक्षी दलों ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। यही कारण है कि कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष का चुनाव प्रचार मात्र मोदी विरोध तक ही सीमित होकर रह गया है और इन चुनावों में मोदी को हटाना ही एकमात्र कार्यभार घोषित कर दिया गया है।

इमरजेंसी के बाद 1977 में विपक्ष ने नारा दिया गया था इंदिरा हटाओ देश बचाओ। 1977 के चुनावों में इंदिरा व कांग्रेस पार्टी चुनाव हारकर सत्ता से हट भी गयीं थी। सवाल उठता है कि क्या इंदिरा के हट जाने से तब देश बच गया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने क्या देश के मजदूर, किसानों, छात्रों, बेरोजगारों की समस्याओं को दूर कर दिया था।

अब यही सवाल फिर से देश के सामने है कि क्या मात्र मोदी को हटा देने से देश को बचा लिया जाएगा। जो लोग ऐसा सोचते हैं वे या तो बेहद नादान हैं या फिर जानबूझकर अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए जनता को पुनः भ्रम में डालना चाहते हैं।

मोदी जैसे जनविरोधी शासक को देश की सत्ता से हटाया जाना बेहद जरूरी है, मगर मोदी को हटा देने मात्र से देश नहीं बचेगा। देश को बचाना है तो देश में जो नीतियां चल रहीं हैं उन नीतियां उलटने की जरूरत है।

देश से गरीबी-बेरोजगारी दूर करने के लिए जरूरी है कि देश के संविधान में संशोधन कर सभी देशवासियों के लिए सम्मानजनक रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य व आवास को मौलिक अधिकार घोषित किया जाए। जातिवाद व लैंगिक असामानता दूर करने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाएं। कश्मीरी व अन्य उत्पीड़ित राष्टीªयताओं के मसले बातचीत से सुलझाए जाएं व कश्मीरी अवाम को आत्मनिर्णय का अधिकार देने का वादा पूरा किया जाए।

दो तरह के स्कूलों की व्यवस्था (अमीरों के लिए दून जैसे प्राइवेट व आम जनता के लिए सरकारी) को बदलकर देश में सभी के लिए समान, निशुल्क व वैज्ञानिक शिक्षा की व्यवस्था को लागू किया जाए। सभी नागरिकों को निशुल्क इलाज का अधिकार दिया जाए। रेल व सड़क यातायात को गांव-गांव तक पहुंचाया जाए। निजी वाहनों का उपयोग बेहद सीमित कर जन यातायात को मजबूत बनाया जाए।

सरकारी संस्थानों व परिसम्पत्तियों के विनिवेश की नीति को उलटकर सभी इजारेदार देशी-विदेशी पूंजी व सम्पत्ति को जब्त कर उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए। किसानों को आत्महत्या से बचाने के लिए खेती में प्रयुक्त होने वाली खाद, बीज, कीटनाशक उन्हें सस्ते दरों पर उपलब्ध कराएं जाए। उनके उत्पादों के सरकारी खरीद की व्यवस्था कर उन्हें कर्जों से मुक्ति दिलाई जाए।

देश के विकास के लिए विदेशी पूंजी निवेश पर निर्भरता समाप्त कर देश के आत्मनिर्भर विकास का माॅडल लागू किया जाए। भारत अपने पड़ोसी मुल्कों पाकिस्तान, बाग्लादेश श्रीलंका नेपाल भूटान जैसे मुल्को से दादागिरी के सम्बन्ध समाप्त कर, बराबरी के आधार पर रिस्ते कायम करे। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, जापान जैसे साम्राज्यवादी मुल्कों के साथ किए सभी गैर बराबरीपूर्ण व्यापारिक समझौते व संधियां निरस्त करे, आदि-आदि।

उक्त कार्यभार हाथ में लेने का माद्दा अभी तक किसी भी दल ने नहीं दिखाया है। इसके लिए मजदूर-किसान व आम जनता के बीच से ही पहल की जानी चाहिए।

(मुनीष कुमार समाजवादी लोक मंच के सहसंयोजक हैं।)

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