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विमर्श

ऐसी दमनकारी पुलिस इमरजेंसी तो दूर, अंग्रेजों के समय भी नहीं रही

Prema Negi
31 Dec 2019 6:02 AM GMT
ऐसी दमनकारी पुलिस इमरजेंसी तो दूर, अंग्रेजों के समय भी नहीं रही
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पुलिस की ऐसी क्रूरता तो शायद चीन, यमन और साउथ सूडान में भी नहीं होगी। दमन के लिए पुलिस कितनी सजग है, इसका अनुमान लगाने के लिए कभी आप नई दिल्ली के जंतर मंतर रोड पर घूम लीजिये, वहां आपको हमेशा प्रदर्शनकारियों से अधिक संख्या में सुरक्षाकर्मी दिखाई देंगे...

महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा कम बोलते हैं, मगर कभी—कभार बहुत तीखी टिप्पणियां करते हैं। हाल में ही उन्होंने कहा था कि टुकड़े-टुकड़े गैंग में केवल दो ही लोग हैं और दोनों बीजेपी में हैं। दरअसल वे अमित शाह के उस बयान का जवाब दे रहे थे, जो उन्होंने दिल्ली की सभा में बड़े निर्लज्ज भाव से कांग्रेस पार्टी के लिए इस्तेमाल किया था।

रा सोचिये, देश का गृह मंत्री किसी मंच पर टुकड़े-टुकडे गैंग को सबक सिखाने की बात करते हैं। यदि गृह मंत्री इस गैंग के कारनामों के बारे में इतने ही विश्वास से बात करते हैं, तब कोई कार्यवाही क्यों नहीं करते। क्या गृह मंत्री का यही काम रह गया है कि कोई गैंग देश में काम करता रहे और उस पर कार्यवाही करने के बजाय किसी मंच से उसे सबक सिखाने की बात की जाए।

स वर्ष के ही नहीं बल्कि इस दशक के भी अंतिम मन की बात नामक प्रवचन में प्रधानमंत्री मोदी देश के युवाओं को भविष्य बताते हैं, बताते हैं कि युवा जागरूक है, प्रश्न पूछता है। जिस समय वे प्रवचन दे रहे होंगे उस समय भी देश के अलग-अलग हिस्सों में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, जिसमें छात्र सर्वाधिक संख्या में हैं, पर पुलिस की लाठियां बरस रहीं होंगीं। पर, प्रधानमंत्री जी का तो मौलिक सिद्धांत है, समस्याएं मत देखो, समस्याएं मत सुनो, समस्याएं मत कहो – बस प्रवचन देते रहो, जिसका सार यही होता है कि इस देश में रहना है तो हमारा समर्थन करो, नहीं तो मार दिए जाओगे।

रकार तो युवाओं को लगातार गुमराह भी कर रही है, कहती है कि विपक्षी पार्टियां युवाओं को गुमराह कर रहीं है, जबकि देशभर के युवा बिना किसी नेतृत्व के एक स्वस्फूर्त आन्दोलन का बिगुल बजा चुके हैं।

स वर्ष के ख़त्म होते-होते सरकार ने तो पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि उनके अकेला एजेंडा हिन्दू राष्ट्र है। इसके लिए सरकार दमन के किसी भी रास्ते पर जा सकती है, इस सरकार के लिए इन्टरनेट पर पाबंदी और धारा 144 तो सामान्य अवस्थाएं हैं। उदाहरण भी सामने है, गृह मंत्री संसद में कहते हैं कि कश्मीर में सब सामान्य है, प्रधानमंत्री जी अमेरिका में बताते है कि कश्मीर में सब सामान्य है, पर पूरी दुनिया वहां इन्टरनेटबंदी, नागरिकों और बच्चों पर यातनाएं और प्रतिबंधित मीडिया की बात कर रही है।

र्ष के अंत तक पुलिस का रवैया अभूतपूर्व हो चुका है, ऐसी दमनकारी पुलिस इमरजेंसी तो दूर की बात है, अंग्रेजों के समय भी नहीं रही। इतिहास के किसी भी मोड़ पर शान्ति से कैंडल मार्च करते लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया और ना की कोई पुलिस अधिकारी एक मिनट में कुछ भी करने की धमकी के साथ-साथ पाकिस्तान भेजने की धमकी देता रहा। इतिहास के किसी भी मोड़ पर एसी धमकियों को यदि दी भी गयीं तो सरकार ने कभी उसे जायज नहीं ठहराया। अब तो यह सब भी होने लगा है।

पुलिस की ऐसी क्रूरता तो शायद चीन, यमन और साउथ सूडान में भी नहीं होगी। दमन के लिए पुलिस कितनी सजग है, इसका अनुमान लगाने के लिए कभी आप नई दिल्ली के जंतर मंतर रोड पर घूम लीजिये, वहां आपको हमेशा प्रदर्शनकारियों से अधिक संख्या में सुरक्षाकर्मी दिखाई देंगे।

हालत तो यहाँ तक पहुँच गयी है कि थल सेनाध्यक्ष भी इन मामलों पर बयान दे रहे हैं और विपक्ष को भड़काने में लगे हैं। इससे अधिक किसी सरकार का चाल, चरित्र और चेहरा की स्पष्ट हो सकता है, जब सरकार के लगातार अपना एजेंडा लागू करने के लिए कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया और यहाँ तक कि सेना का भी सहारा लेना पड़े। ऐसा तथाकथित लोकतंत्र में दुनिया में कहीं नहीं होता है।

समें कोई आश्चर्य नहीं है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ग्लोबल डेमोक्रेसी इंडेक्स 2019 में 41वें स्थान पर था। प्रतिष्ठित पत्रिका द इकोनॉमिस्ट के इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट द्वारा प्रकाशित इस इंडेक्स में भारत का स्थान त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र की सूची में शामिल है। यह इंडेक्स आन्दोलनों को बर्बरतापूर्ण तरीके से रोकने के पहले प्रकाशित कर दिया गया था, जाहिर है अगले वर्ष की सूची में हम कई स्थान नीचे पहुँच जायेंगे।

खैर, इस दशक के बीतते-बीतते कोमा में पड़े लोकतंत्र के वापस आने की उम्मीद तो बंधती ही है। बिना किसी नेतृत्व का युवा जब आन्दोलन शुरू करता है तब इतिहास को फिर से लिखने की जरूरत पड़ती है और तभी भविष्य में किसी रोशनी की उम्मीद जगती है।

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