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इन 7 पूर्व सूचना आयुक्तों ने RTI संशोधन बिल को बताया लोकतंत्र पर हमला

Prema Negi
25 July 2019 4:01 PM GMT
इन 7 पूर्व सूचना आयुक्तों ने RTI संशोधन बिल को बताया लोकतंत्र पर हमला
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आरटीआई संशोधन विधेयक सिर्फ आरटीआई कानून पर हमला नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकार पर भी हमला है, क्योंकि आर. टी. आई. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से निकल कर आती है....

हरियाणा, स्वराज इंडिया। केंद्रीय सूचना आयोग के 7 पूर्व सूचना आयुक्तों ने RTI संशोधन बिल की निंदा करते हुए सरकार से इसे वापस लेने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा है कि सूचना अधिकार संशोधन बिल लोकतंत्र पर हमला है।

विधेयक केंद्र सरकार को केंद्र और राज्य सूचना आयोगों के सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों से संबंधित नियम बनाने का अधिकार देता है। संशोधन सूचना आयोगों की स्वायत्तता और लोगों के मौलिक अधिकार पर सीधा हमला है।

22 जुलाई, 2019 को लोकसभा ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 में आरटीआई संशोधन विधेयक 2019 के माध्यम से संशोधन पारित किया। विधेयक में केंद्र सरकार को केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों के सूचना आयुक्तों की सेवा, कार्यकाल, वेतन, भत्ते और अन्य शर्तों को तय करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देने का प्रस्ताव है। केंद्रीय सूचना आयोग के सात पूर्व सूचना आयुक्तों ने संशोधन की निंदा की है और संशोधनों को "सूचना आयोगों की स्वायत्तता और लोगों के जानने के मौलिक अधिकार पर सीधा हमला करार दिया है। उन्होंने सरकार से "प्रतिगामी संशोधनों" को वापस लेने का भी आग्रह किया है। आरटीआई संशोधन विधेयक 2019 अब राज्यसभा में पारित होने के लिए सूचीबद्ध है।

शैलेश गांधी ने सरकार के इस दावे का खंडन किया कि आरटीआई कानून को जल्दबाजी में तैयार किया गया था और इसलिए इसमें कई विसंगतियां हैं। 2005 में RTI बिल को स्थायी समिति द्वारा पूरी तरह से जांचा गया था - रामनाथ कोविंद और भाजपा के कई सांसद उस समिति के सदस्य थे, जिसने सिफारिश की थी कि सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए आयुक्तों को चुनाव आयुक्तों के बराबर दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री सहित सभी अधिकारियों के फैसलों को उच्च न्यायालयों के समक्ष चुनौती दी गई है और उनकी स्थिति ऐसी चुनौतियों को रोकती नहीं है। इसलिए सूचना आयुक्तों के फैसलों को उच्च न्यायालयों के समक्ष चुनौती दी जा रही है और उनकी स्थिति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समकक्ष होने के कारण कोई कानूनी अड़चन नहीं होगी। उन्होंने कहा कि सरकार इस बारे में ईमानदार नहीं है कि वह ये संशोधन क्यों ला रही है।

दीपक संधू ने कहा कि आरटीआई अधिनियम एक सामाजिक आंदोलन के माध्यम से आया था और आरटीआई संशोधन विधेयक पर जनता के साथ किसी भी प्रकार का विमर्श करने में सरकार की विफलता को रेखांकित किया।

युक्तों ने कहा कि सार्वजनिक परामर्श को सक्षम करने के लिए विधेयक को एक सेलेक्ट समिति को भेजा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोगों का सूचना का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से निकलता है। एक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए सूचना आयुक्त के अंतिम अपीलीय निकाय होने के नाते उनकी स्वायत्तता और स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए।

शोवर्धन आजाद ने कहा कि सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और स्थिति के बारे में किसी भी समस्या के आए बिना आरटीआई अधिनियम पिछले 14 वर्षों से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा एक स्पष्ट प्रयास है और इन शक्तियों की मांग करने वाली सरकार निश्चित ही उनकी स्वतंत्रता में कमी लाएगी।

न्होंने रेखांकित किया कि हर साल दायर होने वाले अधिकांश आरटीआई आवेदन आम नागरिकों और समाज के हाशिए के तबकों द्वारा सरकार से उनके अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए दायर किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि सक्रिय डिस्क्लोजर के उचित कार्यान्वयन से आरटीआई अधिनियम को मजबूत करने व आयुक्तों की नियुक्ति में अधिक पारदर्शिता लाने के बजाए सरकार कानून में संशोधन कर रही थी।

एम.एम. अंसारी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे सीबीआई, चुनाव आयोग जैसे स्वतंत्र निकायों को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं और कहा कि अब ऐसा लगता है कि सूचना आयोगों की बारी है। उन्होंने कहा कि आरटीआई की उत्पत्ति सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से हुई कि सूचना का अधिकार मतदान की एक पूर्व शर्त है। सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा सक्रिय डिस्क्लोजर के प्रावधानों के अनुपालन पर एक आकलन किया गया था, केवल एक-तिहाई सार्वजनिक अधिकारियों ने उन्हें भेजे गए सर्वेक्षण का जवाब दिया। अंसारी ने अधिनियम की धारा 4 के कार्यान्वयन के विश्लेषण को

निराशाजनक बताया।

सके अलावा उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि सरकार ने 'जनाने का हक ’ शो बंद कर दिया था, जो डीडी न्यूज़ पर प्रसारित आरटीआई अधिनियम पर एक साप्ताहिक शो हुआ करता था। सूचना आयुक्तों को समय पर नियुक्त करने में विफलता बढ़ती पेंडेंसी की ओर ले जा रही थी।

न्नपूर्णा दीक्षित ने कहा कि संशोधन कर कमजोर करने के इस प्रयास को आरटीआई के खिलाफ भेदभाव के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि सीवीसी की तरह अन्य निकाय भी हैं जो वैधानिक हैं, लेकिन जिनकी तनख्वाह और स्थिति संवैधानिक निकायों (इस मामले में यूपीएससी के सदस्य) के बराबर हैं, जबकि सूचना आयोग के विपरीत, सीवीसी मौलिक अधिकार के लिए अंतिम अपीलीय निकाय नहीं है, बल्कि यहां सिर्फ सिफारिश की जा सकती है। उन्होंने मांग की कि सरकार को बिल वापस लेना चाहिए।

श्रीधर आचार्युलु ने कहा कि आरटीआई संशोधन विधेयक सिर्फ आरटीआई कानून पर हमला नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकार पर भी हमला है, क्योंकि आर. टी. आई. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से निकल कर आती है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि संशोधनों में सरकार यह निर्दिष्ट नहीं कर रही है कि आयुक्तों को क्या स्टेटस दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि कैबिनेट सचिव या प्रमुख सचिव को निर्देश देने में सक्षम बनाने के लिए आयुक्तों को उच्च स्टेटस देना महत्वपूर्ण है।

स संशोधन से केंद्र सरकार को राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन निर्धारित करने का अधिकार मिलेगा, जो भारत के संघीय ढांचे पर भी सवाल खड़े करता है क्योंकि राज्य आयुक्तों का वेतन राज्य के धन से आता है, तो क्या राज्य केंद्र को आयुक्तों का वेतन निर्धारित करने देगी?

जाहत हबीबुल्लाह ने कहा कि अगर किसी संशोधन की आवश्यकता है तो वो सूचना आयोग को संवैधानिक संस्था बनाने की है। उन्होंने कहा कि सरकार का उनके वेतन और कार्यकाल तय करना उनके मन में आशंका पैदा करता है। उन्होंने कहा कि चूंकि सरकार का फ्लैगशिप कार्यक्रम सफाई पर था, इसलिए आरटीआई कानून शासन में स्वछता सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा साधन है और इसलिए इसे कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

2014 के बाद से, सरकार ने एक भी आयुक्त अदालत के हस्तक्षेप के बगैर नियुक्त नहीं किया। आरटीआई कार्यकर्ता लोकेश बत्रा ने फरवरी 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया और कहा कि सूचना आयुक्तों की समय पर और पारदर्शी नियुक्ति के फैसले के बावजूद सरकार ने आज तक सीआईसी में 4 खाली पदों को नहीं भरा है। सभी ने सर्वसम्मति से मांग की कि संशोधन को वापस लिया जाए।

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