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सुप्रीम कोर्ट ने कहा विशाखा गाइडलाइन लागू नहीं की जा सकती धार्मिक स्थलों पर

Prema Negi
23 July 2019 3:40 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने कहा विशाखा गाइडलाइन लागू नहीं की जा सकती धार्मिक स्थलों पर
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विशाखा गाइडलाइन धार्मिक स्थलों पर लागू किये जाने संबंधी याचिका पर फैसला देते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने कहा इसको नहीं बढ़ाया जा सकता है धार्मिक स्थलों तक, याचिकाकर्ता इसे लेकर जा सकते हैं संबंधित प्राधिकरण के पास...

जेपी सिंह की रिपोर्ट

च्चतम न्यायालय ने सोमवार 22 जुलाई को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें यह मांग की गई थी कि देशभर के आश्रमों, मदरसों व कैथोलिक संस्थाओं जैसे धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से यौन उत्पीड़न के लिए विशाखा गाइडलाइन लागू करने के निर्देश जारी किए जाएं। याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने कहा कि विशाखा गाइडलाइन को धार्मिक स्थलों तक नहीं बढ़ाया जा सकता है। याचिकाकर्ता इसे लेकर संबंधित प्राधिकरण के पास जा सकते हैं।

नहित याचिका में डेरा सच्चा सौदा, आसाराम, अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं से यौन उत्पीड़न के मामलों का हवाला हुए कहा गया था कि उच्चतम न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं से यौन उत्पीड़न के लिए विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के फैसले में विशाखा गाइडलाइन जारी की थी, लेकिन देशभर के आश्रमों, मदरसों व कैथोलिक संस्थाओं में महिलाओं के यौन उत्पीड़न, रेप व छेड़छाड़ के मामलों के लिए कोई नियम नहीं हैं।

याचिका में कहा गया था कि ऐसे स्थानों पर महिलाओं की शिकायतों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए विशाखा गाइडलाइन को इन जगहों पर भी लागू किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया था कि जहां भी धार्मिक शिक्षा दी जाती हो या प्रवचन दिए जाते हों, वहां ये व्यवस्था लागू हो।

कील मनीष पाठक द्वारा दाखिल जनहित याचिका में कहा गया था कि ये महिलाओं के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19 (अभिव्यक्ति की आजादी), 21 (जीने के अधिकार) और 25 (धार्मिक स्वतंत्रता ) के अधिकारों के खिलाफ है। इसलिए उच्चतम न्यायालय केंद्र सरकार को ये निर्देश दे कि वो देशभर के ऐसे स्थलों के आंकड़े व जानकारी जुटाए और इनके संचालकों की पुरानी पृष्ठभूमि की भी जांच करे।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने 1997 में सभी दफ्तरों में ऐसी कमिटी बनाने का आदेश दिया था। 1997 से पहले महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाले यौन-उत्पीड़न की शिकायत आईपीसी की धारा 354 (महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ या उत्पीड़न के मामले) और धारा 509 (किसी औरत के सम्मान को चोट पहुंचाने वाली बात या हरकत) के तहत दर्ज करवाती थीं।

र्ष 2012 में भी उच्चतम न्यायालय ने 1997 में जारी विशाखा गाइडलाइंस द्वारा दी गई व्यवस्था के दायरा बढ़ाते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया और भारतीय चिकित्सा परिषद जैसी सभी नियामक संस्थाओं को निर्देश दिया था कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों से निबटने के लिए वे अपने यहां समितियां गठित करें।

19 अक्टूबर 2012 को तत्कालीन जज जस्टिस आरएम लोढा की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय खंडपीठ ने मेधा कोतवाल लेले की याचिका पर अपने फैसले में नियामक संस्थाओं और उनसे संबद्ध सभी संस्थानों को1997 में विशाखा दिशा निर्देश दो महीने के भीतर लागू करने का निर्देश दिया था।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने 1997 में सरकारी महकमों और सार्वजनिक उपक्रमों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं से निबटने के लिए दिशा निर्देश जारी किए थे। इन दिशा निर्देशों के अनुसार कार्यस्थलों और दूसरे संस्थानों पर यौन उत्पीड़न की घटनाओं की रोकथाम करना और ऐसे विवादों के समाधान तथा कानूनी कार्यवाही के लिए सभी उचित कदम उठाना नियोक्ता या अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों का कर्तव्य होगा।

दिशा—निर्देशों में यह भी कहा गया था कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न निषेध करने के नियमों को अधिसूचित करने के साथ ही इनका प्रकाशन और वितरण भी किया जाना चाहिए। इसमें यौन उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ दंड का भी प्रावधान होना चाहिए।

स न्यायिक व्यवस्था के तहत निजी नियोक्ताओं को भी अपने आदेशों में यौन उत्पीड़न निषेध को शामिल करने का निर्देश दिया गया था। दिशा निर्देशों में ऐसे मामलों की जांच के लिए शिकायत समिति गठित करने की सिफारिश की गई थी। ऐसी समितियों का अध्यक्ष किसी महिला को बनाने और समिति में कम से कम आधी संख्या महिला सदस्यों की रखने की भी सिफारिश की गई थी।

न्यायिक व्यवस्था में उच्च स्तर से किसी प्रकार के अनावश्यक प्रभाव की संभावना समाप्त करने के इरादे से समिति में तीसरे पक्ष के रूप में किसी गैर सरकारी संगठन या यौन उत्पीड़न के मामलों से परिचित किसी अन्य संस्था को भी इसमें शामिल करने की सिफारिश की गई थी।

च्चतम न्यायालय के इन निर्देशों को ही 'विशाखा गाइडलाइन्स' के रूप में जाना जाता है। इसे विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार मामले के तौर पर भी जाना जाता है। इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यौन-उत्पीड़न, संविधान में निहित मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15 और 21) का उल्लंघन है। इसके साथ ही इसके कुछ मामले स्वतंत्रता के अधिकार (19) (1) (g) के उल्लंघन के तहत भी आते हैं।

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