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इरफान हमारे बीच से उस समय गए जब दुख भी एक प्रोजेक्ट की तरह है

Prema Negi
2 May 2020 10:32 AM GMT
इरफान हमारे बीच से उस समय गए जब दुख भी एक प्रोजेक्ट की तरह है
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पढ़िये वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव को उनके साप्ताहिक कॉलम 'कातते बीनते' में कि वो क्यों कह रहे हैं हमने दुखी होने में देर कर दी

जनज्वार। पहले इरफ़ान खान गये। फिर ऋषि कपूर। दुख खूब उमड़ा। गोया हम पहले से किसी बात से दुखी थे। बस दिखने के कारण खोज रहे हों। ज़रूरी नहीं कि यह सबके साथ हो, लेकिन इरफ़ान की एक मौत ने हलक में अटकी चीख़ों को बाहर तो ला ही दिया। हम भूल गये कि यह मौतों का सीज़न है। इरफ़ान के बाद भी कुछ घट सकता है। कुछ रस बचाकर रख लें। सब निचोड़ दिया। अगले दिन ऋषि गये तो पहले से पसरे दुख को फैलने की चादर नहीं मिली। वो इरफ़ान का दुख था, जो ऋषि के काम आ गया और उन्हीं के साथ सिमट भी गया।

मौतों पर उपजने वाला मध्यवर्गीय दुख, मध्यवर्गीयों की शराब सा होता है। इसमें चढ़ता हुआ शुरुआती सुरूर रहता है कुछ देर। फिर उसे टिकाये रखना अपनी जिम्मेदारी होती है। मौत और मौत में फ़र्क है। अहमद फ़राज़ लिखते हैं, “नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें...।” ज़रूरी नहीं है। हर अगली मौत, पिछली के दुख को बढ़ा दे ज़रूरी नहीं है। इसे ऋषि कपूर और इरफ़ान के फ़र्क से समझा जा सकता है।

जो फ़र्क आदमी और आदमी में होता है, वही फ़र्क उनकी मौतों से उपजे दुख में होता है। जिस दिन इरफ़ान गुज़रे, 1008 लोग कोरोना से और 308 लॉकडाउन से मर चुके थे। जिस दिन ऋषि गये, 1152 कोरोना से और 310 लॉकडाउन से निपट चुके थे। इरफ़ान से ऋषि तक मौत आयी 146 दरवाज़ों से होकर। ये 146 दरवाज़े इस महादेश में किस प्रान्त के किस ज़िले के किस गांव या शहर में किस मोहल्ले या टोले के हैं, हम नहीं जानते।

निका, अमन और तेजेश देश के किसी कोने में बैठ कर इस बीच कुछ मरने वालों के डेटा संजोने के काम में जुटे हुए हैं। इन मरने वालों की सूची में इरफ़ान और ऋषि कपूर का नाम दर्ज नहीं है। इनमें वे लोग हैं जो खुदकुशी कर रहे हैं; लॉकडाउन में लाठी खाकर मर रहे हैं; भूख का निवाला बन जा रहे हैं; या फिर अपने घर वापस जाते वक्त किसी हादसे का शिकार हो जा रहे हैं। कोरोना से मरने वालों से इन्हें खास सरोकार नहीं है। उनकी गिनती सरकार कर रही है।

प्राथमिकताएं हैं सबकी। उसके हिसाब से नज़र है। लाशों का चुनाव है। दुख है। बारह घंटे पुलिस को जवाब दे चुके अर्णब गोस्वामी अब भी पालघर में ही अटके हैं। उन्हें नहीं पता कि अयोध्या और भोपाल में दो साधु भूख से मर गये हैं। गोरखपुर में एक साधु पुलिस की लाठी से मर गये। बुलंदशहर में दो साधुओं को मार दिया गया। उन्हें यह भी जानने की ज़रूरत नहीं है कि अयोध्या में मरे साधु को सरयू में फेंक दिया गया।

पने-अपने साधु हैं। अपने-अपने वैराग्य।

ह समझना मुश्किल है कि आदमी अपने लिए दुख का सामान कैसे चुनता है। यदि पूरा समाज एक साथ सुखी हो सकता है, तो एक साथ दुखी क्यों नहीं हो सकता? हमने ही कुछ दिन पहले सुख और उम्मीद के क्षण मिलकर मनाये। सबने मिलकर थाली बजायी, घंटी बजायी। सबने मिलकर दीये जलाये। फिर सब मिलकर हर दिन हो रही मौत पर दुखी क्यों नहीं हो रहे? क्या हर एक के दुखी होने के लिए उसकी पसंद के अनुसार अलग-अलग लोगों को मरना पड़ेगा?

टॉलस्टॉय ने एक बड़े काम की बात लिखी थी। उनके उपन्यास “अन्ना करेनिना” का पहला वाक्य थाः “सुखी परिवार सभी एक जैसे होते हैं, हर दुखी परिवार अपने तरीके से दुखी होता है।” उपन्यासकार, शायर से ज्यादा समझदार होता होगा। अहमद फ़राज़ के जैसे टॉलस्टॉय हर शराब को एक नहीं मानते, कि मिला दो तो एक और एक दो हो जाय। वे जानते हैं कि सुखी परिवारों की कहानियों में कहानियां नदारद हैं। कहानियां दुखी परिवारों में हैं। अपने-अपने तरीके से दुखी परिवारों में।

म उनसे क्या सीखें? कहानी हमारे साझे सुख के क्षणों में नहीं है। कहानी उन दुखों में है जो साझा नहीं हैं, अपने-अपने हैं। इसका मतलब ये हुआ कि कहानी साझा दुखों में भी नहीं है। इरफ़ान के जाने से दुखी होने वाला समाज कुछ और है। इसकी कहानी एक ही है। महीने भर में हो चुकी हज़ार से ज्यादा मौतों पर दुखी होने वाले परिवारों का समाज कुछ और। ये हज़ार अलग-अलग दुखहज़ार अलग-अलग कहानियां कहते हैं। इन कहानियों में न इरफ़ान है, न ऋषि। मौतों का डेटा जुटाने बंगलुरु में बैठे तीन टेक्नोक्रेट युवा इन्हीं कहानियों को जमा कर रहे हैं।

ह काम किसी पत्रकार को नहीं सूझा। किसी उपन्यासकार को भी नहीं। लेखक को भी नहीं। इससे यह समझ में आता है कि अपरिचित दुख अब लेखन और विमर्श से गायब हो रहा है। अब वह एक प्रोजेक्ट है। डेटा प्रोजेक्ट। जैसे किसानों की खुदकुशी बीते तीन दशक से एक प्रोजेक्ट है। विमर्श में दुखी होने के लिए किसी 'परिचित' का मरना ज़रूरी है। भले वह नितांत अपरिचित हो।

रीब महीने भर पहले की बात है। गाज़ियाबाद से अपने गांव संडीला लौटे एक कामगार परिवार से फोन पर हालचाल हो रहा था। उसने बताया कि एक किसान भूख के कारण फांसी से लटक गया है। मैंने नाम-गांव पूछा। जवाब आया, “हमरे गांव क थोड़े है कि हम जानी।”

संडीला से हरदोई जिला मुख्यालय, लखनऊ, सीतापुर सब जगह पता किया। पत्रकारों को काम पर लगाया। दो दिन में कायदे से ख़बर की पुष्टि भी न हो सकी। मौत किसके दरवाज़े आयी थी, कोई नहीं बता सका। सबने कहा कि कनिका कपूर का तो पता है, लेकिन किसान का देखना पड़ेगा।

निका कपूर और यस बैंक के राणा कपूर को हुए संक्रमण की ख़बरों पर ऋषि कपूर ने 20 मार्च को ट्वीट किया था: “आजकल कुछ कपूर लोगों पे टाइम भारी है। डरता हूं। हे मालिक रक्षा करना दूसरे कपूरों की।” उस दिन से एक रात पहले बंगलुरु में तिपहिया चलाने वाला 24 साल का शिवकुमार फांसी से झूल गया था। उसे एक पखवाड़े से सवारी नहीं मिली थी।

ह “जनता कर्फ्यू” से पहले ही बात है। यह साधन-संपन्न लोगों में कोरोना के डर के चलते बेकार हो चुकी साधनविहीन आबादी में मौत का पहला मामला है।

मारे दुख को शिवकुमार की मौत से शुरू होना था और इरफ़ान पर जाकर पसरना था। हमने दुखी होने में देर कर दी। बहुत देर। मालिक ने सुनने में देर कर दी।

शायद अब दुख के लिए गुंजाइश ही न बचे। फौजी बूट सड़क पर कदमताल की प्रैक्टिस कर रहे हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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