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आंदोलन

भारत का 'अमेजन' बचाने के लिये छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का संघर्ष

Prema Negi
21 Oct 2019 5:22 AM GMT
भारत का अमेजन बचाने के लिये छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का संघर्ष
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छत्तीसगढ़ राज्य के उत्तर की ओर फैले हसदेव अरण्य क्षेत्र में 17,5000 हेक्टेयर वनभूमि है, जिसमें 30 कोल ब्लॉक चिन्हित हैं, इसी के कारण वन क्षेत्र की 50 हेक्टेयर सघन पेड़ों वाली जमीन है खतरे में, इसी को बचाने के लिए आदिवासी कर रहे हैं संघर्ष...

छत्तीसगढ़ से रोहित शिवहरे की रिपोर्ट

जनज्वार। जहां एक ओर अमेजन के जंगल में आग के प्रकोप से दुनिया दहशत में हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के जंगल बचाने के आंदोलन से सरकारों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अपने जंगल की लड़ाई को गांधी के 150वें साल में उनकी तस्वीर के साथ अहिंसक तौर से लड़ रहे हैं। लोग राज्य की पिछले 15 सालों की भाजपा सरकार के रवैये के बाद वर्तमान कांग्रेस की भूपेश बघेर सरकार से भी अपने आपको ठगा महसूस कर रहे हैं।

रसा कोल ब्लॉक के विरोध और नई खदानों के विस्तार की अनुमति नहीं दिए जाने की मांग को लेकर ग्रामीणों का ग्राम तारा में 14 अक्टूबर यानी पिछले 7 दिनों से अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन जारी है। सरगुजा जिले के विकासखंड उदयपुर अंतर्गत आने वाले कोल ब्लॉक तथा सूरजपुर व कोरबा जिले के अंतर्गत प्रस्तावित कोल ब्लॉकों से लाखों की संख्या में पेड़ों की कटाई होनी है। वन्य क्षेत्र के तीनों जिले सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा आदिवासी बाहुल्य है।

त्तीसगढ़ राज्य के उत्तर की ओर फैले हसदेव अरण्य क्षेत्र में 17,5000 हेक्टेयर वनभूमि है, जिसमें 30 कोल ब्लॉक चिन्हित हैं, जिसके कारण वन क्षेत्र की 50 हेक्टेयर सघन पेड़ों से सजी हरी जमीन खतरे में है।

र्तमान में 6 कोल ब्लॉक के लिए 7730.77 हेक्टेयर वन्य जमीन में विनाश की प्रक्रिया जारी है। 6 कुल ब्लॉकों में से एकमात्र कोल ब्लॉक चुटिया बालको को नीलामी के द्वारा दिया गया है। बाकी पांच कोल ब्लॉकों को विभिन्न राज्य सरकारों ने अपनी मर्जी के हिसाब से आवंटित किया है, जिनके माइन डवलपर एंड आपरेटर Mine Developer and Operator यानी एमडीओ अडानी को दिए गए हैं।

छत्तीसगढ़ में 50 हेक्टेयर सघन पेड़ों वाली जमीन है खतरे में, जिसे बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं आदिवासी

ग्राम हरिहरपर निवासी गणेश कहते हैं, "पिछली राज्य सरकार ने नियम के विरुद्ध भूमि अधिग्रहण किया था और वर्तमान सरकार उसे निरस्त करने की वजह बचाने में लगी हुई है।"

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से पहले वर्तमान प्रदेश के मुखिया बघेल ने तब कि प्रदेश सरकार पर 125 करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन का आरोप लगाया था। आरोप यह भी था कि यह सब अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। साथ ही सरकार में आने पर उसे हटाने और जांच करवाने के बाद की थी।

त्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के समन्वक आलोक शुक्ला कहते हैं, "25 गांव के लोग 10 वर्षों से राज्य सरकारों के इन फैसलों के और कोल ब्लॉक के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, क्योंकि इन खनन परियोजनाओं की वजह से उनका विस्थापन हो रहा है। उनकी संस्कृति खत्म हो रही है। इसके अलावा यहां की जैव विविधता पर्यावरण को भयंकर नुकसान पहुंचा रही है। गांव वाले अपने आपको बचाने से ज्यादा छत्तीसगढ़ को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं।"

2009 में, कोयला मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तीनों मंत्रालयों के संयुक्त अध्ययन के बाद केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र को खनन मुक्त क्षेत्र घोषित किया था।

क्षेत्र के लोगों की प्रमुख मांगें

क्षेत्रवासियों की मांग है कि पेसा कानून 1996 और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 41 के तहत ग्रामसभा की सहमति लिए बिना परसा कोल ब्लॉक के लिए किया गये भूमि अधिग्रहण को निरस्त किया जाए। वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के अनुसार और वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया पूरी किए बिना दी गई स्वीकृति निरस्त कर दी जाए।

हीं हसदेव अरण्य क्षेत्र में परसा, पतुरिया, गिदमुड़ी, मदनपुर साउथ कोल खनन को निरस्त करने की मांग भी आदिवासी कर रहे हैं। आदिवासियों की मांग है कि परसा ईस्ट केते बासन को आगे ना बढ़ाएं जाए। हसदेव अरण्य के पूर क्षेत्र को खनन मुक्त रखा जाए। किसी भी नए कुल ब्लॉक को अनुमति न दी जाए। साथ ही वन अधिकार मान्यता कानून के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन संसाधन के अधिकार को मान्यता देकर वनों का प्रबंधन ग्रामसभाओं को सौंपा जाए।

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