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दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी चूहों, मुर्गों और इंसानों की

Prema Negi
18 Dec 2018 4:44 PM GMT
दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी चूहों, मुर्गों और इंसानों की
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मनुष्यों से 4 गुना ज्यादा हैं दुनिया में मुर्गे, जो कुछ भी मनुष्य को अच्छा लगा, वह आज दिखता है और शेष सभी जीवन हैं नष्ट होने के कगार पर...

बता रहे हैं वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय

जनज्वार। मनुष्य ने अपनी गतिविधियों से दुनिया को इतना बदल डाला है कि अब प्राकृतिक कुछ बचा ही नहीं है। बहुत सारे वैज्ञानिक इस दौर को मानव युग कहने लगे हैं। मनुष्य ने मौसम बदला, पर्यावरण बदला, भू-पटल बदला, महासागरों को बदला और हवा को भी बदल डाला। बहुत सारे नतीजे तो हम रोजमर्रा की जिन्दगी में देखते हैं और अनुभव भी करते हैं।

इन्हीं बदलाव में से एक प्रमुख बदलाव है, पक्षियों, जानवरों और पेड़-पौधों का बदलना। जो कुछ भी मनुष्य को अच्छा लगा, वह आज दिखता है और शेष सभी जीवन नष्ट होने के कगार पर है।

डॉ कर्यस बेनेट, लीसेस्टर यूनिवर्सिटी में जियोलॉजिस्ट हैं और इन्होने रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस नामक जर्नल में एक शोधपत्र प्रकाशित किया है। इसके अनुसार दुनियाभर में मुर्गे के मांस की खपत इतनी अधिक बढ़ गयी है कि हाल के वर्षों में किसी भी समय पर दुनिया में रीढ़धारी जानवरों में सबसे अधिक संख्या में मुर्गे हैं।

अनुमान है कि किसी भी समय दुनिया में 23 अरब जीवित मुर्गे रहते हैं। डॉ बेनेट के अनुसार यह सही मायने में मुर्गा युग है। प्रकृति में प्रजातियों के विकास में लाखों वर्ष का समय लगता है, पर मनुष्य ने मुर्गे का अपने अनुसार विकास कुछ दशकों के भीतर ही कर लिया है। मुर्गा, आज के दौर में मानव के सर्वव्यापी प्रभावों का सबसे बड़ा सूचक है।

डॉ कर्यस बेनेट के अनुसार जैसे बाज़ार में धीरे-धीरे छोटी दुकानें गायब हो रही हैं और सुपरमार्केट पसरते जा रहे हैं, वैसे ही मुर्गे का विकास होता गया और बहुत सारे दूसरे पक्षी विलुप्त होते गए। वर्ष 2014 में मांस के लिए कुल 65.8 अरब मुर्गे मारे गए, जबकि मात्र 1.5 अरब सूअर और 0.3 अरब मवेशी का मांस ही खाया गया।

इस समय दुनिया में 25500 से अधिक सुपरमार्केट अनेक ब्रांडों के फ्राइड चिकन बेचते हैं। ब्रायलर चिकन की मांग सर्वाधिक है, और चिकन के कुल बाज़ार में इसका योगदान 70 प्रतिशत से अधिक है। इनका जीवन चक्र 5 से 7 सप्ताह का होता है। दूसरी तरफ, एक समय दुनिया में सबसे अधिक माने जाने वाला पक्षी, पैसेंजर पिजन, अब दुनिया से विलुप्त हो चुका है। वर्ष 1800 तक इनकी संख्या 3 से 5 अरब तक आंकी गयी थी।

ब्रायलर चिकन की उत्पत्ति दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाने वाले रेड जंगल फाउल से हुई है। इन्हें मनुष्य ने लगभग 8000 वर्ष पहले पालना शुरू किया और वर्ष 1950 के बाद इसे बाजार के अनुरूप परिवर्तित करना शुरू किया। अब इसमें इतने परिवर्तन आ चुके हैं कि यह अपने पूर्वजों से पूरी तरह से अलग हो चुका है।

अब इसमें मांस अधिक होता है और यह तेजी से बढ़ता है। मांस खाकर लोग इसकी हड्डियाँ फेंक देते हैं, जिन्हें अक्सर जमीन के नीचे दबा दिया जाता है। ये कड़ी होती हैं इसलिए लम्बे समय में इनके जीवाश्म बनाने की संभावनाएं अधिक हैं। डॉ कर्यस बेनेट के अनुसार आने वाली पीढियां, यदि तापमान वृद्धि के बाद भी बची रहीं तब जब कभी अपने आसपास का माहौल देखेंगी तब मुर्गे के हड्डियों की भारी संख्या को देखकर आज के पीढ़ी के मुर्गा प्रेम पर आश्चर्य करेंगी।

लन्दन स्थित यूनिवर्सिटी कॉलेज के वैज्ञानिक डॉ टिम न्यूबोल्ड की अगुवाई में किये गए एक अध्ययन के अनुसार दुनियाभर में जिस प्रकार से परम्परागत खेती के बदले आधुनिक खेती का दौर चल रहा है, और शहरों की संख्या बढ़ती जा रही है, उससे दुनियाभर में एक ही तरह के पक्षी और जानवर पनपने लगे हैं।

दुनिया के हरेक शहर में कबूतर किसी भी पक्षी से अधिक हो गए हैं और चूहे पूरी दुनिया में फ़ैल गए हैं। इसका कारण यह है कि कबूतर और चूहे पहले भी अनेक परिवेश में पनप रहे थे। शहरीकरण और कृषि विस्तार के कारण छोटे क्षेत्र में सीमित रहने वाले अधिकतर पशु, पक्षी और वनस्पति विलुप्त हो चुके हैं, या विलुप्तीकरण की तरफ बढ़ रहे हैं।

पीलोस बायोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन को 81 देशों के 20000 पक्षियों, पशुओं और वनस्पतियों की प्रजातियों के अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है।

इतना तो स्पप्ष्ट है कि आदमी ने पूरी दुनिया को अपने तरीके से बदल डाला है। इस बदलाव में जीवन का वही स्वरूप पनपेगा जो इसकी आदतों के अनुरूप हो, या फिर कबूतर और चूहे जैसा हो जो कहीं भी और किसी भी माहौल में पनप सके।

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