संस्कृति

ये अनुरोध करती औरतें आपके दरवाज़े पर खड़ी थीं

Prema Negi
5 Oct 2018 1:05 PM GMT
ये अनुरोध करती औरतें आपके दरवाज़े पर खड़ी थीं
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हिंदी कवि विनय सौरभ की कविताएं

विनय सौरभ की कविताएं पढ़ते लगा कि अरे ये कुछ अधूरी सी लग रहीं, फिर सोचा तब यह आकर्षण कैसा है? ओह, ये इस कदर जीवंत हैं कि अधूरी हैं - 'मेरे बैठने की जगह पर अब धूल थी/ और सामने एक परदा था/ और उसके पीछे स्मृतियाँ थी...।'

'जिल्‍दसाज' विनय की एक मार्मिक कविता है -'अपने देश लौट जाना होगा दादा!/यह सब कहते हुए दुख का कोहरा, मैंने देखा जिल्दसाज़ के चेहरे पर और घना हो रहा था /वह किताबों की आलमारी की तरफ देख रहा था और असहज कर देने वाली चुप्पी के साथ...।' उसे पढते लगता है कि दुनिया कितनी तेजी से बदल रही और कल को इस जिल्‍दसाज को कोई समझने वाला भी बाकी रहेगा क्‍या? पुरानी किताबों में जिल्‍द लगाने की बात छोडिए, ई-बुकों ने तो किताबों के अस्तित्‍व पर ही खतरा पैदा कर दिया है और हम आप सब अपनी पढाई के लिए एक आभासी दुनिया पर निर्भर होते जा रहे। फिर यथार्थ का क्‍या होगा, वह कहां कैसे कितना बचेगा और किस रूप में?

मार्मिकता विनय की कविताओं की ताकत है। वे अपनी पीड़ा तक ही सीमित नहीं हैं, दूसरों के मन में पैठकर उसकी पीड़ा की झलक पा जाना और उसमें शामिल होना सहज है उनके लिए। 'बख्तियारपुर' कविता भी इसका एक उदाहरण है। इसे पढ़ते अपने पिता और उनकी बीमारी और उनका दिल्‍ली आना याद आया। वे भी दिल्‍ली इलाज को आए थे और सोचते थे कि स्‍वस्‍थ होकर जाने से पहले इंडिया गेट और लाल किला घूमेंगे। पर जैसे विनय के पिता रामाधार महतो की चाय नहीं पी सके, मेरे पिता भी वह दिल्‍ली नहीं देख सके जो एक सपने की तरह उनके भीतर कहीं दुबका था। यह दिल्‍ली तमाम निम्‍न मध्‍यवर्गीय लोगों के भीतर दुबकी रहती है और किसी मरणांतक पीड़ा देने वाली बीमारी के समय ही किसी बहाने उभरती है।

अच्‍छी कविता के लिए एक सच्‍ची जिद का होना मुझे जरूरी लगता है। यह जिद बारहा अभिव्‍यक्‍त होती है विनय की कविताओं में। अपनी चर्चित कविता 'मोचीराम' में धूमिल लिखते हैं -'और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िंदा रहने के पीछे/ अगर सही तर्क नहीं है/ तो रामनामी बेंचकर या रंडियों की/ दलाली करके रोजी कमाने में/ कोई फ़र्क नहीं है।' विनय भी सच को कहने से कभी बाज नहीं आते। 'छाता', 'यह ख़रीद लीजिए प्लीज़ और 'हम तो सच कहने और सुनने के लिए कविता की तरफ़ आए थे' जैसी कविताएं इसी सच्‍ची जिद की उपज हैं - 'और यही बेहतर होता /हरिओम राजोरिया,

प्रेमरंजन अनिमेष, रमेश ऋतंभर, कल्लोल चक्रवर्ती, भैया संजय कुमार कुंदन /कि हम कोयले की मंडी में चले जाते /दिल्ली के चांदनी चौक पर बेचते कंघी और लड़कियों के माथे का रिबन /इसकी मिसाल दुनिया में नहीं है और कहीं बताते.../कहीं फुटपाथ पर छान लेते कोई फोटूग्राफी की दुकान /गले में रंगीन रूमाल लटकाए देह की दलाली में लग जाते'! /....मगर इस तरफ /नहीं आते!' आइए पढ़ते हैं विनय सौरभ की कुछ कविताएं - कुमार मुकुल

जिल्दसाज़

वह जो एक दिन दरवाजे पर आ खड़ा हुआ

बांग्ला में बोला,

किताबों पर जिल्द चढ़ाता हूं

किसी ने बताया कि आपके यहां किताबें बहुत हैं

कुछ किताबें देंगे हमें दादा!

बंगाल से आये हैं

वह सुबंधु था

समय की मार खाया हुआ चेहरा लिये अपना घर बार छोड़ आया था

उसने हमारे यहां पचासों जर्जर किताबों को जीवन दिया!

पत्नी और एक छोटे बच्चे को साथ लिये बंगाल के किसी गांव से निकल आया था सुबंधु!

कौन पूछता है अब जिल्दसाज़ को? किसके लिए ज़रूरी रह गयी हैं पुरानी किताबें?

सुबंधु तुम जिल्दसाज़ कैसे बने?

क्या तुम्हारे पिता जिल्दसाज़ थे?

तुम इतने अच्छे जिल्दसाज़ कैसे बने सुबंधु?

मैं बार-बार पूछता था

कितनी खुशी होती थी उसका काम देखकर

कितनी सफाई थी उसके काम में कि पुरानी किताबों से प्यार बढ़ता ही जाता था

दिन बीतते जाते थे और जिल्दसाज़ के चेहरे पर निराशा बढ़ती जाती थी जिल्दसाज़ी के लिए और किताबें नहीं मिल रही थीं गांव में

वह पूरे इलाके में पुरानी किताबों की तलाश में भटक रहा था

एक सर्द शाम को जब सबके घरों के दरवाजे बंद हो रहे थे और कोहरा घना हो रहा था, सुबंधु आया

बोला, दादा काम नहीं मिल रहा

कोई दूसरा काम भी तो नहीं आता

अपने देश लौट जाना होगा दादा!

यह सब कहते हुए दुख का कोहरा, मैंने देखा जिल्दसाज़ के चेहरे पर और घना हो रहा था

वह किताबों की आलमारी की तरफ देख रहा था और असहज कर देने वाली चुप्पी के साथ

मेरा और मेरे बड़े भाई का चेहरा फक्क था!

इन दिनों हम रोज़ ही सुबंधु की और उसके हाथ की कारीगरी की चर्चा करते हुए अघाते न थे

लेकिन एक जिल्दसाज़ के जीवन में क्या चल रहा था, पता न था!

बंगाल से किताबों को बचाने आया था वह पुरानी किताबों को जीवन देने आया था पुरानी किताबों की महक में जीता था वह जिल्दसाज़!

सुबंधु चला जाएगा! यह बात फांस की तरह थी हमारी संवेदना में

जैसे मन के दीपक में तेल कम हो रहा था और एक रात में हरा जंगल जैसे खाली ठूंठ रह गया था उसके जाने की बात सुनकर

इलाके में पुरानी किताबें न थीं इसलिए सुबंधु वापस जा रहा था

गांव में जिल्दसाज़ का क्या काम!

आज हाट में मिला सुखदेव मरांडी

बोला, आपकी किताब बांधने वाला चला गया अपना सामान लेकर

बीवी बच्चा और टीन के बक्से-झोले के साथ बस पर चढ़ते देखा था उसने

जाने से पहले सुबंधु हमसे मिलने नहीं आया था

वह क्या करता हमारे यहां आकर!

हमारे यहां और पुरानी किताबें कहां थी?

तीन महीने वह रहा इस इलाके में

और कोई उसे जान नहीं सका!

एक मजदूर को तो सब पहचानते हैं

मगर एक जिल्दसाज़ में किसी की दिलचस्पी नहीं थी!

आज तुम कहां होगे सुबंधु?

क्या पुरानी किताबों से भरी कोई दुनिया हासिल हुई तुम्हें?

तुम्हारी याद अब एक यंत्रणा है जिल्दसाज़!

तुम अब जान ही गये होंगे

किताबों की जगह बहुत कम हो गयी है हमारी दुनिया में

और पुरानी किताबों की तो और भी कम!

पुरानी किताबों की गंध के बीच जीना भूल चुकी है यह दुनिया!

"अपने बच्चे को जिल्दसाज़ी नहीं सिखाऊंगा दादा! वह कोई भी काम कर लेगा, जिल्दसाज़ी नहीं करेगा!"

सुबंधु ने यही तो कहा था हमारी आखिरी मुलाकात में!

बरामदे से नीचे उतरते हुए और कोहरे में गुम होते हुए उस सर्द रात में!

बख़्तियारपुर

एक दिन हम पिता की लंबी बीमारी से हार गए, हम सलाहों के आधार पर उन्हें दिल्ली ले जाने की सोचने लगे

दिल्ली में हर मर्ज़ का इलाज़ है

मरणासन्न गए हीरा बाबू दिल्ली से लौट आए गांव!

दिल्ली में कवि कैसे होते हैं!

कौन से एकांत में लिखते हैं कविताएँ!

कैसे हो जाते हैं दिल्ली के कवि जल्दी चर्चित!

मैं दिल्ली में शाम कॉफी हाउस जाना चाहूंगा मिल बैठकर बातें करते हुए, सुना है, दिख जाते हैं रंगकर्मी कवि और साहित्यकार

देश समस्याओं से भरा पड़ा है!

कहां कवियों कलाकारों को मिल पाती होगी इतनी फुर्सत!

पिता मेरी मंशा जानकर बोले

पिता शिक्षक थे

वे पूरी दुनिया के बारे में औसत जानते थे

कवियों के बारे में तो बहुत थोड़ा जानते थे

एक बार भागलपुर में दिनकर से एक कवि सम्मेलन में कविता सुनी थी

इस बात का कोई खास महत्व नहीं था उनके जीवन में

लेकिन बेग़म अख़्तर की ग़ज़लों के बारे में वह बहुत कुछ बता सकते थे

पिता के जीवन में एक साध रही कि वे बेग़म अख़्तर से मिलते!

पिता दिल्ली की यात्रा में अड़ गए अचानक! बच्चों की सी ज़िद में बोले- बख़्तियारपुर आए तो बता देना

मां की स्मृति बहुत साफ नहीं थी

उसने शून्य में आंखें टिकाए हुए कहा कि पिता की पहली पोस्टिंग

संभवत बख़्तियारपुर थी

हमें इस बात का पता नहीं था

सच तो यह भी है मित्रों की पिता की ज़िंदगी के बहुत से ज़रूरी हिस्सों के बारे में हम अनजान थे

अभी महानगर की ओर भागती इस ज़िंदगी की जरूरत में पिता की स्मृतियां चालीस वर्ष पुराने चौखटे लांघ रही थी!

पिता दिल्ली की इस यात्रा में कहीं नहीं थे!

थोड़ी देर के बाद अकबकाये हुए से बोले- मुझे खिसकाकर खिड़की के पास कर दो

रामाधार महतो की चाय पिऊंगा

फिर उन्होंने अपने स्कूल के बारे में बताया जो कभी प्लेटफार्म के किनारे से दिखता होगा

पिता की आंखें उस समय बच्चों की शरारती आंखों की भांति नाच रही थी

ऐसे में मां किसी अनिष्ट की आशंका में रोने लगी

एकाएक उन्होंने संकेत के समय पूछा और पूरे विश्वास से कहा कि बच्चे अभी स्कूल से छूट रहे होंगे

पिता नींद में जा रहे थे और बख्तियारपुर आने वाला था

एक चाय बेचते लड़के से मैंने रामाधार महतो के बारे में पूछा

लड़का चुप था

वह स्कूल के बारे में भी कुछ नहीं बता सका उसने स्कूल के बारे में कोई रुचि नहीं दिखाई

हम आश्चर्य में भरे पड़े थे

पिता की नींद महीनों के बाद लौटी थी

यह उनके स्वास्थ्य के लिए अच्छा था

हम नहीं चाहते थे कि उनकी नींद पर पानी पड़े!

बख़्तियारपुर गुजर गया था और इसे लेकर हम एक अनजाने अपराधबोध और संकोच से घिर गए थे

लेकिन इस समय हम पिता की नींद की सुरक्षा के बारे में सोच रहे थे और इसके खराब हो जाने के प्रति चिंतित थे

एक बार उनकी आंखें आधी रात को झपकीं उन्होंने अस्फुट स्वर में कहा कि बख़्तियारपुर आए तो बता देना

उन्होंने नींद में ही स्कूल बच्चे रामाधार महतो की चाय जैसा कुछ कहा

हम सब सहम गए

हमारी विवशता का यह दुर्लभ रूप था

उनकी नींद की बात की जिज्ञासाओं को लेकर हम किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में थे

इस यात्रा में पिता कविता के बहुत ज़रूरी हिस्से को जी रहे थे

यह सिर्फ मैं समझ रहा था

यह तय था-

बख़्तियारपुर पिता की नींद में अभी सुंदर सपने की तरह गड्डमड्ड हो रहा होगा

लेकिन दोस्तो!

हम बख़्तियारपुर के किसी भी ज़िक्र से बचना चाहते थे

हम इस शब्द के एहसास से बचना चाहते थे।

यह ख़रीद लीजिए प्लीज़!

पूरी दुनिया में चक्कर काटने के बाद सुष्मिता सेन हमारे घर की स्त्रियों के लिए एक नायाब चीज़ ढूंढ लाईं

उस सेनेटरी नैपकिन के बारे में उम्दा ख़्याल रखते हुए उसने बताया -

यह ख़रीद लीजिए, यह सबसे अच्छा है!

यह सबसे अच्छा है! वंडरफुल!

- इसे तो आप ख़रीद ही लें!

एक साबुन की झाग में अर्धनग्न ऐश्वर्य राय ने पुलक में भरकर कहा

एक जूते से पूरे विवस्त्र शरीर को कलात्मक ढंग से ढंकते हुए मधु सप्रे की आँखों में आवारगी और आमंत्रण था -

यही लीजिए, मेरी तरह टिकाऊ खूबसूरत और मजेदार!

गर्दन, उरोजों और सुडौल टांगों पर उंगलियाँ फिराते हुए मिस फेमिना ने मर्दों को बताया - इससे मुलायम और क्या हो सकता है भला! सेविंग के लिए प्लीज यह ब्लेड लीजिए!

इसका एहसास कितना खूबसूरत है!

काश मैं बता सकती आपको...

नशीली आंखों से एक कंडोम के अनुभव को साकार करते हुए पूजा बेदी ने कहा -आप अगली बार यही आजमाएंगे, आई होप!

नौ गज़ की साड़ी पूरे बदन पर लपेटने के बाद भी नंगी पीठ दिखलाती हुई संगीता बिजलानी मुस्कुरा रही थीं - हाय यह मेरी तरह हल्की है इसे लीजिए न!

मैं छह बच्चों की माँ हूँ!

पर मेरे बालों की चमक तो देखिए!

एक शैम्पू की दुनिया में अब शोभा डे भी महक रही थीं और उनके भी होंठ उसे खरीद लेने के अनुरोध और उत्तेजना में कांप रहे थे

ये आम स्त्रियों की तरह ही हाड़ मांस की औरतें थीं पर उन्मादित ढंग से हमारी दुनिया में बेखौफ़ आ गई थीं

इनका ख़ास मक़सद हमारी बेरौनक दुनिया को सुंदर बनाना था

यह महकती हुईं औरतें थीं-

युवा और आकर्षक!

उकताहट से परे जिंदादिल और आत्मविश्वास से भरी हुईं,

जो बाज़ार को घर ले आने की सारी कलाएं जानती थीं

इनकी उंगलियां गीले आटे के एहसास से नावाकिफ़ थीं

इन्हें अपने बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजने की ज़ल्दी में नहीं जीना था और न ऑफिस जाते पतियों के लिए टिफिन तैयार करना था

ये वो पिलपिली नहीं थीं जिन्हें डॉक्टर के पास, बनिए के पास रोज के सौदा सुलफ़ के लिए जाना था

उनके भीतर निरंतर फैलता हुआ एक इत्मीनान था

रोजमर्रा की चीज़ों के लिए परिचित और लिजलिज़ा अफसोस नहीं

इन्हें सोहर नहीं गाना था, व्रत नहीं रखने थे!

ये छोटी- मोटी अधूरी आकांक्षाओं की मारी स्त्रियां नहीं थीं

छोटे-छोटे सुखों के लिए आह भरती कुंठा नहीं थीं

संभवतः ये चांद से उतरी थीं और सितारों से मुखातिब थीं

हमारी दुनिया को थोड़ा और बेहतर बनाने के लिए रूमानियत से लबालब पैमाना थीं सुनहरा अवसर थीं - जिससे हम सब को चुकना नहीं था

यह हमारे घर की स्त्रियों, लड़कियों के लिए सपना थीं

जीवन का मकसद थीं, जिन्हें हर हाल में उन्हें पूरा करना था

यह संस्कृति की भाषा में बाजार थीं

बाजार की भाषा में उत्तेजना

विज्ञापन की भाषा में बाग का ताजापन थीं

ये नई बाज़ार व्यवस्था का रुमान थीं

बेहद शालीन ढंग से उच्छृंखल होती स्त्रियां थीं

ये औरतें एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थीं

जिन्हें काफी संभालकर सावधानी और समझदारी के साथ उतारा गया था सुंदर और खुशहाल बनाने को हमारी दुनिया में...

अब आपका झुंझलाना व्यर्थ है!

यह औरतें तब एक महज अनुरोध थीं

सिर्फ़ एक नादान शख्सियत!

आप ही के शब्दों में शालीनता की परिभाषा थीं

गौर कीजिए...

वे चोर दरवाज़े से नहीं आई थीं हमारे घरों में

आपने उन्हें आते हुए देखा था सामने से

आप ने ही उन्हें गले लगाकर दरवाज़े से भीतर बुलाया था

फिर आपने ही उन युवा आकर्षक आक्रामक और स्वप्न में डूबी अवास्तविक औरतों से कल्पना में प्रेम किया था

आपने ही सबसे पहले उत्साह में पत्नी का कंधा दबाते हुए उन औरतों के बारे में कहा था कोई हौसलेमंद वाक्य

तब ये अनुरोध करती औरतें आपके दरवाज़े पर खड़ी थीं

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