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मंदिरों में ब्राह्मणों का और गटर में दलितों का आरक्षण कब तक ?

Janjwar Desk
24 March 2021 11:17 AM GMT
मंदिरों में ब्राह्मणों का और गटर में दलितों का आरक्षण कब तक ?
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50 साल की निर्मल बताती हैं कि आज भी हम छुआछूत से लेकर कई भेदभाव का शिकार हो रहे हैं। आजादी के इतने साल के बाद भी हमारे लिए कोई बदलाव नही हैं।

नई दिल्ली। भारत में कहा जाता है कि सर्वधर्म सम्भाव यानि की सभी धर्मों को एक साथ मिलकर रहना चाहिए। भाईचारे को हमेशा बरकार रखना चाहिए। लेकिन आजादी के इतने दशक बीत जाने के बाद भी देश जात-पात ऊंच-नीच को नहीं भूल पा रहा है। संविधान के अनुसार सब बराबर हैं, न कोई जाति और धर्म बड़ा है और न कोई छोटा। सभी को अपनी इच्छानुसार पूजा स्थलों में जाने का अधिकार है। जाति-धर्म के आधार पर किसी को धार्मिक स्थलों में जाने से नहीं रोका जा सकता है लेकिन आज भी भारत के कई इलाकों में ब्राह्मणवादी व्यवस्था जारी है।

आज भी श्राद्ध से लेकर मंदिर तक में एक ही वर्ग का आरक्षण है। दान पर एक ही वर्ग का अधिकार है और दलित मास्टर साहब आज भी सार्वजनिक समारोह में साथ खाना नहीं खा सकते हैं। दलितों के घोड़ी चढ़ने पर होने वाली दिक्कत आज भी जारी है और इन्हीं सवालों को लेकर 'जनज्वार' पहुंचा दिल्ली की दलित बस्ती में कि आखिर मंदिरो में आरक्षण कबतक ? आज भी दलित नाली से लेकर गटर ही साफ कर करा है लेकिन ये कबतक।

हम भारत की राजधानी पहुंचे जिसे मैट्रो सिटी भी कहा जाता है। यहां लोगों की सोच से लेकर समझ ग्रामीण इलाकों के मुकाबले बिलकुल अलग है लेकिन फिर भी हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या कभी दिल्ली में रहने वाले ये दलित शिकार हुए हैं ब्राह्मणवादी व्यवस्था का।

50 साल की निर्मल बताती हैं कि आज भी हम छुआछूत से लेकर कई भेदभाव का शिकार हो रहे हैं। आजादी के इतने साल के बाद भी हमारे लिए कोई बदलाव नही हैं। आज भी हमें मंदिरों मे जाने नहीं देते हैं। हमें कहा जाता कि मंदिर में मत आओ, बाहर से ही हाथ जोड़ लो। इस डर से हम बड़े मंदिरों में भी नही जाते हैं कि कहीं कोई हमें रोक न ले। दिल्ली की दलित बस्ती आज भी तंग गलियों से होकर गुजर रही है। दलितों के बच्चे पढ़े लिखे हैं लेकिन आज भी यह लोग इन बस्तियों में रहने के लिए मजबूर हैं क्योंकि ये समाज की ओछी मानसिकता से लेकर गरीबी के नीचे दबे हुए हैं।

वहीं 60 साल के रमेश चन्द्र जो कि वाल्मिकी समाज से आते हैं, वह बताते हैं कि दलित से लेकर ऊंच जाति के लोग भी एक ही जगह से आते हैं उसके बाद भी हमारे साथ भेदभाव किया जाता है। जबकि विदेशों में ऐसा नहीं होता है। वहां पर भेदभाव की कोई नीति नहीं है। देश के राष्ट्रपति को भी ओछी मानसिकता का शिकार होना पड़ा। उन्हें भी मंदिर में नहीं घुसने दिया जबकि वो देश के राष्ट्रपति हैं। दलितों के बच्चे भी पढ़े लिखे हैं लेकिन फिर भी हमारे बच्चों को आगे बढ़ने नही दिया जाता है। मंदिरों मे चल रहा आरक्षण खत्म होना चाहिए। हालांकि छुआछूत जैसी छोटी मानसिकता शहरी क्षेत्रों में अब काफी कम है लेकिन आज भी गावों में यह सब चल रहा है। मैं चाहता हूं कि देश में दलितों के साथ हो रहे शोषण को सरकार को रोकना चाहिए।

[रमेश चंद्र]

वहीं इलाके के आम लोग कहते हैं कि कास्ट कोई छोटी बड़ी नहीं होती है लेकिन बावजूद मंदिरों से लेकर राजमर्रा की जिंदगी में हो रहे शोषण की जिम्मेदार केन्द्र सरकार है। सरकार को इसके लिए सख्त कार्यवाही करनी चाहिए और कानून भी बनाने चाहिए और मंदिरो में चल रहे आरक्षण को भी रोकना चाहिए।

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